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बिखरी राज्यसभा की ढाल, केजरीवाल बेहाल

सार

आम आदमी पार्टी के सात सांसदों के बीजेपी में विलय को राज्यसभा के चेयरमेन ने मंजूरी दे दी है. इस विलय को विधि सम्मत माना गया है. केजरीवाल इस पर कानूनी लड़ाई की तैयारी कर रहे हैं..!!

janmat

विस्तार

     जिस तेजी के साथ यह पार्टी दिल्ली और पंजाब में सत्ता तक पहुंची थी, उसी तेजी से खुद के लिए ढलान भी तैयार कर लिया है. दिल्ली में पराजित हो चुकी है. अब पंजाब के सातों राज्यसभा सांसद बीजेपी में चले गए हैं. अगले साल वहां चुनाव हैं. इन सांसदों के आने से भाजपा राज्य के चुनाव में कुछ खास हासिल नहीं कर पाएगी, लेकिन राज्यसभा में तो उसकी ताकत बढ़ ही गई है.

    आम आदमी पार्टी के नेताओं द्वारा सांसदों की बगावत पर जो प्रतिक्रिया आई है, उसमें यही कहा गया है, कि इन सांसदों ने पंजाब की जनता का अपमान किया है. राज्यसभा सांसद जनता नहीं चुनती, बल्कि पार्टी और विधायक चुनते हैं. पार्टी मतलब केजरीवाल, जिनको भी राज्यसभा का सदस्य बनाया गया, उनकी काबिलियत से ज्यादा उनसे होने वाली स्वार्थपूर्ति उसका आधार रहा है. 

    राघव चड्ढा और संदीप पाठक जैसे नेता तो पार्टी संगठन में काम कर रहे थे, लेकिन जिन धनपतियों को राज्यसभा बेची गई, वह भी साथ नहीं रहे. वैसे भी जब कोई राज्यसभा की सदस्यता खरीदता है, तो फिर बाद में पार्टी के साथ रहना उसकी नैतिक बाध्यता नहीं रहती.

    केजरीवाल और आम आदमी पार्टी ने राजनीति में ईमानदारी और आंदोलन को अपना एजेंडा बताया. उनकी सरकार में आचरण इसके विपरीत हुआ. दिल्ली में तो केजरीवाल ने नैतिकता के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए. दावा किया गया था, कि गाड़ी बंगला नहीं लेंगे और इसके विपरीत सीएम के लिए शीश महल बनाया गया. करप्शन फ्री गवर्नमेंट का दावा था और केजरीवाल अकेले मुख्यमंत्री थे, जिन्हें शराब घोटाले में करप्शन के आरोप में जेल जाना पड़ा. उन्होंने तो इतनी भी नैतिकता नहीं दिखाई की जेल जाने के बाद कम से कम सीएम पद छोड़ देते.

     केजरीवाल ने तो जेल में रहते हुए दिल्ली सरकार चलाने का ऐसा इतिहास बनाया है, जो भारतीय संविधान पर एक दाग के रूप में हमेशा कायम रहेगा. केजरीवाल के कारण ही केंद्र सरकार को ऐसा कानून बनाने के लिए लोकसभा में बिल पेश करना पड़ा कि कोई भी मंत्री, सीएम, पीएम 30 दिनों तक जेल में रहेगा तो उसकी सदस्यता स्वयं समाप्त हो जाएगी. इस बिल का भी विरोध केजरीवाल सहित विपक्षी दल कर रहे हैं.

    सबसे बड़ा सवाल यह है, कि जो भी सांसद बागी हुए हैं, उनमें से कई तो ऐसे हैं, जो आम आदमी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में शामिल हैं. अगर राघव चड्ढा का योगदान देखा जाए तो उन्हें केजरीवाल का सबसे विश्वसनीय माना जाता था. इतनी युवावस्था में ही उन्हें विधायक बनाया गया. पंजाब में चुनाव की पूरी जिम्मेदारी सौंपी गई. पंजाब में आप की सरकार के गठन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती रही है. पार्टी के साथ टकराव की शुरुआत राघव चड्ढा के साथ हुई. यह संयोग है, कि यह उन्होंने अपने साथ सात पंजाब के राज्यसभा सांसदों को जोड़ लिया. 

