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100 करोड़ डोज, ठंडी पड़ी राजनितिक “विकारधारियों” की सोच, सपनों, तैयारियों और कर्मठता का अभियान.. सरयूसुत मिश्रा

सार

संघर्ष की कहानी सफलता की जुबानी ही अच्छी लगती है. नए भारत की कहानी अब शब्दों में बताने की आवश्यकता नहीं है .

janmat

विस्तार

संघर्ष की कहानी सफलता की जुबानी ही अच्छी लगती है. नए भारत की कहानी अब शब्दों में बताने की आवश्यकता नहीं है . भारत में 100 करोड़ डोज़ लेने के बाद आज देश के हर कोने में लोग सीना तान कर कोरोना की विश्वव्यापी महामारी को हराने की कहानी कह रहे हैं. इस शानदार सफलता के पीछे भारत के कड़े संघर्ष की कहानी है. कोरोना महामारी की त्रासदी से जब पूरी दुनिया तड़प रही थी. महामारी की कोई दवा नहीं थी. दुनिया के विकसित देश भी इस महामारी से हो रही मौतों को नहीं रोक पा रहे थे, तब भारत जैसे विशाल देश में कोरोना की संभावित भयावहता की कल्पना से पूरी दुनिया चिंतित हो रही थी. ऐसा माना जा रहा था कि जनसंख्या और क्षेत्रफल के हिसाब से स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थितियों को देखते हुए हिंदुस्तान में कोरोना का फैलाव विश्वव्यापी संकट बन सकता है.


भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पूरी सरकार महामारी की संभावना से हिले हुए थे. जब देश में लॉकडाउन लागू किया गया, तो लाखों प्रवासी मजदूरों का पलायन हुआ, पूरे देश में अफरा-तफरी मची हुई थी. एक-एक सांस के लिए लोग जूझ रहे थे. ऑक्सीजन का संकट चरम पर पहुंच गया था. तब हिंदुस्तान के राजनीतिक “विकारधारी” सब चीजों के लिए मोदी को जिम्मेदार ठहरा रहे थे. सवाल उठाए जा रहे थे कि लॉकडाउन गलत लगाए गए. मजदूरी रोजगार उद्योग सब ठप्प हो गए. जब कोई दवा नहीं थी तब यही तरीके थे, जिनसे नागरिकों को बचाया जा सकता था और त्रासदी के दुष्प्रभाव को कम किया जा सकता था. इन्हीं विपरीत परिस्थितियों में भारत में महामारी की दवा पर शोध शुरू किया. प्रधानमंत्री स्वयं वैक्सीन के शोध और निर्माण की निगरानी कर रहे थे. भारतीय वैज्ञानिकों और वैक्सीन निर्माताओं ने यह उपलब्धि हासिल की और महामारी से बचाव का टीका विकसित हो गया.

 


 

टीका विकसित होने के बाद उसे हर हिंदुस्तानी तक पहुंचाने की जद्दोजहद शुरू हुई. दिक्कत यह थी कि वैक्सीन को एक खास तापमान में रखने की आवश्यकता थी. भारत सरकार और उसकी टीम ने सुनियोजित ढंग से आईटी संसाधनों का उपयोग करते हुए टीके को सही तापमान पर राज्यों और जिलों तक पहुंचाने का चुनौतीपूर्ण अभियान शुरू किया गया. टीके खराब न हों, इसलिए जल्दी से जल्दी टीके  सही डेस्टिनेशन पर पहुंच जाएं इसके लिए हवाई जहाज का उपयोग किया गया. जो सरकारी विमान मुख्यमंत्रियों के लिए थे उनमें वैक्सीन को पहुंचाया गया. जब देश की जान पर आ पड़ी हो, तो कैसे काम किया जा सकता है, यह प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने करके दिखाया. स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े सभी लोग इसके लिए बधाई के पात्र हैं.

