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अखाड़े में हाथ आजमाने के पहले ही निकला दम

सार

लोकसभा चुनाव के फर्स्ट फेस की पोलिंग के लिए एक सप्ताह ही बचा है. चुनावी अखाड़े में सभी पहलवान जोर आजमाइश कर रहे हैं. अखाड़े में उतरने के पहले सालों पहलवान को जो तैयारी करनी होती है, उस तैयारी में अगर कमी रह जाए तो फिर हाथ आजमाने के पहले ही अखाड़े में दम निकल जाता है..!!

janmat

विस्तार

चुनावी अखाड़े में जीत के लिए पांच साल मुद्दों की फसल बोनी पड़ती है. सरकार और विकास के वायदे और बातें तो हमेशा चलती रहती हैं, लेकिन कुछ भावनात्मक मुद्दे ऐसे होते हैं, जो जनादेश की दिशा तय करते हैं. पिछले लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस ने, छ: ऐसी महाभूलें की हैं, जो उसे इस चुनाव में हराने के लिए काफी हैं. कांग्रेस ने अपने पतन से भी नहीं सीखा, बल्कि इसके उलट पतन की गहराई में, उतरने को पार्टी तैयार दिख रही है. 

1.राम मंदिर

आस्था के देश भारत में कांग्रेस अनास्था का प्रतीक बन गई है. राम मंदिर पर कांग्रेस का स्टैंड, ताला खुलने से लेकर अब तक, मतिभ्रम का शिकार रहा है. बाबरी मस्जिद पर उठती आवाज़ें और अदालत में राम की आस्था पर सवाल कांग्रेस की महाभूल साबित हो रही है. अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण के बाद यह पहला चुनाव होने जा रहा है. पहले फेस की वोटिंग रामनवमी के दूसरे दिन संपन्न होगी. राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह का कांग्रेस द्वारा बहिष्कार करना चुनाव अभियान में  बड़ा मुद्दा बन गया है. कांग्रेस इसका कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पा रही है.

उत्तर भारत में 2019 में कांग्रेस 195 लोकसभा सीटों में केवल 13 सीटें जीत सकी थी. एक-एक सीट मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में दो सीटें छत्तीसगढ़ में और नौ सीटें पंजाब में जीती थीं. उत्तर भारत के शेष राज्यों में कांग्रेस कोई सीट नहीं जीत सकी थी. बीजेपी इसमें से 175 सीटें जीतने में सफल हुई थी. राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा के बाद हो रहे इस चुनाव में कांग्रेस को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है. इसके विपरीत भाजपा अपनी सीटों की संख्या बढ़ाने में सफल हो सकती है.दक्षिण भारत में भी बीजेपी को चमत्कार की उम्मीद है.

2. राष्ट्रवाद की अनदेखी

लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की भूल जो नुकसान पहुंचा रही है, वह राष्ट्रवाद के प्रति अनदेखी साबित हो रही है. कांग्रेस द्वारा तमिलनाडु का एक द्वीप कच्चातिवु श्रीलंका को देने को पीएम मोदी ने चुनावी मुद्दा बना दिया है. आतंकवाद पर नियंत्रण और विश्व में बज रहा भारत का डंका कांग्रेस की लंका लगाने के लिए पर्याप्त है. जम्मू कश्मीर में धारा 370 हटाना राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में लोकसभा चुनाव में राष्ट्र के साथ कांग्रेस द्वारा की गई अनदेखी स्थापित कर रही है. CAA, NRC,UCC को भी राष्ट्रवाद से जोड़कर देखा जा रहा है. इन मुद्दों पर कांग्रेस का स्टैंड उसकी चुनावी हार का कारण बन रहा है.

3. तुष्टिकरण

अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण कांग्रेस के राजनीतिक पतन का सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है. बहुसंख्यकों का अनादर और अल्पसंख्यकों के वोट बैंक को हथियाने के चक्कर में कांग्रेस अपना आधार ही खोती जा रही है. मुस्लिम पर्सनल लॉ का समर्थन कर कांग्रेस फिर तुष्टिकरण की अपनी गलतियों को ही दोहरा रही है. बीजेपी ने कांग्रेस मेनिफेस्टो को मुस्लिम लीग की छाप बताकर कांग्रेस के तुष्टीकरण की ऐतिहासिक ग़लतियों को फिर से जनमानस में उभार दिया है. 

