क्या बहू कभी बेटी की जगह ले सकती है?

परिवार में हर  सदस्य की अपनी- अपनी जगह होती है | कोई किसी की जगह को नहीं ले सकता है | पिता- मुखिया होता है ,कमाने से लेकर सबकी जरूरतों को पूरा करने की जिम्मेदारियों की गठरी , सारे जीवन ढोता रहता है |
माँ - गृह-स्वामिनी है , तो सन्तान को परवरिश देना , संस्कार देना ,भावी जीवन के लिए तैयार करते- करते स्वयं ही धूमिल होती जाती है, पर प्रसन्न रहती है | संतान, वह तो जीवन में पिता और माता के रूप में मिले हुए सघन और विशाल वृक्ष की छाँव में सुख पाते हैं और न जाने कौन सी ऊँची -ऊँची उड़ाने भरते हैं | भूल जाते हैं कि ये सब केवल और केवल पिता और माता के कारण ही सम्भव हो पा रहा है | जिन्दगी की वास्तविकता से बेखबर कब अपना परिवार सम्भलने लगते हैं, जान ही नहीं पाते | जानते हैं तब, जब शुरू होते हैं घर में छोटे- बड़े कलह | माता और बहू में या पत्नी और बहन में या माता और पुत्र में आदि आदि |
माता द्वारा बहू को बेटी की तरह न रखने का दोष | बहू से ज्यादा उम्मीदें | बहू के मायके से कम प्राप्ति | बहू के मायकेवालों से आवभगत और खुशामत में कमी| बेटी के मायके में आ कर माता द्वारा बहू से सम्बन्धित कहानी सुन कर , अपनी सलाह देना और इस तरह मायके में न रह कर भी अपनी दखलंदाज़ी बनाए रखना |

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अब शुरू हो चुकी होती है कहानी कि बेटी और बहू में क्या अंतर है ———————————

बेटी , बेटी ही होती है और अंत तक बेटी ही रहती है और बहू , तो बहू ही होती है और अंत तक बहू ही रहती है क्यों कि -
1 . बेटी को अपनी कोख से पैदा किया होने के कारण उस से खून का रिश्ता होता है और इसीलिए उसके सुख- दुःख जल्दी और ज्यादा महसूस होते हैं और बहू तो परायी होती है | वह तो दूसरे की सन्तान होती है | उस की भावनाएं , उसके दुःख-दर्द उतना वजन नहीं रखते हैं या यूँ कहें कि देर से और कम महसूस होते हैं और जल्दी ही भुला दिए जाते हैं | अकसर सुनने में आता है कि जिस का जितना रिश्ता है उसको उतना ही दर्द होता है |

2 .ऐसा भी देखा गया है कि वक्त पड़ने पर बहू बेटी बन जाती है और काम पूरा होते ही वापस उसे बहू की पदवी मिल जाती है | यानि उससे बहुत कुछ छुपाना है | उसे सब कुछ नहीं बताना |

3 . वंश की बेल को सींचने वाली बहू है | फिर भी दर्द तो बेटी के लिए ही होता है | माँ का दिल पता नहीं क्या- क्या छुपाकर और जोड़- जोड़ कर रखता है पर बहू को भी तो कुछ चाहिए होता है |

4 . सेवा और मरते दम तक साथ निभाने के लिए तो बहू है पर तारीफ तो बेटी की होती है | भूलकर कभी बहु की तारीफ कर भी दी तो साथ ही ये भी जता दिया जाता है कि मेरी बेटी तो इस से भी अच्छा कुछ कर सकती है |

5 . आधुनिक समय में एक फैशन हो गया है कि सास ये जताती हैं कि मैं अपनी बहू को बेटी की तरह रखती हूँ | बहू और बेटी में कोई भेद नहीं करती हूँ पर ऐसा है नहीं | अवसर आने पर स्पष्ट हो जाता है कि बेटी बेटी ही है और बहू बहू ही है |

6 . बेटी और बहू में वैसा ही अंतर है जैसा बेटे और दामाद में| दामाद बेटे की जगह नहीं ले सकता |

7 . अपवाद हर जगह दृष्टिगोचर होते हैं | ऐसी मिसालें मिलती हैं जब बहू और बेटी के अंतर मिट जाते हैं | वहीं बेटे और दामाद के अंतर भी मिट जाते हैं |

निष्कर्ष -परिवार के सभी रिश्ते महत्वपूर्ण हैं | इनके बिना जीवन में रस नहीं है | हम ये तुलना ही क्यों करें कि बेटी और बहू में क्या अंतर है | जीवन में सभी रस चाहिए- कड़वा भी मीठा भी | केवल मीठा ही मीठा मिलता रहे तो भी हम उकता जाते हैं |

….जागृति गोस्वामी


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