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रूस को नीचा दिखाने के लिए नाटो ने यूक्रेन को बनाया मोहरा

सार

दुनिया के कई देश पुतिन से युद्ध रोकने की अपील कर रहे हैं ।‌‌‌‌‌‌‌रूस और अमेरिका के बीच तीसरे दौर की बातचीत भी हो चुकी है और अब तुर्की में दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के बातचीत होने जा रही है लेकिन बातचीत शुरू होने के पहले ही रूस यूक्रेन के सामने जो शर्तें रख देता है उनके कारण बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकलता।

janmat

विस्तार

रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू हुए दो सप्ताह का समय बीत चुका है परंतु  इस युद्ध का कोई नतीजा नहीं निकला है। रूस ने जब यह युद्ध प्रारम्भ किया था तब शायद उसने भी यह नहीं सोचा होगा कि यूक्रेन उसकी ताकत के आगे इतने दिनों तक ठहर पाएगा।दो सप्ताह  पूरे के होने कै बाद भी यूक्रेन ने अभी तक अपनी हार स्वीकार नहीं की है यद्यपि उसके अधिकांश शहर रूसी हमलों में तबाह हो चुके हैं। रूस के ताबड़तोड़ हमलों ने यूक्रेन  की बड़ी बड़ी इमारतें खंडहर में तब्दील हो चुकी  हैं। वहां के अनेक शहरों की सड़कों पर सन्नाटा पसरा हुआ है। रूसी हमलों के डर से यूक्रेन से अब तक 18 लाख से  अधिक लोग पलायन कर चुके हैं और यह सिलसिला जल्दी थमने वाला नहीं है। इस बीच यह भी सुनने में आ चुका है कि यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने भी अपना देश छोड़कर पड़ोसी देश पोलेंड में शरण ले ली है परंतु  उन्होंने इस खबर का खंडन करते हुए कहा है कि मैं कीव में ही डटा हूं।

नाटो में शामिल देशों और उनके मुखिया अमेरिका ने यूक्रेन के राष्ट्रपति को यह भरोसा दिलाया था कि  यूक्रेन पर रूस की चढ़ाई होने की स्थिति में नाटो के सदस्य देश उसकी पूरी मदद करेंगे परंतु वह मदद यूक्रेन को तब मिली जब रूसी सेना के ताबड़तोड़ हमलों में यूक्रेन के अनेक शहर तबाह हो गए। इसी बीच अमेरिका ने साफ साफ कह दिया कि वह यूक्रेन में अपनी सेनाएं नहीं भेजेगा। नाटो देशों ने इस युद्ध में  यूक्रेन की जो मदद की  है उसके बल पर यूक्रेन  रूस की सैन्य ताकत का लंबे समय तक मुकाबला नहीं कर सकता लेकिन इस मदद ने उसके अंदर थोड़ा मनोबल जरूर  पैदा कर दिया है। दरअसल यूक्रेन को जो जो मदद  अब नाटो देशों से मिल रही है उसके पीछे नाटो देशों की यही मंशा है कि यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की रूस के साथ लड़ाई जारी रखें। अमेरिका और अन्य यूरोपीय देशों के उकसाने पर ही उन्होंने रूस से संधि न करने का विकल्प चुना और नाटो में शामिल होने की उनकी लालसा ही रूस के साथ यूक्रेन की शत्रुता का सबसे बड़ा कारण बन गई।

यूक्रेन को दूसरे देशों से जो मदद अब मिल रही है उसके बल पर यूक्रेन अपनी पराजय को चंद दिनों के लिए ही टाल सकता है।  यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की को भी इस कड़वी सच्चाई का अहसास हो चुका है इसीलिए उनके मन की पीड़ा  समय उजागर हो गई जब उन्होंने कल अमेरिका के सांसदों से कहा कि वे यूक्रेन के राष्ट्रपति को आखरी बार देख रहे हैं। गौरतलब है कि युद्ध शुरू होते ही नाटो देशों का साथ न मिलने पर जेलेंस्की ने का यह  कहना भी उनकी विवशता का परिचायक था कि यूरोपीय समुदाय और  नाटो ने उन्हें अकेला छोड़ दिया है। युद्ध के दो हफ्ते बीत जाने के बाद भी यह स्थिति है कि यूरोपीय समुदाय के देश यूक्रेन को सदस्यता प्रदान करने के लिए  एकमत नहीं हैं। जर्मनी और स्विटजरलैंड ने तो खुलकर विरोध भी कर दिया है।

