नर्मदा नदी में चढ़ा दिया गया, 11 हजार लीटर दूध, सोशल मीडिया पर उठे सवाल


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स्टोरी हाइलाइट्स

धार्मिक अनुष्ठान के दौरान भक्तों द्वारा 11,000 लीटर से अधिक दूध अर्पित कर नर्मदा अभिषेक का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। यह घटना कथित तौर पर भेरूंदा क्षेत्र के नीलकंठ घाट की है..!!

मध्य प्रदेश में नर्मदा नदी के तट पर एक धार्मिक अनुष्ठान के दौरान भक्तों द्वारा 11,000 लीटर से अधिक दूध अर्पित कर नर्मदा अभिषेक का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। यह घटना कथित तौर पर भेरूंदा क्षेत्र के नीलकंठ घाट की है, जहां आस्था के नाम पर नदी में भारी मात्रा में दूध बहाया गया। 

अब इसे लेकर सोशल मीडिया पर कई यूजर्स ने सवाल खड़े कर दिए हैं।

कुछ लोगों का कहना है, कि, इतना दूध अगर ज़रूरतमंदों को दे दिया जाता, तो असली पुण्य मिलता।

साथ ही इस तरह के धार्मिक अनुष्ठान के नाम पर कथित तौर पर दूध की बर्बादी और जलीय जीवों की सुरक्षा को लेकर सोशल मीडिया पर सवाल उठ खड़े हुए हैं।

एक्स पर एक यूजर ने लिखा है, कि नर्मदा नदी में एक पूरे टैंकर से लगभग 11,000 लीटर दूध बहा दिया गया इसे “अभिषेक” का नाम दिया गया, यह भक्ति नहीं, खुला पाखंड है। इतनी बड़ी मात्रा में दूध नदी में डालने से पानी की जैव-रासायनिक ऑक्सीजन मांग (BOD) तेजी से बढ़ जाती है, जिससे घुलित ऑक्सीजन कम हो जाती है। इसका सीधा असर मछलियों और अन्य जलीय जीवों पर पड़ता है। उनका दम घुटने लगता है और बड़ी संख्या में उनकी मौत हो सकती है। इसके अलावा, दूध के सड़ने से हानिकारक बैक्टीरिया और सूक्ष्मजीव पनपते हैं, जो पानी को जहरीला बनाते हैं और पूरे जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर नुकसान पहुँचाते हैं।

विडंबना यह है कि जिस नदी को “माँ” कहकर पूजा जाता है, उसी को इस तरह प्रदूषित किया जा रहा है। क्या किसी भी धर्म में प्रकृति को नुकसान पहुँचाना, जीवों की हत्या करना और संसाधनों की बर्बादी करना सही ठहराया जा सकता है? यह आस्था नहीं, बल्कि अंधविश्वास और पाखंड का चरम रूप है। जब देश के कई हिस्सों में बच्चे कुपोषण से जूझ रहे हैं, लोग भोजन और दूध जैसी मूलभूत जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तब हजारों लीटर दूध को नदी में बहा देना सामाजिक असंवेदनशीलता की भी पराकाष्ठा है। अब समय आ गया है कि ऐसे कृत्यों पर सख्त सवाल उठाए जाएं। धर्म के नाम पर पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वालों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। सच्ची आस्था वही है जो जीवन बचाए, प्रकृति की रक्षा करे और समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाए न कि दिखावे और अंधविश्वास के नाम पर विनाश को बढ़ावा दे।

वायरल वीडियो पर ऑनलाइन बहस छिड़ गई है। यह घटना एक अनुष्ठान का हिस्सा बताई जा रही है, जो आस्था बनाम अपव्यय (waste) के बीच पर्यावरण और संसाधनों के दुरुपयोग को लेकर चिंता पैदा कर रही है। इससे पहले भी नर्मदा जयंती जैसे अवसरों पर दूध से अभिषेक और चुनरी ओढ़ाने की खबरें आती रही हैं।

वायरल वीडियो से संबंधित मुख्य बिंदु:

विवाद: सोशल मीडिया पर वीडियो सामने आने के बाद, इतने बड़े पैमाने पर दूध को "बहाने" या "dumped" करने की आलोचना की जा रही है।

आस्था बनाम अपव्यय: लोग इसे अंधविश्वास और खाद्य पदार्थों के दुरुपयोग के रूप में देख रहे हैं।

पर्यावरण प्रभाव: नदी में इतनी बड़ी मात्रा में दूध डालने से पानी की गुणवत्ता पर असर पड़ने की भी चिंता व्यक्त की जा रही है।

नर्मदा नदी में दूध अर्पित करने की परंपराएं रही हैं, लेकिन इस तरह की अत्यधिक मात्रा में दूध का उपयोग हमेशा से चर्चा का विषय बना रहता है।

बता दें, किनर्मदा नदी में एक पूरे टैंकर से लगभग 11,000 लीटर दूध बहाकर उसे “अभिषेक” का नाम दिया गया। लेकिन यह घटना आस्था से अधिक अंधविश्वास और पाखंड का प्रतीक नजर आती है। जिस नदी को हम “माँ” कहकर पूजते हैं, उसी में इतनी बड़ी मात्रा में दूध डालकर उसके अस्तित्व को ही खतरे में डालना किस प्रकार की भक्ति है?

वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो दूध जैसे कार्बनिक पदार्थ के नदी में जाने से पानी की जैव-रासायनिक ऑक्सीजन मांग (BOD) तेजी से बढ़ती है, जिससे घुलित ऑक्सीजन कम हो जाती है। इसका सीधा असर मछलियों और अन्य जलीय जीवों पर पड़ता है वे दम घुटने से मर सकते हैं। साथ ही, दूध के सड़ने से हानिकारक बैक्टीरिया पनपते हैं, जो पूरे जल तंत्र को जहरीला बना देते हैं।

यह केवल पर्यावरणीय अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक असंवेदनशीलता भी है। एक ओर देश में लाखों बच्चे कुपोषण से जूझ रहे हैं, दूसरी ओर हजारों लीटर दूध का इस तरह नष्ट किया जाना हमारी प्राथमिकताओं पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

धार्मिक अनुष्ठान के नाम पर नदी में हजारों लीटर दूध बहाना कहां तक सही और तर्क संगत है। देखा जाए तो धर्म का मूल उद्देश्य करुणा, संतुलन और प्रकृति के प्रति सम्मान सिखाना है न कि उसका दोहन करना, अब समय आ गया है कि हम आस्था और विवेक के बीच संतुलन बनाएं, ताकि हमारी श्रद्धा किसी के जीवन और प्रकृति के अस्तित्व पर भारी न पड़े।