 


 

वैसे वैक्सीन और टीकाकरण पर राजनीति भी कम नहीं हुई. कुछ राजनीतिक “विकार्धारी” नेताओं ने तो टीकों को एक धर्म की भावना के खिलाफ तक बताया. लोगों को बरगलाया गया. आज जो 100 करोड़ डोज़ की उपलब्धि हासिल हुई है, वह और ज्यादा हो सकती थी, लेकिन राजनीतिक “विकार्धारियों” के कुत्सित  प्रयास से यह आंकड़ा 100 करोड़ तक ही पहुंच सका. कितनी वैक्सीन बर्बाद हुईं,  लेकिन अंत भला तो सब भला. आज कोरोना वायरस का फैलाव भारत में कम हुआ है. पूरा देश तेज गति से चल रहा है. अब न रोजगार बंद हैं  न हवाई जहाज. बस, ट्रेन और सिनेमाघर भी बंद नहीं हैं. सब कुछ खुल गया है, तो उसकी वजह वैक्सीन और टीकाकरण की गति है.

भारत ने न केवल अपने नागरिकों को निशुल्क वैक्सीन लगवाई, बल्कि दूसरे देशों को भी निशुल्क वैक्सीन दी. सफलता के दिन का जश्न मनाने के लिए बहुत सी रातों की कुर्बानी देनी पड़ती है. यही कुर्बानी प्रधानमंत्री मोदी और टीम इंडिया ने दी है. भारत ने जब आतंकवादियों पर पाकिस्तान में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक की थी, तब राजनीतिक विचारधाराओं ने उसके लिए सबूत मांगे थे. अब 100 करोड़ डोज़ की उपलब्धि के लिए गनीमत है कि मोदी से कोई सबूत सबूत नहीं मांगा जा रहा है .शायद यह उन लोगों के लिए किसी भी तिकड़म से सवाल उठाने का अवसर नहीं बन रहा है, नहीं तो राजनीतिक “विकार्धारी” सवाल जरूर उठाते. वैक्सीनेशन की सर्जिकल स्ट्राइक से दुनिया में नया भारत उभरकर सामने आ गया है. इस शानदार उपलब्धि के लिए मजबूत इच्छाशक्ति के साथ प्रबंधन कौशल और धन की भी आवश्यकता रही है.

भारत के लिए यह दौर चौतरफा चुनौतियों का रहा है. कश्मीर पर पाकिस्तान के कुचालों से निपटने के साथ पाकिस्तान को लिमिट में रखने का काम भी सरकार ने बखूबी किया. सीमाओं पर चीन की चालों को आंख में आंख डालकर भारत में मजबूती से जवाब दिया. अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे से जो त्रासदी आई, उसमें भी मोदी सरकार ने भारत और भारतीयों को सुरक्षित बचाया है. भारत के चारों तरफ सीमाओं पर चौकसी आज भारत की संप्रभुता के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण है. राजनीतिक “विकारधारियों” को यह सारी परिस्थितियां क्यों नहीं  दिखतीं ? राष्ट्र से जुड़े मुद्दों पर भी राजनीति शायद नए भारत में रुक जाए ,क्योंकि देश में जो नई परिस्थितियां उभर रही हैं ,उसमें ऐसी बातों को महत्व नहीं मिल रहा है. आज भारत अपने आंतरिक मामलों में अपनी भूमिका को बखूबी निभाते हुए हर क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलताएं हासिल कर रहा है. 

तो इसका श्रेय निश्चित ही मोदी सरकार को ज्यादा है. दुनिया को नए भारत का यह संदेश है कि भारत सामाजिक-आर्थिक- राजनीतिक और सामरिक दृष्टि से न केवल आत्मनिर्भर है, बल्कि दुनिया को मदद करने में भी सक्षम है. वैक्सीनेशन का काम सतत जारी है. बच्चों के टीकाकरण की रणनीति भी अंतिम चरणों में है. बहुत जल्दी बच्चों का टीकाकरण भी शुरू हो जाएगा. अभी वैक्सीन के डोज से बचे लोगों भी जल्दी ही समुचित डोज़ हासिल कर लेंगे, ऐसी उम्मीद है. किसी कवि ने कहा है कि, मंजिल क्या है, रास्ता क्या है, हौसला हो तो फैसला क्या है. नए भारत में हौसलों की कोई कमी नहीं है भारत की वैक्सीनेशन की सफलता यह साबित करती है कि जिनके हौसलों में जान होती है, सफलता उन्हीं के कदम चूमती है.