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बिना विचारे “अग्निपथ” खोल लिया सरकार ने

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Fri , 26 Feb

सार

अग्निपथ” योजना के खिलाफ बिहार से शुरू हुआ प्रदर्शन कई राज्यों में फैल गया है. मध्यप्रदेश  में भी कल केंद्र सरकार की इस योजना के खिलाफ जमकर विरोध-प्रदर्शन किया गया..!

janmat

विस्तार

भारत सरकार की “अग्निपथ” योजना के खिलाफ बिहार से शुरू हुआ प्रदर्शन कई राज्यों में फैल गया है | बिहार उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा और मध्यप्रदेश  में भी कल केंद्र सरकार की इस योजना के खिलाफ जमकर विरोध-प्रदर्शन किया गया| बिहार में ट्रेन में आग लगा दी गयी। राजस्थान, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय राजमार्ग को बाधित कर दिया गया। बिहार और उत्तर प्रदेश में कई जगहों पर आगजनी हुई है| कई ट्रेन रद्द करना पड़ी कई के मार्ग बदल दिए गए हैं |सवाल इस योजना से जुड़े बहुत से हो सकते हैं, सरकार के आमन्त्रण को स्वीकार या अस्वीकार करना मुद्दा हो सकता है, परन्तु ऐसा विरोध कई और सवाल खड़े करता है |

“अग्निपथ” केंद्र सरकार के डेढ़ साल के भीतर दस लाख सरकारी नौकरियां देने की घोषणा  का अंग है। विभिन्न विभागों में इतनी नौकरियां संभवतः पहली बार दी अ रही है |इनमें सबसे प्रमुख, सेना के तीनों अंगों में ४६००० जवानों की भर्ती है । विरोधी राजनीतिक दल और कुछ सैन्य विशेषज्ञ इसे उचित नहीं मान रहे। तर्क है, कि अल्पकालिक सेना लाखों युवकों को बेरोज़गार कर देगी। साढ़े १७  वर्ष का किशोर जब युवा होकर इस सेना से निकलेगा तब उसके समक्ष नौकरी का संकट होगा। क्योंकि चार साल में उसकी शैक्षणिक योग्यता सिर्फ़ बारहवीं की होगी और ट्रेनिंग के नाम पर महज़ हथियार चलाना उसे आता होगा। यह सैन्य प्रशिक्षित युवाओं की भीड़ बाहर आ कर अराजक नहीं हो जाएगी, इसकी क्या गारंटी? विरोध करने वाले भी पुख़्ता तौर पर कुछ नहीं बोल पा रहे। अलबत्ता राजनीतिक विरोधियों की बात अलग है।

पहली नज़र में यह सेवा अनिवार्य सैन्य सेवा की तरह प्रतीत होती है। इसकी भर्ती भी सेना की अखिल भारतीय चयन समिति करेगी। नियमित सेवा और इस सेवा के चयन की पद्धति समान होगी। किंतु इस सेवा में कार्यकाल बहुत संक्षिप्त है और पेंशन व ग्रेच्युटी का भी प्रावधान नहीं रखा गया है। प्रथम विश्व युद्ध के समय १९१४ में यूरोप में अनिवार्य सैन्य सेवा शुरू हुई थी और आज भी कई मुल्कों में जारी है। कम्युनिस्ट शासन वाले देशों में तो शस्त्र संचालन का प्रशिक्षण हर एक को लेना ही पड़ता है। इस तरह से जो नई भर्ती की जा रही है, उससे उनकी पढ़ाई बाधित होगी। वे सैन्य प्रशिक्षण तो पा जाएंगे, परंतु उनका भविष्य बहुत उन्नत नहीं होगा, इस बात का अंदेशा है |

आज विश्व १५ देशों में अनिवार्य सैनिक सेवा है।जिनमें इस्राइल, बरमूडा, ब्राज़ील, साइप्रस, ग्रीस, ईरान, नॉर्थ कोरिया और साउथ कोरिया, मेक्सिको, रूस, सिंगापुर, स्विट‍्ज़रलैंड, थाइलैंड, तुर्की और संयुक्त अरब गणराज्य शामिल हैं । इस्राइल में ढाई वर्ष की यह अनिवार्य सैनिक सेवा पुरुषों के लिए है और दो वर्ष की सेवा स्त्रियों के लिए भी। इस दौरान उन्हें सारे शस्त्रों के संचालन की शिक्षा दी जाती है। बरमूडा के नागरिकों के लिए अनिवार्य सैनिक सेवा का नियम है। १८  से ३२ वर्ष की उम्र के लोगों को यह ट्रेनिंग मिलती है। । स्वास्थ्यगत आधार पर छूट मिलती है या फिर विश्वविद्यालयी शिक्षा लेने वालों को। लेकिन जैसे ही वह युवक शिक्षा पूरी कर लेता है, सैन्य प्रशिक्षण उसे लेना ही पड़ता है। उत्तरी कोरिया में यह ट्रेनिंग १४ से १७  की उम्र के बीच शुरू होती है और युवा को ३०  वर्ष की उम्र तक सैन्य प्रशिक्षण लेना पड़ता है। मेक्सिको में १२ वीं पास करने के बाद सैन्य ट्रेनिंग दी जाती है। सिंगापुर में तो राष्ट्रीय सेवा (एनएस) की ट्रेनिंग न लेने वालों को१०  हज़ार डॉलर का जुर्माना देना पड़ता है अथवा तीन साल की जेल हो सकती हो । कुल मिलाकर अधिकांश देशों में इस तरह का सैन्य प्रशिक्षण मिलता  है।

सेना किसी भी राष्ट्र का एक महत्वपूर्ण अंग है, वह न केवल राष्ट्र की संप्रभुता की रक्षा करती है, बल्कि उस देश की सीमाओं की भी। कई बार आंतरिक संकट में भी उसकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में सेना में यह नया प्रयोग किया जा  रहा है । सरकार को पूरा विचार और मंतव्य स्पष्ट करना था , कि चार वर्ष में ये जवान कौन-कौन से शस्त्र चलाने का प्रशिक्षण पाएंगे? सेना की पूर्णकालीन भर्ती तो बाधित नहीं होगी? सेना के पूर्णकालिक जवानों और इस संविदा सेवा वाले भर्ती के जवानों के बीच कोई विभाजन रेखा होगी? सवालों के समाधान  आना चाहिए, तब तक ऐसे आंदोलन का क्या औचित्य है ? तक सैन्य विशेषज्ञ इस सेवा को संदेह की नज़रों से रहे हैं । यह भी साफ़ होना चाहिए कि इस योजना के तहत किन-किन हथियारों को चलाने का प्रशिक्षण जवानों को मिलेगा| ब्रह्मोस, पिनाका, वज्र जैसे हथियार चलाना आसान नहीं है।

एक और बात चिंताजनक है। न तो इसे अनिवार्य सैनिक शिक्षा स्कीम के तहत रखा गया है, न यह विधिवत रोज़गार है। इसलिए लोगों को लगता है कि ट्रेनिंग के बाद जब ये युवक सेवा मुक्त होंगे तब क्या करेंगे? अग्निपथ के अग्निवीर के पास व्यावसायिक प्रशिक्षण भी होगा, जिसके चलते इस पर अंगुलियां उठी हैं,  फ़िलहाल सरकार की मंशा को देखते हुए यह तो कहा ही जा सकता है कि ऐसे प्रशिक्षणों से रोज़गार का संकट दूर किया जा सकता है, परन्तु काफी सोच विचार कर |