चट शादी पट तलाक- कौन है दोषी? विवाह की पवित्रता बचाने, क्या किया जाए?

शादी की बात होते ही शहनाई का स्वर कानों में गूँज उठता है. बच्चों के विवाह का सुख प्राप्त करना हर माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी की सबसे बड़ी कामना होती है. हर लड़की और लड़का अपनी मेरिज को लेकर बहुत उत्सुक होता है. उन्हें लाइफ पार्टनर का शिद्दत से इन्तजार होता है. शादियों में बहुत धूम-धाम होती है. लोग हैसियत से बाहर जाकर भी खर्च करते हैं. घरवालों और रिश्तेदारों का जोश देखते ही बनता है. नाच-गाना, बैंड-बाजा-बारात और धूम-धडाका होता है. तमाम किस्म के रीति-रिवाज और रिचुअल्स होते हैं.

आखिर ऐसा क्यों न हो! यह एक नई जिंदगी की शुरूआत जो है. भारतीय संस्कृति और धर्म में विवाह को जीवन के सोलह संस्कारों यानी राइट्स में सबसे इम्पोर्टेन्ट जो माना गया है. इसमें लड़के और लड़की फ्यूचर भविष्य के रंगीन सपने बुनते हुए एक नयी ज़िन्दगी शुरू करते हैं. पवित्र अग्नि के सामने फेरे लगाकर उसकी साक्षी में वे जन्म-जन्म तक साथ निभाने के लिए वचनबद्ध होते हैं.

लेकिन आजकल इसका दुखद पहलू यह है कि बड़ी संख्या में शादियाँ साल-दो साल में ही टूट रही हैं. भला सात जन्म तक साथ निभाने का वादा करने वाले वर और वधु इतनी जल्दी कैसे एक-दूसरे का साथ छोड़ देते हैं? इससे परिवारों और समाज का विघटन हो रहा है. बाल-बच्चा हो जाने पर विवाह टूटने की स्थिति में तो बच्चे के जीवन पर भी बहुत बुरा असर होता है.

इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि विवाह को लेकर हम पहले जैसे गंभीर नहीं रह गये हैं. हम विवाह से जुड़ी हर बात में बहुत नॉन-सीरियस हो गये हैं. विवाह के समय आपने देखा होगा कि वर और उसके साथी पंडितजी से सभी रस्में जल्दी से निपटाने को कहते हैं. वे इस समय पढ़े जाने वाले मन्त्रों और विधियों को बहुत लाइटली लेते हैं. पंडितजी द्वारा वर और वधु को जो सुखी जीवन के साथ वचन दिलवाए जाते हैं, उन्हें न वे गौर से सुनते-समझते हैं और न भावी जीवन में उनके पालन पर कोई ध्यान देते हैं.

वर और वधु को चुनने में भी बड़ी त्रुटियाँ आ गयी हैं. वधु के सिर्फ रूप-रंग और वर के जॉब तथा उसकी आर्थिक हैसियत को ही सबसे अधिक महत्त्व दिया जाने लगा है. दोनों के कुल और संस्कारों की तरफ बहुत अधिक ध्यान नहीं दिया जाता. होता यह है कि अधिकतर मामलों में थोड़े-बहुत दिन तो सब-कुछ अच्छा चलता है, लेकिन दोने को संस्कार सामने आने लगते हैं और तकरार शुरू हो जाती है.

आजकल बड़ी उम्र में शादी होती है. शादी तक लड़का और लड़की बहुत मेच्योर हो चुके होते हैं. दोनों का व्यक्तित्व विकसित हो चुका होता है. अधिकतर मामलों में दोनों पढ़े-लिखे होते हैं. उनके लिए थोड़ी सी भी प्रतिकूल परिस्थति में खुद को एडजस्ट करना आसान नहीं होता. उनमें सहनशीलता की कमी होती है. दोनों में से कोई भी झुकने को तैयार नहीं होता. पहले परिवार और समाज तथा शादी करवाने में मध्यस्थ का कुछ लिहाज रहता था. अब वैसा कोई लिहाज बहुत कम हो गया है

इसके अलावा, एक बड़ा कारण यह भी सामने आया है कि शादी के बाद माता-पिता बच्चों के जीवन में ज्यादा हस्तक्षेप करने लगे हैं. शादी के दूसरे दिन से ही लड़की मोबाइल पर अपनी माँ और पिता को ससुराल की सब बातें बताने लगती है. ज़रा सा भी प्रतिकूल होने पर वह तड़ाक से माता-पिता को फोन लगा देती है. लड़की के माता-पिता बहुत डिस्टर्ब हो जाते हैं और तकरार शुरू हो जाती है.

पहले शादी के बाद विदाई के समय माता-पिता बेटी से कहते थे कि हमारे घर से तुम्हारी डोली जा रही है. तुम्हारी अर्थी अपने ससुराल से ही उठनी चाहिए. इसके पीछे भाव यह रहता था कि अब ससुराल ही तुम्हारा असली घर है. आजकल कुछ अतिबुद्धिवादी लोग कहते हैं की माता-पिता ऐसा कह कर बेटी से पिंड छुड़ा लेते थे. बे बेटी को अपने घर से बेदखल कर देते थे. लेकिन ऐसा नहीं था. इसके पीछे भाव यही था कि लड़की में यह बात घर कर जाए कि अब उसे ससुराल में ही अपना जीवन संवारना है. वही उसका वास्तविक घर हो गया है. ऎसी स्थिति में थोड़ी बहुत प्रतिकूलता में वह खुद को एडजस्ट करती थी. ससुराल में अपने व्यवहार से पति और उसके परिजनों को अपने अनुकूल करती थी. शुरूवाती परेशानियों के बाद काफी हद तक सब ठीक हो जाता था.

