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संविधान पर ढाई-ढाई साल का राहुल विधान

सार

संविधान जो नहीं कहता वह कांग्रेस करती है. ढाई-ढाई साल सीएम पद का प्रावधान संविधान में नहीं है, लेकिन राहुल गांधी का विधान ढाई-ढाई साल का है. कई राज्यों में तो यह विधान लागू नहीं हो पाया. लेकिन कर्नाटक में तीन साल बाद सीएम का पोस्ट ट्रांसफर हो गया है. डीके शिवकुमार सीएम बन गए हैं. उन्हें दो साल सीएम रहने का मौका मिलेगा..!! 

janmat

विस्तार

    ढाई साल के लिए सीएम बने सिद्धारमैया ने तीन साल के बाद पद छोड़ा है. ऐसे ही नहीं छोड़ा, फिर हाई कमान से तमाम सौदे किए हैं. सरकार की कैबिनेट के मुखिया तो सीएम डी. के. शिवकुमार होंगे, लेकिन उसकी लॉयलटी विभाजित होगी. पीसीसी प्रेसिडेंट पर भी सिद्धारमैया खेमे का दावा रहेगा. उनका खेमा यही दबाव बना रहा है, कि उनकी सरकार में जो स्थिति डिप्टी सीएम के रूप में डी. के. शिवकुमार की थी. जो विभाग उनके पास थे,वही स्थिति सिद्धारमैया के प्रतिनिधि की होने की शर्त रखी गई है. उनके बेटे को भी मंत्रिमंडल में जगह देने की सौदेबाजी हुई है.

    मुख्यमंत्री के पास काम करने के लिए केवल एक साल ही बचा है. आखिरी साल तो चुनाव का ही साल माना जाता है. कांग्रेस ने पावर भले ट्रांसफर कर लिया हो लेकिन पार्टी सरेंडर मुद्रा में दिखाई पड़ रही है. डी.के. जो वोक्कालिंगा समाज से आते हैं, उसकी आबादी सीमित है. सिद्धारमैया अहिंदा की राजनीति करते हैं. वह ओबीसी से आते हैं. कर्नाटक में वोक्कालिंगा लिंगायत और अहिंदा तीन बड़े समूह हैं. डी. के. पार्टी के लिए ट्रबल शूटर हो सकते हैं. फाइनेंशियली संभवत डी. के. कांग्रेस के सबसे बड़े नेता माने जा सकते हैं. उन पर कई तरह की जांच भी हो चुकी हैं. उनका जनाधार पूरे कर्नाटक में फैला हुआ नहीं है. कांग्रेस और राहुल गांधी कितनी भी कोशिश करें लेकिन कर्नाटक का सियासी नाटक अगले चुनाव तक खत्म नहीं होगा. इस नाटक का अंत चुनावी पराजय के साथ ही समाप्त होगा.

    वैसे भी कांग्रेस में पिछले 25 साल से किसी भी राज्य में सरकारें रिपीट नहीं हुई हैं. कांग्रेस की सबसे आखिरी सरकार दिग्विजय सिंह की थी, जो दूसरी बार रिपीट हुई थी. जहां भी कांग्रेस एक बार जीत जाती है, वहां उसका गवर्नेंस और आंतरिक सत्ता संघर्ष इतना खराब होता है कि उसे दोबारा बहुमत प्राप्त नहीं होता. अभी जिन राज्यों में कांग्रेस की सरकारें हैं, वहां भी ऐसे ही हालात हैं. जब भी चुनाव होंगे, उन राज्यों में कांग्रेस सरकारों की वापसी लगभग असंभव दिखाई पड़ रही है.

    अगर जातिगत समीकरण के हिसाब से देखा जाए तो कांग्रेस का राजनीतिक लाभ सिद्धारमैया के साथ खड़े रहने में ही हो सकता था. राहुल गांधी केवल राजनीति में ही नहीं शासन-प्रशासन यहां तक की उद्योगपतियों और पत्रकारों में भी उनकी जातियों पर सवाल खड़े करते हैं. उनका नारा होता है कि जिसकी जितनी भागीदारी उसकी उतनी हिस्सेदारी. राहुल गांधी कहते हैं कि कांग्रेस ने ओबीसी और दलितों के मामले में अगर केंद्र की अपनी सरकार के समय गलतियां नहीं की होतीं तो यह समुदाय पार्टी से नहीं छिटकते.

