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हाइब्रिड युद्ध मॉडल और भारत-चीन सम्बन्ध

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Tue , 23 Apr

सार

विवादित क्षेत्र भारत-चीन तनावपूर्ण संबंध का एक महत्वपूर्ण पहलू है। यूक्रेन के लिए पैदा हुई सामरिक चुनौती जैसी स्थिति से निपटने के लिए भारत यदि खुद को तैयार करना चाहता है, तो उसे इससे सामरिक संचार और राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर सही सबक सीखना होगा।

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विस्तार

भारत को इस मुद्दे पर अब गंभीरत से सोचना शुरू कर देना चाहिये, क्योंकि जिस तरह से यूक्रेन का संकट सामने आया है, इसे हाइब्रिड युद्ध मॉडल का विस्तार कहा जा सकता है, जिसे मॉस्को ने पुतिन के नेतृत्व में सीरिया से लेकर कजाकिस्तान और अब मध्य यूरोप तक सफलतापूर्वक आगे बढ़ाया है। इस घटनाक्रम में मजबूत सूचना अभियान के साथ सैन्य चढ़ाई की गई और उन्माद का पूरा इस्तेमाल किया गया, जो ब्रिंकमैनशिप रणनीति अर्थात घटनाओं को सक्रिय संघर्ष का रूप देकर फायदा उठाने की रणनीति की पुष्टि हुई । यह परिस्थिति चीन के साथ तनातनी के संदर्भ में भारत को कुछ संकेत देता है, भारत को गंभीरता से सोचना होगा |

इतिहास कहने को भारत के पक्ष में है, भारतीय सेना को अक्तूबर, १९६२ से लेकर गलवान तक पीपुल्स लिबरेशन आर्मी से मुकाबला करने का अच्छा-खासा अनुभव है, लेकिन यह चीन का मौजूदा हाइब्रिड मॉडल एक नया अध्याय है| इसके अध्याय में शामिल है -बुनियादी ढांचे का तीव्र निर्माण, विशेष जनसांख्यिकीय का फायदा उठाना, घरेलू कानूनों को मजबूत बनाना और एक अभिनव सूचना अभियान द्वारा पीड़ित-कार्ड खेलना व इस बात को लेकर जनभावना का निर्माण । इसके विपरीत भारत ने अब तक इसको लेकर उदासीनता बरती है। गलवान के बाद सूचना को लेकर हीला-हवाली इसका उदाहरण है। जून, २०२० में हिंसक झड़प के बाद साल २०२१ की शुरुआत तक भारत ने कुछ सामरिक लाभों को इस उम्मीद में गंवा देना पसंद किया कि इससे बातचीत के लिए जरूरी राजनीतिक व राजनयिक ढांचा तैयार हो जायेगा । मगर एक साल से भी अधिककालावधि के बाद भारत की वह उम्मीद धराशायी हो चुकी है। बीजिंग का दावा करता रहता है कि नई दिल्ली का अगंभीर रुख इसकी वजह है।

दुखद तो यह है कि गलवान हिंसा और वास्तविक नियंत्रण रेखा की स्थिति के बारे में हमारा सामरिक संचार सामान्य से कमतर रहा है। केंद्र सरकार ने यह कहते हुए राष्ट्रीय संप्रभुता की चुनौती को परे धकेलने का फैसला किया कि कोई भी भारतीय क्षेत्र गंवाया नहीं गया है। इसी तरह, होशियारपुर की एक चुनावी रैली में भारतीय रक्षा मंत्री ने भी दावा किया कि गलवान में चीन को एक इंच जमीन पर भी कब्जा नहीं करने दिया गया है। इन सब बयानों ने पीएलए के सीमा उल्लंघन को लेकर आम लोगों को भ्रमित कर दिया गया है। जबकि, चीन अब भौतिक रूप से वास्तविक नियंत्रण रेखा पर १९५९ के अपने दावे के करीब पहुंच गया है।

वास्तविक नियंत्रण रेखा की मौजूदा स्थिति और गलवान के बाद भारत की सामरिक स्थिति व गश्त संबंधी मुश्किलों के बारे में पूर्व राजनयिकों के बयान भी सामने आये हैं जो कहते हैं भारत ने पूर्वी लद्दाख के कुछ क्षेत्रों में गश्त करने के अपने अधिकार गंवा दिए हैं, लेकिन इससे इनकार नहीं है कि भारतीय सैनिकों को उन इलाकों में गश्त करने से चीनी सैनिक रोक रहे हैं, जहां वे गलवान घटना से पूर्व नियमित रूप से गश्ती किया करते थे। देपसांग मैदान, हॉट स्प्रिंग्स और गोगरा क्षेत्रों में यह स्थिति बनी हुई है। कहने को हम यह कह सकते हैं कि भारत ने किसी भी क्षेत्र पर अपना दावा छोड़ा नहीं है, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति यही है कि कई ऐसे क्षेत्र हैं, जहां अब हमारी भौतिक पहुंच नहीं है।

साफ है, विवादित क्षेत्र भारत-चीन तनावपूर्ण संबंध का एक महत्वपूर्ण पहलू है। यूक्रेन के लिए पैदा हुई सामरिक चुनौती जैसी स्थिति से निपटने के लिए भारत यदि खुद को तैयार करना चाहता है, तो उसे इससे सामरिक संचार और राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर सही सबक सीखना होगा।