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‘यूक्रेन’ और भारत की चुप्पी 

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Mon , 14 Apr

सार

पुतिन ने कसम खा रखी है कि ‘यूक्रेन तेरे टुकड़े होंगे’, कल काफी हाउस में बातचीत के दौरान एक मित्र ने मेरी उस जानकारी को पुष्ट किया की “यूक्रेन” उच्चारण ठीक नहीं हैं, वास्तव में रुसी भाषा में इस देश का नाम ‘उक्रेनिना’ उच्चारित होता है , खैर ।

janmat

विस्तार

-राकेश दुबे 

19/02/2022

अब बात रूसी फितरत की,रूसी फितरत यह है कि “पृथकतावादी तेवर वाले इलाके में पहले जनमत संग्रह कराओ, फिर सेना के समर्थन से एक झटके में नाभि-नाल का नाता तुड़वा दो|” जो यूक्रेन को समझना चाहे उनको यह जानना चाहिए । काला सागर और सी ऑफ आज़ोव के 2782 किलोमीटर तट पर बसे इस देश को ‘यूक्रेन’ या ‘उक्रेनिना’ कहते हैं । सात देशों से घिरे, चार करोड़ 34 लाख की आबादी वाले इस देश की सीमा - पोलैंड, स्लोवाकिया और हंगरी से लगी है । उत्तर में बेलारूस, दक्षिण-पश्चिम में माल्दोवा व रोमानिया, और पूर्वी सीमा पर है रूस। इस समय चर्चा के केंद्र में है यूक्रेन। एशिया-पैसेफिक के अमेरिकी कमांडर जनरल केनेथ एस. विल्सबाख़ का बयान भी देखिये ‘चीन इस बहाने ताइवान, हांगकांग, साउथ चाइना सी और भारत में खुराफ़ात करेगा, जो दरअसल उसका नहीं है।’ अब साफ हो गया होगा की यूक्रेन क्यों महत्वपूर्ण है |

वैसे आम भारतीय का यूक्रेन से क्या लेना देना? सवाल बेमानी है, मुख्य वजह भारत-यूक्रेन की सहकार वाली कंपनियों में काम कर रहे कोई दो हज़ार भारतीय, और 18 हज़ार छात्र हैं। भारत देश के वासी चाहते हैं कि 20 हज़ार भारतीय, युद्ध के समय यूक्रेन में रहने का जोखिम न लें, वहां से सुरक्षित लौट आयें। हमारे दूतावास ने यूक्रेन के 24 क्षेत्रीय इलाक़ों में रह रहे भारतीयों से ऑनलाइन फार्म भरने को कहा है, ताकि एयरलिफ्ट की सूरत में उन्हें मॉनिटर किया जा सके। इससे पहले, भी एक एडवाइजरी जारी हुई है |कीव स्थित भारतीय दूतावास ने कहा है कि हमारे जिन नागरिकों, ख़ासकर छात्रों की उपस्थिति यहां आवश्यक नहीं, वो हालात ठीक होने तक, कुछ समय के वास्ते यूक्रेन छोड़ सकते हैं। मगर, कोई यह नहीं पूछ रहा कि दिल्ली-कीव रूट पर विमान संचालन करने वाली कंपनियों ने टिकटों के दाम दोगुने क्यों कर दिये?

दिसंबर, 1991 में भारत ने इस देश को मान्यता दी थी, और जनवरी, 1992 में उभयपक्षीय कूटनीतिक संबंध स्थापित हुए। यूक्रेन ने एशिया का पहला कूटनीतिक मिशन फरवरी 1993 में दिल्ली में खोला। 2005 में तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम यूक्रेन गये थे, और उनके समकक्ष प्रेसिडेंट विक्टर यानुकोविच दिसंबर, 2012 में भारत आये थे। भारत-यूक्रेन के बीच२ अरब 80 करोड़ डालर का व्यापार भी है।

यूक्रेन से चीन के कूटनीतिक संबंघों के भी तीस साल पूरे हो रहे हैं। यूक्रेन से उसका उभयपक्षीय व्यापार 17.36 अरब डॉलर का है। तुलना कर लीजिए कि हम उसके मुक़ाबले उभयपक्षीय व्यापार में कहां खड़े हैं? राष्ट्रपति शी जिनपिंग यूक्रेन मामले पर मुखर हैं, स्वयं भू विश्वगुरु मोदी चुप हैं। कारण कश्मीर है। 

हाल ही में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की उनके फ्रांसीसी समकक्ष इमैनुअल मैक्रों से लंबी बातचीत हुई। शी यूक्रेन मामले पर कूटनीतिक प्रस्ताव चाहते हैं। दो हफ्ते पहले व्लादीमिर पुतिन पेइचिंग गये थे, साझा बयान जारी हुआ था |जिसमें सबसे अधिक इस पर ज़ोर था कि रूसी सीमा तक नाटो अपने नये सदस्यों का विस्तार न करे। सब जानते है ३० सदस्यीय नाटो को अमेरिका नियंत्रित करता है । शांति प्रयास के लिए 2014 का ‘नोरमेंडी फार्मेट’ और 2015 में मास्को-कीव के बीच हुए ‘मिंस्क समझौते’ पर अमल की आवश्यकता है। इन प्रस्तावों पर पहल करने की दिशा में फ्रांस और जर्मनी ने अहम भूमिका है । 

वैसे 2014 अप्रैल में दोनबास में यूक्रेन से अलग होने का अभियान आरंभ रूसी शह पर होने लगा था । दोनबास में युद्ध में हज़ार लोग मारे गये थे।दोनबास को शांत करने के वास्ते उत्तरी फ्रांस के शहर नोरमेंडी में रूस, यूक्रेन, फ्रांस और जर्मनी के नेताओं ने 6 जून, 2014 को बैठक की थी। शांति के वास्ते प्रारूप तैयार हुआ, मगर आठ वर्षों में इसके नतीज़े सामने नहीं आ सके। दोनबास वाले क्षेत्र में ही ‘लुहान्स्क पीपुल्स रिपब्लिक’, अलगाववाद की राह पर है।

अब बात मुददे की जो बाइडेन इस समय युद्ध का नगाड़ा ए पीट रहे हैं, ताकि अमेरिका में बेरोज़गारी के मुखर सवाल को दूसरी दिशा में मोड़ा जा सके। भारत चुप है, बढती बेरोजगारी और इस संकट पर स्वयं भू विश्वगुरु मोदी चुप हैं|