    राजनीतिक दल का कोई लीडर तो हो सकता है. लेकिन पॉलीटिकल प्रोसेस डिक्टेटरशिप के साथ कभी नहीं चलता. केजरीवाल के साथ तो ऐसा होता रहा है, उनके अनेक साथी उनको छोड़कर चले जाते हैं. सभी यह कहते हैं कि उनका व्यवहार तानाशाही पूर्ण होता है. ईमानदारी से सरकार चलाने की छवि तो उनकी ध्वस्त हो चुकी है. 

    किसी भी नेता का स्टैंड जब पूरी तरह से राजनीतिक साबित हो जाता है तो उसकी हालत केजरीवाल जैसी ही हो जाती है. ईमानदारी से राजनीति भी उनका पब्लिक स्टैंड था. लेकिन यह गलत साबित हुआ. केजरीवाल से ज्यादा करप्शन के आरोप किसी भी आप नेता पर नहीं लगे. 

    बीजेपी पंजाब में अपना जनाधार बढ़ाना चाहती है. सांसदों की बगावत के बाद अब ऐसी चर्चाएं चल रही है कि शायद पंजाब में विधायकों में भी बगावत हो. राघव चड्ढा ने राज्यसभा के सांसदों को बीजेपी में शामिल करवाकर अपना दमखम साबित कर दिया है. अगर विधायकों के मामले में भी उन्होंने यह साबित कर दिया तो फिर आम आदमी पार्टी को बड़ा झटका लग सकता है. अभी तक तो बीजेपी को राज्यसभा में अपनी संख्या बढ़ाने में ही फायदा हुआ है. पंजाब अकेला राज्य है, जहां बीजेपी शिरोमणि अकाली दल के सहारे अब तक रही है. अब तक उसने अपने बलबूते पर चुनाव नहीं लड़ा है. इस बार वह अकेले चुनाव में जा सकती है. इसमें इन नेताओं का रोल हो सकता है.

    बनावटी और दिखावटी राजनीति का हश्र केजरीवाल और आम आदमी पार्टी जैसा ही होता है. केजरीवाल जब जेल में थे तब उनकी पत्नी पार्टी की कमान संभालते दिखने लगी थीं. यह पार्टी भी पारिवारिक पार्टी जैसा ही व्यवहार करती दिख रही है. इस पार्टी का बहुत लंबा भविष्य दिखाई नहीं पड़ता है. आप का जनाधार वही माना जाता है जो कांग्रेस का रहा है. बीजेपी का समर्थक समूह इससे बिल्कुल अलग है.

    उसी पॉलीटिकल पार्टी में विद्रोह होता है. जहां एकाधिकार की प्रवृत्ति होती है. जहां सत्ता में हिस्सेदारी में संतुलन नहीं रखा जाता है, जहां राजनीतिक लूट होती है, लेकिन बंटवारा नहीं होता. कुछ खास लोगों तक ही सब कुछ सिमटा रहता है. 

     राज्यसभा सांसदों की टूट में ईडी की भी भूमिका देखी जा रही है. जिसमें सांसद बागी हुए हैं, उनमें दो पर ईडी के छापे पड़े थे. दोनों प्रक्रियाओं को जोड़कर देखना राजनीतिक नजरिया है. जिन पर छापे नहीं पड़े. उनकी बगावत का कारण क्या हो सकता है. जो कारण उनका है वही सबका है. 

    केजरीवाल जिन राज्यों में राजनीति कर रहे हैं, वहां उनका मुकाबला कांग्रेस और बीजेपी से है. दोनों से उनके राजनीतिक रिश्ते दुश्मनी जैसे ही लगते हैं. 

    जब उनके दोस्त ही साथ छोड़ रहे हैं, तो फिर माना तो यही जाएगा, जहां लूट हैं, वहां हिस्सेदारी के लिए ही टूट है. उनका भविष्य वैसा ही है जैसा राजनीति में ईमानदारी का है.