• India
  • Wed , May , 29 , 2024
  • Last Update 05:02:PM
  • 29℃ Bhopal, India

लता जी याने एक छोटी सी गुड़िया की लंबी कहानी...

सार

रविवार की अलसाई और अनमनी सी सुबह बहुत मनहूस सी लगी। मेरी नींद हमारे ऑफिस आईएनडी 24 से आए फोन की घण्टी बजने पर खुली। हेलो कहते ही खबर मिली कि भारत रत्न लता जी नहीं रहीं।

janmat

विस्तार

पिता का गायन सुना...गुनगुनाया और सुरों में समा गईं| 

ना काहू से बैर/राघवेंद्र सिंह:

नया इंडिया/ भोपाल:

रविवार की अलसाई और अनमनी सी सुबह बहुत मनहूस सी लगी। मेरी नींद हमारे ऑफिस आईएनडी 24 से आए फोन की घण्टी बजने पर खुली। हेलो कहते ही खबर मिली कि भारत रत्न लता जी नहीं रहीं। 

सदमे वाली इस खबर के बाद पूरा दिन ही टीवी पर लताजी की ख़बरों के साथ उनके गाने और उनसे जुड़े किस्से सुनते सुनते बीता। बीच बीच में बरबस ही आंखें भर जाती और कभी कभी उनसे जुड़ी मोबाइल पर आती खबरें पढ़ते गला भर जाता। 

गुलज़ार सा से लेकर उनके जीवनीकार हरीश भिमानी जैसे जानेमाने दिग्गज टीवी पर लता जी पर बातें कर रहे थे। खास बात यह थी कि उनकी आंखें भी बरस रही थीं और गला रुंध रहा था। 

लताजी ने 1963 में जब कवि प्रदीप जी का लिखा गाना - 

ए मेरे वतन के लोगों जरा आंख में भर लो पानी जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा याद करो कुर्बानी... तब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से लेकर हर सुनने वाली की आंखें आंसुओं से भरती आती रही हैं। 

आज जब वे हवा में खुशबू की तरह घुल गई तब पूरा देश और तमाम दुनिया में उनको जानने और चाहने वाले की आंखें नम थीं। 

जब वे बीमार होकर अस्पताल में थी तब भी संगीत से उनका नाता कम नहीं हुआ। वेंटिलेटर पर होने के बाद भी उन्होंने अपने पिता और गुरु महान संगीतकार दीनानाथ मंगेशकर का संगीत सुनने की इच्छा जताई। फिर हेडफोन लगा कर सुना भी और सुनते सुनते डॉक्टर के मना करने पर भी बीच बीच में वेंटिलेटर हटाकर सुर मिलाने की कोशिश करतीं। 

ऐसा लगा कि वे सुरों में ही समाने लगी और फिर शांत हो गईं। सुर साम्राज्ञी संगीत में जन्मी, संगीत को साधने के लिए सम्पूर्ण जीवन साधनारत रही और उसी में विलीन हो गई। उनके गाने को सुन देश की आज़ादी के लिए संघर्ष करने वाले महीनों जेल में गुजारने और राष्ट्रपिता गांधी की हत्या पर खुद को संभालने वाले प्रधानमंत्री नेहरू भी रो दिए थे। 

उन्होंने मंच पर लता जी से कहा आपने मुझे रुला दिया। इसके बाद उन्हें पूरा देश स्वर कोकिला कहने लगा। विभिन्न भाषाओं के फिल्मी दुनिया मे करीब तीस हजार से अधिक गाने गाकर वे बच्चे, बूढ़े और युवाओं के दिल की आवाज बन गईं। 

अपनी मां और पिता को मात्र तेरह बरस की उम्र में खोने के बाद परिवार में सबसे बड़ी बहन होने के नाते उनके ऊपर तीन बहन और एक भाई के जीवनयापन का जिम्मा आ पड़ा था। इसके बाद काम की तलाश के साथ सबको पालने पोसने का काम करते करते वे कोल्हापुर, पुणे होते हुए मुंबई आ गई।  

फिर शुरू हुई पहाड़ जैसे संघर्ष की कथा। वे थीं तो संगीत साधक लेकिन उनका जीवन एक वीरांगना से कम नही था। वे क्षत्राणी तरह फिल्मी दुनिया के समर में सदा सफल होती रही। उनका संगीत और जीवन दोनों ही बेदाग रहे। पूरे देश की लता दीदी ने खुद अविवाहित रह कर अपने सभी भी बहनों को कामयाब बनाने में मां और पिता की भूमिका अदा की और निष्कलंक जीवन को जस की तस धर दीनी चदरिया वाले अंदाज़ में आज सबको रुलाते हुए विदा हो गईं। 

गुलजार सा कहते हैं लता जी उन महान विभूतियों में हैं जो सौ साल में एक नहीं बल्कि उनके जैसे कभी पैदा नहीं होते। 

मैं तो संगीत को उतना ही समझता हूं जो एक सड़क चलता आम आदमी जानता है। लेकिन लताजी के गानों में जो मिठास है वह गूंगे को स्वाद बताने और बहरे को सुनने के अहसास से परिचित करा देती है। बॉलीबुड के हल्के फुल्के संगीत से लेकर गायन वादन के शिखर पर बैठे मूर्धन्य मनीषियों को भी अपने सुर में बांधने और अभिभूत करने का तप उनके पास था। 

मात्र तेरह की किशोर वय से उनका गायन शुरू हुआ तो फिर लगा उन्होंने हिमालय तो क्या आसमान जैसी ऊंचाई हासिल की और समंदर जैसी गहराई भी पाई। 

लोकगायन से लेकर फिल्मी, गीत- ग़ज़ल और भजन तक में एक एक कर कीर्तिमान स्थापित किए। जन जन से मिली स्वर कोकिला उपाधि से लेकर भारत रत्न जैसे सम्मान उन्हें मिले। लेकिन हर बार उनके आचरण व्यवहार और योग्यता के साथ कठिन साधना के समक्ष वे उनसे बड़े कभी नही लगे। 

आज उनकी अंतिम विदाई में प्रधानमंत्री नरेन्द्रमोदी ने उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित कर उनके आदमकद को प्रमाणित किया है। लता जी के गाने हर दौर में फिट हैं। शहनाई से लेकर विदाई तक कभी खुशी कभी गर्व से भरने वाले तो कभी आज़ादी और गणतंत्र दिवस की सालगिरह पर आज़ादी के दीवानों और देश की रक्षा में जान कुर्बान करने वालों के लिए आंखों में आंसू लाने वाले हैं। 

मध्य प्रदेश के इंदौर में जन्मी लता जी के पुरखे गोवा के, कर्मक्षेत्र कोल्हापुर से लेकर पुणे होते हुए मुम्बई बना और फिर वे हो गईं पूरे देश की। उनके पार्थिव देह मुंबई के शिवाजी पार्क में जरूर पंचतत्व में विलीन हो गईं, लेकिन वे लोगों के दिलों में और हवाओं में खुशबू की तरह हमेशा रहेंगी। 

लता दीदी याने छोटी सी गुड़िया की लंबी कहानी...दीदी जैसा न भूतो न भविष्यति...

विनम्र श्रद्धांजलि...कोटि कोटि नमन...