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मुफ्तखोरी को बढ़ावा नहीं देना ही उचित

दिनेश मालवीय दिनेश मालवीय
Updated Tue , 19 Oct 06 : 49 PM IST

सार

श्रम की गरिमा के बिना देश का पतन निश्चित

janmat

विस्तार

दफ्तर जाते समय ट्राफिक सिग्नल पर लाल बत्ती होने से गाड़ियाँ रुकी थीं. मैं भी गाड़ी रोककर हरे सिग्नल का इंतज़ार करने लगा. एक बहुत बूढ़ा शख्स हाथ में कुछ पेन लिए उन्हें बेच रहा था. वह गाड़ी रोके खड़े हर व्यक्ति पास जाकर उनसे पेन खरीदने का अनुरोध कर रहा था. एक बाइक सवार ने उसे दस रूपये का नोट दिया, लेकिन उससे पेन लेने से इनकार कर दिया. यानि उसने उसे यह पैसे भिक्षा में दे दिये. बूढ़ा कुछ ठिठका. ऐसा लगा कि वह सोच रहा हो कि भीख का पैसा ले या नहीं, लेकिन फिर पैसे लेकर धीरे-धीरे आगे बढ़ गया.

मैं सोचता हूँ कि बाइक सवार ने यह सही किया या गलत? लगा कि उसने यह बिल्कुल गलत किया. उसने श्रम की गरिमा का ही नहीं, उस बूढ़े की खुद्दारी का भी अपमान किया. वह कोई भीख थोड़े ही माँग रहा था. फिर सोचा कि इसमें बूढ़े की बदहाली पर दया का भाव तो छिपा था. यह भाव सराहनीय तो है, फिर भी इसका महत्त्व तब था जब वह बूढ़ा भिक्षा माँग रहा होता. वह तो पेन बेचने का परिश्रम कर रहा था. बाइक सवार को पेन ले लेना था. वह भले ही किसी विद्यार्थी को दे देता. इससे बूढ़े में भी मुफ्त में पाने की आदत लग सकती है. वह दूसरों से भी ऐसी अपेक्षा कर सकता है.

यही सोचते-सोचते मुझे चुनावी प्रचार के दौरान नेताओं  द्वारा लोगों को तरह तरह के प्रलोभन देने की बात याद हो आयी. इस बुराई से कोई दल अछूता नहीं है. चुनाव में राजनैतिक दलों के चुनावी घोषणा-पत्रों में लोगों को बहुत कुछ मुफ्त में देने के वचन दिए जा रहे हैं. कोई कह रहा है हम लड़कियों को स्कूटी देंगे तो कोई मोबाइल फोन देने की बात कर रहा है. एक नेता ने चुनाव जीतने पर एक प्रदेश में हर महिला को एक-एक हज़ार रूपये महीना देने की बात कही है. कोई कह रहा है,कि हम इतने लाख सरकारी नौकरियां देंगे तो कोई लाखों रोजगार अवसर निर्मित करने की बात कर रहा है. रोजगार अवसर निर्मित करने की बात तो कुछ हजम भी हो जाती है, हालाकि यह भी लोहे के चने चबाने जैसा कठिन काम है, लेकिन लाखों सरकारी नौकरी की बात हाजमोला खाकर भी हजम नहीं होती. यह बिल्कुल चांद को जमीन पर लाने जैसी बात है.

मध्यप्रदेश में पिछले विधानसभा चुनाव में किसीने वायदा किया, कि किसानों की इतनी राशि तक के कर्ज माफ़ कर देंगे, तो कोई कह रहा था कि फलानी परीक्षा में अच्छे नंबर लाने वाली लड़कियों को स्कूटी दी जाएँगी. इसके अलावा और भी बहुत-सी चीजें मुफ्त में देने का वादा किया गया था. क्या यह सही है? सरकार  ग़रीबों को मुफ्त या नाम मात्र की कीमत पर अनाज, बिजली और न जाने क्या-क्या दे रही है. क्या यह सही है?

मन में यह बात आयी, कि इसके दो पहलू हैं. ग़रीबों को गरीबी से उबरने में मदद की दृष्टि से देखा जाए, तो यह सही है; लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह है कि लोगों में मुफ्तखोरी को बढ़ावा भी मिल रहा है. इसके कारण गरीब को हमेशा गरीब बने रहने का परोक्ष प्रोत्साहन भी मिल रहा है. मनुष्य का सहज स्वभाव है, कि जब सब कुछ सेंतमेंत में मिलने लगता है, तो वह सबकुछ ऐसे ही पाने की अपेक्षा रखता है. आखिर वह बूढ़ा भी तो दस रूपये लेकर चल ही दिया न! कर्ज माफ़ी करने से भविष्य में कोई भी भविष्य में यह सोचकर कर्ज नहीं लौटाएगा, कि अगले चुनाव में माफ़ हो ही जाना है.

इसमें ग़रीबों की भलाई का भाव तो बहुत कम है; वोट पाने का मकसद ज्यादा है. जरूरतमंदों की मदद करना बहुत अच्छी बात है. लेकिन यह तथ्य भी ध्यान रखना ज़रूरी है, कि कोई भी सुविधा शुरू करना आसान है, लेकिन उसे बंद करना नामुमकिन जैसा होता है. जब भी बंद करने की कोशिश करेंगे, तभी सुविधा पाने वाले आपसे नाराज़ होकर दूसरे पक्ष में हो जाएँगे. दूसरा पक्ष उस सुविधा को जारी रखने का वायदा कर सत्ता में आ जाएगा. फिर अगर उसने सुविधा बंद करने की कोशिश की, तो सुविधा पाने वाले उसे भी छोड़ देंगे. इसका कोई अंत नहीं है.

इसमें कोई दो राय नहीं है, कि सरकारों को गरीब और ज़रूरतमंदों की मदद करनी ही चाहिए. लेकिन यह मदद इस प्रकार करनी चाहिए, कि गरीब अपनी गरीबी से ऊपर उठ सकें और ऐसा समय भी आये, जब वे सरकार से कोई भी चीज़ मुफ्त में लेने से मना कर दें. मदद का काम इस तरह नहीं हो, कि वे हमेशा गरीब बने रहने को प्रोत्साहित रहें. लोगों में धीरी-धीरे ही सही, यह आदत विकसित करनी होगी, कि वे जिस सेवा या सुविधा का भोग करें, उसकी कीमत चुकाएँ. भले ही उन्हें कुछ रियायत दी जाए, लेकिन सबकुछ मुफ्त में देने या पाने की प्रवृत्ति राज्य और गरीबों दोनों के लिए आत्मघातक है.

इसके अलावा एक बात का जबाव तो मिलना ही चाहिए, कि राजनैतिक दल जो वायदे कर रहे हैं, उन्हें पूरा करने के लिए पैसा कहाँ से आएगा? इस सभी बातों को ध्यान में रखे बिना ग़रीबों की वर्तमान तरीके से मदद करना देश में मुफ्तखोरी को बढ़ावा देना ही है. इसे सही साबित करने का कोई तर्क नहीं हो सकता. लोगों को सही समय पर, सही गुणवत्ता की सेवा सही शुल्क पर मिले, यही मकसद होना चाहिए.