जेलेंस्की की यूक्रेन को नो फ्लाई जोन  घोषित करने की मांग भी नाटो ने नहीं मानी है। नाटो ने यह भी  स्पष्ट कर दिया है कि वह इस युद्ध का हिस्सा नही है। यूरोपीय यूनियन  की असमंजस की स्थिति यूक्रेन पर भारी पड़ रही है। यूक्रेन  के राष्ट्रपति जेलेंस्की को अब यह पछतावा अवश्य हो रहा होगा कि नाटो और उसके मुखिया अमेरिका का भरोसा करने के बजाय उन्होंने विनाशकारी युद्ध शुरू होने के पहले ही रूस के राष्ट्रपति पुतिन से संधि कर ली होती तो वे शायद  अपने देश को  तबाह होने से बचा सकते थे। ऐसा प्रतीत होता है कि अमेरिका ने यूक्रेन को रूस के विरुद्ध अपने मोहरे के रूप में इस्तेमाल करने की योजना पहले ही  बना रखी थी जिसे यूक्रेन के वर्तमान राष्ट्रपति समझ नहीं पाए। कुल मिलाकर यूक्रेन काफी हद तक नाटो के विश्वासघात का शिकार बन चुका है लेकिन अमेरिका  की प्रतिष्ठा को भी कम धक्का नहीं पहुंचा है। दूसरी ओर रूस के राष्ट्रपति पुतिन  इस  युद्ध के माध्यम से सारी दुनिया को अपने देश की ताकत का अहसास कराने में सफल रहे हैं । गौरतलब है कि गत वर्ष अफगानिस्तान की जनता को बर्बर तालिबान शासकों के रहमो-करम पर छोड़ कर अपने देश की सेनाओं को वहां से वापस बुलाने के फैसले से अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन की प्रतिष्ठा जिस तरह धूमिल हुई थी वही स्थिति एक बार फिर दिखाई दे रही है। अमेरिका के इस तर्क को तो काफी हद तक स्वीकार किया जा सकता है कि वह अगर युद्ध में कूदेगा तो  उससे तीसरे विश्व युद्ध की शुरुआत होने का संकट पैदा हो सकता है परंतु उसने पहले जिस तरह यूक्रेन की पीठ थपथपाई और बाद में पीछे हट गया उससे तो यही प्रतीत होता है कि  उसने रूस को नीचा दिखाने की मंशा से यह खेल खेला । इसमें कोई संदेह नहीं कि  रूस की ताकत के आगे यूक्रेन ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाएगा परंतु इस हकीकत से भी अमेरिका  मुंह नहीं मोड़ सकता कि पुतिन  अपने इस कदम से अमेरिका को यह संदेश देने में सफल रहे हैं कि अमेरिका अब खुद को दुनिया का दरोगा नहीं मान  सकता। अमेरिका और नाटो के बाकी सदस्य देशों को अब यह प्रश्न भी सताने लगा है कि यूक्रेन पर कब्जा कर लेने में मिली सफलता क्या पुतिन को पहले से अधिक महत्वाकांक्षी नहीं बना देगी। आज की तारीख में तो पुतिन  खुद को दुनिया  के महानायक के रूप में देख रहे हैं। 
 

दुनिया के कई देश पुतिन से युद्ध रोकने की अपील कर रहे हैं ।‌‌‌‌‌‌‌रूस और अमेरिका के बीच तीसरे दौर की बातचीत भी हो चुकी है और अब तुर्की में दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के बातचीत होने जा रही है लेकिन बातचीत शुरू होने के पहले ही रूस यूक्रेन के सामने जो शर्तें रख देता है उनके कारण बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकलता। रूस के राष्ट्रपति पुतिन बार बार यह कह चुके हैं कि यूक्रेन की सेना जब तक हथियार नहीं डालती और जेलेंस्की  यूक्रेन को तटस्थ राष्ट्र घोषित नहीं करते तब रूस के हमले जारी रहेंगे। इस बीच मध्यस्थता के प्रयास भी शुरू हो गए‌ । इजरायल के प्रधानमंत्री ने रूस के राष्ट्रपति से बात की है । फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रो भी पुतिन से बात कर चुके हैं परंतु अभी भी निकट भविष्य में युद्ध रुकने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं। पश्चिमी देश भी युद्ध रुकवाने के बजाय यूक्रेन  को रूस के संघर्ष जारी रखने के लिए  उकसा रहे हैं। अमेरिका की भी कहीं न कहीं यह मंशा जरूर है कि युद्ध जितना लंबा खिंचेगा, उतनी ही कठिन आर्थिक चुनौतियां का सामना रूस को  करना पड़ेगा। पश्चिमी देशों ने युद्ध शुरू होने के बाद रूस पर आर्थिक प्रतिबंध तो लगाए हैं परंतु उन्होंने यह यह भी साफ कह दिया है कि वे रूस से तेल और गैस का आयात नहीं रोकेंगे ।  उधर रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने यूक्रेन पर विजय को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का प्रण कर लिया है। रूस को इस युद्ध के कारण जिन आर्थिक मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है वह फिलहाल पुतिन की चिंता का विषय नहीं है।
 

भारत ने रूस के साथ अपने पुराने रिश्तों का सम्मान करते हुए संतुलित रुख अपनाया हुआ है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भी रूस के विरुद्ध प्रस्ताव पर मतदान से अनुपस्थित रहकर भारत ने सारे मामले में तटस्थ रहने का जो फैसला किया उसकी देश में भी सराहना हो रही है । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रूस के राष्ट्रपति पुतिन और यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की कल फोन पर अपनी लंबी वार्ता में दोनों के बीच सीधी बातचीत का जो सुझाव दिया है उसी से इस गंभीर समस्या का समाधान  का रास्ता निकल सकता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल में अंतरराष्ट्रीय जगत में भारत के बढ़ते प्रभाव का ही यह  नतीजा है कि यूक्रेन में फंसे बीस हजार से अधिक भारतीय छात्रों कीमत आपरेशन गंगा के तहत सुरक्षित स्वदेश वापसी संभव हो सकी । केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने तो यूक्रेन की सीमा पर स्वदेश लौटने के लिए अधीर भारतीय छात्रों को यह भरोसा दिला दिया था कि वे सभी भारतीय छात्रों को स्वदेश रवाना करने के बाद ही वहां से हटेंगे।  गौरतलब है कि अभी भी अनेक देशों के नागरिक अपने सुरक्षित अपने देश लौटने की उम्मीद लगाए बैठे हैं।