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कांग्रेस सरकार द्वारा युवाओं के साथ ऐसा धोखा? रोजगार योजना के 4200 लाख रुपए डुबाए..!  

सार

युवाओं को रोजगार देने के वायदे के साथ 15 साल बाद मध्य प्रदेश सरकार में आई कमलनाथ सरकार ने युवाओं के साथ ऐसा धोखा किया है जिसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं हो सकती|

janmat

विस्तार

कांग्रेस सरकार ने युवाओं को अस्थाई रोजगार देने के लिए युवा स्वाभिमान योजना 22 फरवरी 2019 को लांच की| एक साल के अंदर ही युवाओं की इस योजना ने दम तोड़ दिया| योजना के लिए निर्धारित बजट राशि में से 4200 लाख रुपए कांग्रेस सरकार ने डुबा दिए| जो राशि  युवाओं को रोजगार देने पर खर्च होनी थी वह कांग्रेसी सरकार उपयोग नहीं कर सकी| ये सरकार की किसी योजना को लागू  करने की इच्छाशक्ति और उस गवर्नमेंट की कार्यप्रणाली पर भी बड़ा सवाल है|

भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक के 31 मार्च 2020 को समाप्त हुए वर्ष के लिए विधानसभा में प्रस्तुत प्रतिवेदन में कांग्रेस सरकार की ये गडबडी उजागर हुयी है| इस वर्ष में युवा स्वाभिमान योजना के लिए नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के अंतर्गत  3300 लाख और  2400 लाख का बजट आवंटन उपलब्ध था| 

जब रोजगार सबसे बड़ी समस्या है तब रोजगार के लिए निर्धारित बजट को डुबा देना क्या कांग्रेस सरकार की आपराधिक लापरवाही नहीं कही जाएगी? क्या इस लापरवाही के लिए कांग्रेस के नुमाइंदे जनता को जवाब देने की हिम्मत करेंगे? 

प्रदेश के युवा रोजगार के लिए भटकते रहे और कमलनाथ सरकार पैसे होने के बाद भी बेरोजगारों को रोजगार उपलब्ध कराने में असफल सिद्ध हुई|

युवा स्वाभिमान योजना के शुरुआत के मौके पर तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ ने जो भाषण दिया था उसके मुताबिक उन्होंने कहा था कि “हमारा नौजवान भटकता रहा तो हमारे प्रदेश का भविष्य कैसे सुरक्षित रहेगा” हमें उन्हें  स्किल्ड करना होगा, युवाओं को नारे नहीं चाहिए, उन्हें रोजगार चाहिए, हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती रोजगार है, आज का युवा ठेका नहीं मांग रहा, रोजगार मांग रहा है| तत्कालीन मुख्यमंत्री का यह वक्तव्य युवाओं को बहुत भाया था और लाल परेड पर तालियां भी खूब बजी थी| 

सरकारों द्वारा इस तरह की शिगूफेबाजी  पहली बार नहीं हो रही है और ना आखिरीबार है| 

नेता शिगूफेबाजी से ही जनता को लुभाते और बरगलाते हैं| उनके वायदों और काम में कोई तालमेल नहीं होता| युवा स्वाभिमान योजना की भ्रूण हत्या उसी  कांग्रेस सरकार में हुई जिसने इस योजना को धूमधाम के साथ करोड़ों रुपए प्रचार और इवेंट पर खर्च कर लांच किया था|

युवा स्वाभिमान योजना का उद्देश्य यह बताया गया था कि नगरीय निकायों में निवासरत 21 से 30 वर्ष की आयु वर्ग के बेरोजगार युवाओं को 1 वर्ष में 100 दिवस का रोजगार उपलब्ध कराया जाएगा| युवाओं की रूचि के अनुसार ऐसे क्षेत्रों में कौशल प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा, जिससे भविष्य में उन्हें स्थाई रोजगार प्राप्त हो सके| योजना में पात्रता के लिए परिवार की समस्त स्रोतों से वार्षिक आय ₹2 लाख से कम होना चाहिए| योजना के अंतर्गत पात्र युवाओं को 1 वर्ष में 100 दिवस के लिए ₹4000 प्रति माह स्टाइपेंड पर नगरीय निकायों में अस्थाई रोजगार प्रदान किया जाएगा| योजना के क्रियान्वयन के लिए संबंधित नगरीय निकाय नोडल एजेंसी के रूप में निर्धारित किये गये थे|

