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बिडला मंदिर की स्थापना को हो रहे 57 वर्ष

सार

देवउठनी एकादशी को हुआ था उद्घाटन, भोपाल रेलवे स्टेशन से कभी दिखता था बिडला मंदिर

janmat

विस्तार

पंद्रह नवम्बर, सोमवार को भोपाल के प्रसिद्ध लक्ष्मीनारायण (बिडला) मंदिर के उदघाटन के 57 साल पूरे होने जा रहे हैं. इस मंदिर की स्थापना भोपाल के इतिहास का बहुत महत्वपूर्ण प्रसंग था.

किसी समय ख़ूबसूरत अरेरा पहाड़ी पर स्थित यह मंदिर  भोपाल रेल्वे स्टेशन और भोपाल के किसी भी कोने से से साफ़ दखाई देता था. यह भोपाल की स्काईलाइन हुआ करता था. लेकिन यह तब की बात है, जब भोपाल आज की तरह कांक्रीट के जंगल जैसा नहीं था. बिडला मंदिर में आज भी श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है. यहाँ से भोपाल का विहंगम दृश्य दखाई देता है. मंदिर की बनवाट और इसमें स्थित प्रतिमाएँ इतनी मनोहारी हैं, कि देखने वाले की नज़र इन पर से नहीं हटती.

आइए जानते हैं कि भोपाल की शान इस मंदिर के बारे में. भोपाल शहर के दक्षिण में मंत्रालय भवन के पास स्थित यह मंदिर श्रृष्टिपालनकर्ता भगवान् विष्णु और उनकी अर्धांग्नी देवी लक्ष्मी को समर्पित है. इसमें शिव, देवी दुर्गा और हनुमान मंदिर भी हैं. गर्भगृह में देवी लक्ष्मी और भगवान श्री नारायण की संगमरमर की सुंदर प्रतिमाएँ प्रतिष्ठित हैं. मंदिर का विस्तार 1.75 एकड़ में  है.  मंदिर के निर्माण की भोपाल के लोगों को बहुत उत्सुकता से प्रतीक्षा थी. कई वर्षों  के निर्माण के बाद एक दिन उनके  प्रिय मंदिर का निर्माण पूरा हो गया. इसके बाद मुख्यमंत्री द्वारकाप्रसाद मिश्र ने अरेरा पहाड़ी का नाम बदल कर "लक्ष्मी नारायण गिरि” कर दिया गया. हालाकि अब भी इसे आमतौर पर अरेरा पहाड़ी ही कहा जाता है.

इस भव्य मंदिर में प्राणप्रतिठा समारोह 15 नवंबर 1964 को संपन्न हुआ था. यह एक बहुत ऐतिहासिक समारोह था. शंखनाद, घंटों की मधुर ध्वनि और वैदक मंत्रोच्चार के बीच, तकालन मुख्यमंत्री डी.पी. मिश्रा ने लमीनारायण प्रतिमाओं तथा वेदिका को जनसामान्य के दर्शन के लिए खोला. यह देवोत्थान एकादशी का दिन था, जब देवता चार माह क नींद से उठते हैं.  हज़ारों कंठ "जय लमीनारायण'' का गगनभेदी  उदघोष कर उठे. विमान से मंदिर पर पुष्प वर्षा हुयी.

इस अनुष्ठान के मुख्य पुरोहित महान ज्योतिर्विद पंडित सूयनारायण व्यास थे. मंदिर के द्वार खुलते ही जनता ने उत्साह से भरकर मंदिर दर्शन के लिए टूट पड़ी. पुलिस को भीड़ पर नियंत्रण के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी. इस मंदिर में द्वार मंडप, मंडप, महामंडप, गभगृह हैं, जिनके पीछे परिक्रमा पथ है. शीर्ष पर शिखर स्थितहै.  गर्भगृह में प्रतिष्ठित लक्ष्मीनारायण की भव्य प्रतिमाओं की  मोहक मुस्कान बहुत अभुत है. मंडप के दोनों ओर छोटे मंदिर बने हैं. इनमें भगवान शिव और सिंहवाहिनी माँ दुर्गा की प्रतिमाएँ प्रतिष्ठित हैं. अंतराल के द्वार तथा स्तंभ पर आधारत मंडप की दीवारों पर वेद, रामायण, महाभारत, पुराण तथा अन्य धर्म ग्रंथों के अंश संगमरमर पर खुदे हुये हैं. संस्कृत में उत्कीर्ण के इन अंशों का नीचे हिन्दी और अंग्रेज़ी अनुवाद भी दिए गए हैं.

मंदिर का वास्तुशिल्प कुछ हद तक उत्तर भारत की "शिखर शैली का है, जो मध्यकाल में प्रचलित थी. मंदिर के सामने के प्रांगण का सौन्दर्यीकरण किया है. वहाँ लॉन, उद्यान, कुंड, फवारे इत्यादि मंदिर परिसर की सुंदरता को और बढाते हैं. दवार के ऊपर कुछ-कुछ अंतराल पर छोटे शिखर बने हैं.  मुख्य मंदिर  के सामने दोनों तरफ शिव और हनुमान की मढ़िया बनीं हैं.

मंदिर के पीछे बलुआ पत्थर से पुरातव संग्रहालय बना है. संग्रहालय में मुख्य रूप से प्राचीन और मध्य युग की  प्रतिमाएँ, पाडुलिपियाँ तथा पुरातात्विक महत्त्व की अन्य सामग्री प्रदर्शित की गयी है. इन्हें सम्पूर्ण मध्यप्रदेश और अन्य स्थानों से संगृहीत किया गया है. इस भवन में बिडला  कला एवं संगीत संस्थान तथा सेंटर ऑफ एडवांस्ड स्टडीज इन इंडोलोजी. खड़ी पहाड़ी के दोनों ओर श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए सीढ़या हैं. ये सीढ़यां तात्याटोपे नगर तथा पुराने भोपाल की तरफ बनी हैं. यह मंदिर वास्तु की दृष्टि से भोपाल के मुख्य आकर्षणों में में शामिल है.