आज ऐसी स्थितियां भी नहीं रह गयी हैं. सिर्फ लड़की ही नहीं बल्कि उसके माता-पिता भी ससुराल में पहले दिन से ही सब कुछ अपने हिसाब से चाहने लगे हैं. ऐसा कभी संभव नहीं होता.

गलती लड़कों और उनके परिवार कि भी कम नहीं होती. वे पहले दिन से ही बहू से एकदम आदर्श आचरण चाहते हैं. उनके आदर्श अधिकतर वे होते हैं जो उनके समय में थे. समय बदलने के साथ वे अपने विचार नहीं बदलते. बहू पर हर चीज थोपना चाहते हैं. पति भी खुद राम भले ही न हो लेकिन पत्नी सीता जैसी चाहता है. यह बात अच्छे-अच्छे पढ़े-लिखे परिवारों तक में देखी जा रही है.

 

अगर आप चाहते हैं कि शादी नहीं टूटे तो कुछ बातों का ध्यान रखना रखना होगा. आइये समझते हैं कुछ ऐसी बातें जिनका ध्यान रखने पर सुखी वैवाहिक जीवन जिया जाना आसान होगा-

  • बच्चों में छोटी उम्र से ही शादी की गंभीरता के समझ पैदा की जाए.
  • उनमें कम उम्र से ही सहनशीलता का संस्कार डाला जाए.
  • परिवार को साथ लेकर चलने और दूसरों के साथ एडजस्ट करने का प्रशिक्षण दिया जाए.
  • शादी सिर्फ रूप-रंग पर फ़िदा होकर या धन-दौलत देखकर नहीं की जाए. लड़के और लड़की से पारिवार और उसके संस्कारों की भी समुचित पड़ताल कर ली जानी चाहिए.
  • यह बात ध्यान में रखी जाए कि शादी सिर्फ लड़के-लड़के का गठबंधन न होकर दो परिवारों का गठबंधन है.
  • लड़के और लड़की के स्वास्थ्य की बारे में भी पूरी जानकारी हासिल की जानी चाहिए. शादी के बाद बीमारी का पता चलने पर बहुत अधिक वैवाहिक सम्बन्ध टूट जाते हैं.
  • आज के समय में तो शुगर, ब्लड प्रेशर, एच आई वी जैसी बीमारियों के विषय में पहले से ही पता कर लेना चाहिए.
  • पहले यह काम काफी हद तक जन्म कुण्डली देखकर हो जाता था. उस समय कुण्डली के जानकार लोग होते थे. उनकी बातें काफी हद तक सही होती थीं. अब हम इस विद्या को उतनी गंभीरता से नहीं लेते. लिहाजा स्वास्थ्य जांच जैसी बातें विवाह सम्बन्ध करने से पहले आवश्यक हो गयी हैं.
  • माता-पिता शादी के बाद लड़की की ससुराल में ज़रुरत से ज्यादा हस्तक्षेप नहीं करें. उसकी स्थिति की जानकारी रखने में कोई बुराई बुरे नहीं है, लेकिन बात-बात में हस्तक्षेप नहीं करें. लड़की को अपने ढंग से एडजस्ट करने का अवसर दें.
  • लड़के वालों को को बहू के साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए जो वे अपनी बेटी के साथ उसकी ससुराल में चाहते हैं.
  • आजकल यह बात बहुत अधिक देखने में आ रही है कि माता-पिता अपने बहू-बेटे से तो चाहते हैं कि वे उनके साथ रहें, लेकिन लड़की और उसके पति से यह अपेक्षा करते हैं कि वे अपने माता-पिता से अलग रहें. यह बात सुनने में कडवी लग सकती है, लेकिन यह हकीकत है.
  • अपने घर में दूसरे लोगों को हस्तक्षेप नहीं करने दें. घरेलू समस्याओं के समाधान के लिए दूसरों से सलाह भी बहुत आवश्यक होने पर ली जाए. अपनी समस्याएं आपसी समझदारी से ही सुलझाई जानी चाहिए.
  • लड़के के माता-पिता बेटे-बहू के जीवन में ज्यादा दखल न दें. उन्हें अपने हिसाब से एक-दूसरे के साथ एडजस्ट करने की स्वतंत्रता दें.
  • दम्पतियों पर परिवार बढ़ाने के लिए दवाब नहीं डालना चाहिए. उन्हें स्वतंत्र रूप से अपनी आर्थिक और मानसिक अवस्था के अनुरूप तैयार होने पर ही ऐसा करने की आज़ादी दी जाये.

 

विवाह परम्परा ही नहीं परिवार और समाज के प्रति एक जिम्मेदारी है. विवाह को गुड्डे-गुड़ियों का खेल नहीं समझकर सामजिक दायित्व के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए.

इन बातों पर अमल करके देखिये. यही हमारे बुजुर्गों की भी सीख है. इससे वैवाहिक जीवन सुखी होगा और संबंधों के टूटने की नौबत नहीं आएगी.

 

 


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