कांग्रेस सरकार ने जब योजना घोषित की थी, तब योजना डॉक्यूमेंट में कहा गया था कि प्रदेश की कुल शहरी आबादी 2 करोड़ है| जिसमें से शहरी क्षेत्र में निवास करने वाले 21 से 30 वर्ष की आयु के युवाओं की जनसंख्या लगभग 17% है| यह युवा रोजगार की तलाश में यहां वहां भटकते हैं| समय पर रोजगार प्राप्त नहीं  होने से उनकी आर्थिक स्थिति भी कमजोर होती है, साथ ही वह मानसिक अवसाद से ग्रसित होकर गलत काम धंधे अपना लेते हैं| योजना डाक्यूमेंट के अनुसार युवाओं को समय पर रोजगार मिल जाए, वे अपने साथ-साथ अपने परिवार, समाज, प्रदेश की आर्थिक व सामाजिक दशा को एक नया स्वरूप प्रदान करने की क्षमता रखते हैं| कांग्रेस  सरकार ने इसी उद्देश्य से युवा स्वाभिमान योजना शुरू की थी|

कांग्रेस सरकार का उद्देश्य पवित्र व युवाओं के हित में दिखाई पड़ रहा था| लेकिन योजना लांच होने के बाद 1 वर्ष में योजना की क्या हालत हो गई?  ऐसा नहीं है कि किसी दूसरी सरकार ने इस योजना को पलीता लगाया है, बल्कि योजना के निर्माता कांग्रेस की सरकार अपने कार्यकाल में ही इस योजना को अमलीजामा पहनाने में फेल हो गई| फरवरी और मार्च 2020 के बीच, जब कांग्रेस के अंदर राजनीतिक संघर्ष प्रारंभ हो गया था, उसी दौरान कांग्रेस सरकार ने एक और शिगूफा छोड़ा और युवा स्वाभिमान योजना में मिलने वाले ₹4000 के भत्ते को ₹5000 करने  का निर्णय लिया| इस निर्णय के 1 माह के भीतर ही कांग्रेस की सरकार का पतन हो गया|

सवाल यह है कि जब स्टाइपेंड बढ़ाने का निर्णय लिया जा रहा था, तो क्या सरकार के अंदर किसी भी स्तर पर यह समीक्षा नहीं की गई कि योजना तो फ्लॉप हो गई है| योजना का बजट कांग्रेस की सरकार ने ही दिया था और पूरे साल कांग्रेस सरकार का बजट ही चलता रहा| कांग्रेस की सरकार 19 मार्च को गिरी थी और महालेखाकार की रिपोर्ट में 31 मार्च 2020 की स्थिति में लेखा परीक्षा प्रतिवेदन दिया है| सरकार की शिगूफेबाजी से आम लोगों विशेषकर युवाओं को जिस तरह का धोखा मिला है, उसे लापरवाही नहीं बल्कि अपराध की श्रेणी में माना जाएगा|

ये राजनीति का ही चरित्र हो सकता है कि अपराध करने वाले नेता इतने साहसी होते हैं कि फिर से जनता के बीच जाकर रोजगार देने का वायदा चीख चीख कर  करते हैं| चूंकि बाद में प्रस्तुत होने वाली ऑडिट रिपोर्ट पर किसी भी स्तर पर ध्यान नहीं जाता, इसलिए सरकारों द्वारा बातों में क्या कहा गया और वास्तव में क्या हुआ है यह जनता को पता ही नहीं लगता|  बिना वित्त के सरकार का कोई भी कार्य हो नहीं सकता| इसलिए इस शिक्षित युग में सरकारों की बातों पर नहीं बल्कि बाद में आने वाली ऑडिट रिपोर्ट पढ़कर असलियत स्वीकार करना चाहिए|

सरकारों में शिगूफेबाजी की प्रवृत्ति भी इसी जनजागृति से रुक सकती है| इसका रुकना राज्य के विकास के लिए बहुत जरूरी है| लोकलुभावन और बिना धनराशि के जनता से वायदे करना आज राजनीतिक दलों का फैशन सा बन गया है, जिसे वित्तीय कसौटी पर कसने से नेताओं पर थोड़ा बहुत अंकुश लग सकता है|