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गाय राष्ट्रीय पशु होगी तो काटने वाले सुधर जाएंगे?

सार

​​​​​​​ गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग बड़े-बड़े मौलाना उठा रहे हैं. हर राज्य से उठा रहे हैं. ऐसा लगता है, कि गौमाता की रक्षा को मिल रहे देशव्यापी समर्थन को देखते हुए यह मांग सौहार्द्र की चाशनी है. अगर गाय राष्ट्रीय पशु घोषित हो जाती है, तो क्या काटने वाले सुधर जाएंगे? 

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विस्तार

    क्या कोई कानून किसी को सुधार सकता है? गाय को माता कहा जाता है. गाय हमारी संस्कृति और आजीविका से जुड़ी हई है. कृषि प्रधान देश में गोवंश के बिना पहले खेती की कल्पना नहीं हो सकती थी. अब तो यंत्रीकरण हो गया है. देश में उसी की ज्यादा चर्चा होती है, जो राजनीति का विषय बन जाता है. जब देश में भारतीय संस्कृति और हिंदुत्व राजनीति की नजरों से दूर था तब ऐसी मांग नहीं उठी. अब कई राज्यों में गौ हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध है. 

    राज्यों के मुख्यमंत्री गौ हत्या की घटनाओं पर कड़ा रुख अपनाते हैं. अक्सर दिख जाएगा कि मुख्यमंत्री गायों की पूजा कर रहे हैं. दो दशक पहले ऐसा नजारा कम ही दिखता था. उमा भारती तो एमपी सीएम के रूप में हर दिन गाय की पूजा करती थीं. हर दिन तो नहीं लेकिन सबसे बड़े सूबे यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अक्सर गाय को पूजते दिखाई पड़ते हैं. बंगाल के नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने भी गौ पूजन की शुरुआत की है.

    बंगाल ऐसा राज्य था जहां बकरीद के अवसर पर गाय की कुर्बानी देने पर भी प्रतिबंध नहीं था. शुभेंदु सरकार ने पहली बार इस पर रोक लगाई. 

    पहली आवाज बंगाल में ही मुस्लिम समाज की ओर से आई, कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाए. फिर तो यूपी और कई दूसरे राज्यों से भी ऐसी ही मांगे उठने लगीं. विभिन्न समुदायों के बीच में उनकी आस्थाओं और धार्मिक प्रतीकों के प्रति सदासयता का वातावरण निश्चित ही देश हित में है, लेकिन इस मांग के पीछे के मंतव्य को योगी आदित्यनाथ बखूबी समझते हैं.

    यूपी के सीएम कह रहे हैं, कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग मौलाना उठा रहे हैं. हमारी संस्कृति में गाय को माता के रूप में माना जाता है. माता-पिता के मान सम्मान और संरक्षण के लिए क्या किसी घोषणा की जरूरत है. अगर यह मान भी लिया जाए कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित कर दिया जाता है तो फिर क्या इसको काटने वाले गौ हत्या बंद कर देंगे.

    अभी देश में राष्ट्रीय स्तर पर गौ हत्या प्रतिबंध नहीं है. कई राज्यों में गौ हत्या पर प्रतिबंध के कड़े कानून बनाए गए हैं. मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात, हरियाणा, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में गौ हत्या और वीफ की बिक्री पर सख्त प्रतिबंध है. उल्लंघन करने पर 10 साल तक की सजा का प्रावधान है. दूसरी तरफ नॉर्थ ईस्ट के कई राज्यों में इस पर प्रतिबंध नहीं है. राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में पहले से ही देश में राष्ट्रीय पशु बाघ, राष्ट्रीय पक्षी मोर और राष्ट्रीय धरोहर पशु हाथी घोषित है. इनके भी शिकार की घटनाएं सामने आती हैं.

    मनुष्य पशु को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग कर रहा है. पशु के पास यह अवसर नहीं है कि वह मनुष्य को राष्ट्रीय मनुष्य घोषित करने की मांग कर सके. मनुष्य खुद जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र, मजहब में बंटा हुआ है. जितने भी विवाद हैं, उन सब में पशु शामिल नहीं हैं. वह सब मनुष्य ही आपस में लड़ रहे हैं. अगर गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने से गौ हत्या रुक सकती है, तो फिर मनुष्य को राष्ट्रीय मनुष्य घोषित करने पर बहुत सारी समस्याओं का समाधान हो सकता है .

   इस मांग के पीछे भी राजनीति है. कई राज्य ऐसे हैं जहां प्रतिबंध नहीं हैं. ऐसे राज्यों में भी बीजेपी की सरकार है. और कई राज्यों में बीजेपी की सरकारों में गौ हत्या पर प्रतिबंध है. जो लोग इसकी मांग कर रहे हैं वह यह जानते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर पूरे देश के लिए इस पर कोई एक विधान नहीं बनाया जा सकता. इसलिए अपने कुकृत्यों को इस मांग के पीछे छुपाने की कोशिश की जा रही है. मांग करने वालों के मन में अगर गाय के प्रति इतना सम्मान है. गाय पर आस्था रखने वालों के प्रति आदर है,तो फिर बिना राष्ट्रीय पशु घोषित हुए भी मांग करने वालों का समाज गाय के प्रति यही भाव रख सकता है.

    भारत तो धर्म के आधार पर पहले ही विभाजित हो चुका है. इस्लाम के जो अनुयाई भारत को अपना राष्ट्र नहीं मानते थे उन्होंने अपने धर्म के लिए एक अलग राष्ट्र का निर्माण कराया. अभी भी आजादी के समय का मज़हबी चिंतन समाप्त नहीं कहा जा सकता है. अभी भी संविधान से ज्यादा पर्सनल विधान को प्राथमिकता दी जाती है. अभी भी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए राष्ट्रीयता के लिए घुसपैठियों को देश से बाहर निकालने पर राष्ट्रीय सहमति नहीं है.

    अभी भी भारत दुनिया का अकेला देश है जिसकी नागरिकता का कोई रजिस्टर नहीं है. एनआरसी का विरोध किया जाता है. गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग यह इशारा कर रही है कि लोग सुधारना चाहते हैं, लेकिन इसके लिए कानून जरूरी है. राष्ट्रीय मनुष्य बनेगा तो उसे वंदे मातरम राष्ट्रगीत गाने में कोई एतराज नहीं होगा. 

    संविधान पर पर्सनल कानून को प्राथमिकता देने की जिद नहीं होगी. देश के प्रत्येक नागरिक के लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड पर सर्वानुमति होगी. 

    अगर हर नागरिक राष्ट्रीय मनुष्य हो जाएगा, तो फिर देश में किसी भी माता-पिता को बुढ़ापे में संरक्षण के लिए सरकार को कानून नहीं बनाना पड़ेगा. भारत में माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम प्रभावशील है. यह कानून भारतीय संस्कृति और भारत की आत्मा को लहू-लुहान कर रहा है.