    अतीत की गलतियों को समझते हुए भी राहुल गांधी ने ओबीसी सीएम को हटाकर सामान्य वर्ग के लीडर को सीएम बनाया है. यह निर्णय भी बहुत दबाव में हीं हुआ है. राहुल गांधी का रिपोर्ट कार्ड कांग्रेस को कमजोर करने का रहा है. कांग्रेस में बगावत के लिए भी उन्हें ही दोष दिया जाता है. कांग्रेस के कई ऐसे नेता हैं, जो पार्टी से बाहर जाने के बाद बीजेपी में न केवल संवैधानिक पदों पर पहुंचे हैं, बल्कि इन नेताओं ने बीजेपी के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. राहुल गांधी अपना कमिटमेंट शायद निभाते नहीं थे, लेकिन अब उनकी मजबूरी बन गई है कि अगर नहीं निभाएंगे तो भविष्य में भी नेता पार्टी से दूर होते जाएंगे.

    इसका एक और कारण यह दिखाई पड़ रहा है कि कांग्रेस में प्रियंका गांधी का रोल भी बढ़ता जा रहा है. प्रियंका गांधी के मर्यादित आचरण और बेहतर भाषण शैली की कांग्रेस के नेता ही नहीं बीजेपी के बड़े नेता भी प्रशंसा कर रहे हैं. केरलम में सीएम के चयन में भी मजबूरी में राहुल गांधी को वी. डी. सतीशन के नाम पर सहमत होना पड़ा. इसके पीछे ऊपर से तो मुस्लिम लीग के विधायकों का दबाव दिखाई पड़ता है लेकिन पीछे से पूरी राजनीतिक स्क्रिप्ट प्रियंका गांधी द्वारा ही लिखी गई लगती है. वह वायनाड से सांसद हैं. 

     कर्नाटक के लोगों को कांग्रेस की सरकार से क्या मिला, अगर इसका आंकलन किया जाएगा तो साफ दिखेगा कि कर्नाटक स्पष्ट बहुमत के बाद भी राजनीतिक अस्थिरता का शिकार बना हुआ है. राज्य के विकासको नई दिशा नहीं मिल सकी है.

     कांग्रेस आलाकमान ने सिद्धारमैया को दिल्ली बुलाकर जब रिजाइन करने का आदेश दिया था, तब बैंगलुरु पहुंचने के बाद पहले उन्होंने अपना राजनीतिक दांव चलने में कोई गलती नहीं की. उन्होंने राज्य सभा का ऑफर ठुकराया. ओबीसी जातियों के सरकारी सर्वे के निष्कर्ष को पब्लिक कर दिया. यह ऐसा पिंडोरा बाक्स है कि कांग्रेस कोलंबे समय तक इसके दुष्परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं.

   बीजेपी में नए नेतृत्व को मौका देने के लिए जब मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में नए नेताओं को सीएम बनाया गया तब कांग्रेस इन मुख्यमंत्रियों को पर्ची सीएम कहकर राजनीतिक तंज करती है. कांग्रेस में तो पर्ची नहीं पट्ठा सीएम की परंपरा चल रही है. डीके शिवाकुमार वैसे ही सीएम हैं.

    ढाई-ढाई साल सीएम की परंपरा तो संविधान में हेरा-फेरी है. जिन राज्यों में ढाई-ढाई साल सीएम का फॉर्मूला लागू नहीं हो पाया, वहां पर सीएम और डिप्टी सीएम लड़ते-लड़ते सरकार से बाहर हो गए. कर्नाटकमें पावर ट्रांसफर का सियासी नाटक भले हो गया हो लेकिन परिणाम वैसा ही होगा.