तीन तलाक जैसे कानून बनाकर मुस्लिम महिलाओं में और मुस्लिम समाज में अमीर और गरीब वर्ग के बीच जातिवाद की खाई बढ़ाकर बीजेपी पसमांदा मुसलमानों के बीच अपनी पकड़ को मजबूत कर रही है. वहीं कांग्रेस तुष्टीकरण के अपने परंपरागत हथियार को गले में बांधकर आत्मघाती छलांग लगा रही है.

4. परिवारवादी भ्रष्टाचारी पार्टियों से गठबंधन

मोदी सरकार से मुकाबले के लिए कांग्रेस द्वारा विपक्षी गठबंधन की जब रणनीति अपनाई गई थी, तब ऐसा माना जा रहा था कि कांग्रेस को यह बड़ा दांव चुनाव में सरकार को गंभीर चुनौती देगा. चुनाव मैदान में तो अब ऐसा लग रहा है, कि गठबंधन की राजनीति कांग्रेस को फ़ायदे से ज्यादा नुकसान पहुंचा रही है. कांग्रेस के गठबंधन में शामिल सभी दलों और नेताओं पर भ्रष्टाचार और परिवारवाद के आरोप हैं. 

कांग्रेस स्वयं परिवारवाद और करप्शन के आरोपों से घिरी हुई है. नए गठबंधन से उसकी छवि सुधरने की बजाय और खराब हो रही है. भ्रष्टाचारियों का समर्थन कांग्रेस की महाभूल साबित होने जा रही है. यह चुनाव जहां देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जांच और कार्रवाई को तेज करने की गारंटी देने का बन गया है. वहीं भ्रष्टाचारियों को बचाने वाले दलों को चुनाव नतीजे नकारने जा रहे हैं.

5. पीएम का चेहरा ना होना

लोकसभा चुनाव में पीएम मोदी का चेहरा ही सबसे बड़ा मुद्दा है. मोदी मैजिक और मोदी लहर के मुकाबले कांग्रेस के पास पीएम का कोई भी चेहरा नहीं है. कांग्रेस के चेहरों पर विश्वास का संकट बना हुआ है. फ्री बी और ऐसे ही लुभावने वायदे भले ही किए जा रहे हों लेकिन वायदों पर विश्वास तब तक नहीं होता, जब तक उन वादों को पूरा करने वाला कोई विश्वसनीय नेता का चेहरा, उपलब्ध न हो. 

कांग्रेस को मोदी के मुकाबले कोई न कोई चेहरा पीएम पद के लिए सामने लाना था. बिना चेहरे के कांग्रेस और उसका गठबंधन बिना सेनापति की बिखरी हुई सेना जैसा चुनाव मैदान के अखाड़े में बिखरी हुई दिखाई पड़ रही है.

6. जातिगत जनगणना

आजादी के 70 साल बाद जब जातियों की सीमाएं टूट रही हैं, तब कांग्रेस जातिवाद को राजनीतिक लाभ के लिए उभारने में लगी है. कांग्रेस के पूर्वज जातिगत जनगणना का विरोध करते थे. राहुल गांधी विधानसभा चुनाव में भी जातिगत जनगणना करने की घोषणा कर चुके थे, लेकिन जनादेश ने उनके वादों को नकार दिया था. लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस की जातिगत जनगणना के चुनावी वायदे का यही हश्र होने जा रहा है. कांग्रेस का यह वादा बड़ी राजनीतिक भूल साबित होगा.ओबीसी राजनीति में आगे बढ़ाने के लिए बातें तो बहुत की जा रही थीं, लेकिन जब प्रत्याशियों की गणना सामने आई तब, कांग्रेस उसमें भी पीछे रह गई.

कांग्रेस द्वारा की गई महाभूलों के कारण ही पार्टी के भीतर विद्रोह की स्थिति निर्मित हुई है. कोई राज्य नहीं बचा है, जहां कांग्रेस में बगावत न हो रही हो. कांग्रेस छोड़ने वाला हर नेता कांग्रेस के भीतर देश की भावनाओं के साथ हो रहे खिलवाड़ को दोषी बता रहा है. यह लोकसभा चुनाव विकास और राष्ट्रवाद के साथ ही भारतीय आस्था और बहुसंख्यकों के सम्मान का चुनाव होने जा रहा है.  चुनाव मैदान में उतरने के पहले ही कांग्रेस की राजनीतिक महाभूलों के कारण उनकी हार सुनिश्चित हो गई लगती है.