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असहमति का सम्मान, लोकतंत्र की जान

सार

‘मदर ऑफ़ डेमोक्रेसी’ भारत में लोकतंत्र की भावना क्या कमजोर हो रही है? यह सवाल इसलिए खड़ा हुआ है कि कांग्रेस के नेतृत्व वाले राजनीतिक गठबंधन ने मीडिया एंकरों के बहिष्कार की घोषणा की है. इसके लिए बाकायदा 14 एंकरों को चुना गया है. यह सभी पत्रकार देश के प्रतिष्ठित प्रमुख न्यूज़ चैनलों से जुड़े हुए हैं..!

janmat

विस्तार

लोकतांत्रिक इतिहास में यह शायद पहली बार हुआ है कि किसी राजनीतिक गठबंधन ने पत्रकारों को चिन्हित कर बहिष्कार की रणनीति अपनाई है. निष्पक्षता हमेशा विवादों में घिरी होती है. मीडिया की निष्पक्षता तो कई बार एक ही समय में दोनों प्रमुख गठबंधन के निशाने पर होती है. राजनीति यदि निष्पक्ष होती तो मीडिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े नहीं होते. पक्षपाती विचार से ही निष्पक्षता पर सवाल पैदा होते हैं. निष्पक्षता पर सवाल दूसरे से सवाल से ज्यादा खुद का हाल बताते हैं आंख में शुद्धता ना हो तो हम जैसा देखना चाहते हैं हमें वैसा ही दिखाई पड़ने लगता है. शायद मीडिया के साथ भी ऐसा ही हो रहा है.

देंखें वीडियो-

https://youtu.be/jlmGWfoYhfM 

जिन चैनलों के मीडिया एंकर पर सवाल उठाए गए हैं वह सभी राष्ट्रीय चैनल हैं. उनका प्रसार क्षेत्र उन राज्यों में भी है जहां इंडी अलायंस की सरकारें सत्ता में हैं. अलायंस की सरकारों द्वारा इन चैनलों को भरपूर विज्ञापन और अन्य सहयोग दिए जाते हैं. इस अलायंस की राज्य सरकारों का इन न्यूज़ चैनलों की निष्पक्षता पर कोई सवाल नहीं है लेकिन दिल्ली में बैठे उनके आकाओं को यही मीडिया पक्षपाती लगता है.

कांग्रेस और उसके गठबंधन द्वारा मीडिया एंकरों की बहिष्कार की घोषणा पर मीडिया भी राजनीतिक दलों की तरह बंटा हुआ है. सोशल मीडिया पर कई पत्रकार टिप्पणियां कर रहे हैं. मीडिया को गोदी मीडिया के रूप में चिन्हित और विभाजित करने का काम राजनीतिज्ञों ने नहीं मीडिया के लोगों ने ही किया है. मीडिया आज गोदी मीडिया, राहु मीडिया, विज्ञापन मीडिया, सोशल मीडिया, कारपोरेट मीडिया, धार्मिक मीडिया और भाषाई मीडिया में  प्रमुख रूप से बंटा हुआ है.

'गोदी मीडिया' शब्द मोदी सरकार के समर्थक पत्रकारों के लिए इस्तेमाल किया जाता है तो 'राहु मीडिया' का उपयोग कांग्रेस और उसके गठबंधन के समर्थक पत्रकारों के लिए होने लगा है. 'राहु मीडिया' ऐसा मीडिया है जिसने कांग्रेस की अतीत की सरकारों में सुविधाओं का अमृतपान किया है. आज उसे ऐसा लगता है कि बीजेपी सरकार में उसकी सुनवाई नहीं हो रही है. ऐसा मीडिया फिर से अतीत की खुशहाली हासिल करने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाए हुए हैं.

मीडिया के खिलाफ राजनीतिक बहिष्कार की स्थितियां निर्मित होने में गलती मीडिया की है या राजनीति की है, इस पर अलग-अलग राय है. मीडिया की भूमिका भी कई बार संदेह में आती है. निष्पक्षता भी धर्मनिरपेक्षता और पंथनिरपेक्षता की तरह अलग-अलग लोगों को अलग-अलग अनुभूति देती है. अपनी भूलों से अनभिज्ञ राजनीति और मीडिया एक दूसरे पर पक्षपाती और झूठ का आरोप लगाते हुए टकरा रहे हैं. दूसरे की भूलें उजागर करना सबकी स्वाभाविक आदत बन गई है तो अपनी भूलों को दूसरों पर थोपना राजनीतिक परंपरा बन गई है.

बहिष्कार से क्या कुछ सुधार हो सकता है? पलायन तो पौरुष नहीं है. अभी जिस मीडिया का बहिष्कार किया गया है वह सभी चैनल के एंकर हैं. इसमें प्रिंट मीडिया को अभी शामिल नहीं किया गया. लगता है कि कांग्रेस और उसके गठबंधन के सहयोगी एंकरों की वाणी और सवालों से आक्रोशित हो गए.

संसद और विधानसभाओं का बहिष्कार मीडिया तक पहुंच गया है. इसे जनता तक पहुंचने से रोकना राजनीतिक दलों का ही दायित्व है. अगर जनता ने बहिष्कार का भाव अंतर्मन में बिठा लिया तो सबसे पहले राजनीति और राजनेताओं का बहिष्कार ही होगा. राजनीति का पूरा इकोसिस्टम काम-क्रोध-मद-लोभ को बढ़ाने में लगा हुआ है. मीडिया तो आईना है. आईने में खुद का ही चेहरा प्रतीत होता है. चेहरे में अगर बुराई है, काम में अगर गड़बड़ी है तो मीडिया में भी वही दिखेगा और यही मीडिया की सबसे बड़ी निष्पक्षता है. इस पर आक्रोश और बहिष्कार की सोच राजनीति का परिष्कार करने के लिए पर्याप्त नहीं होगी.

जिन पत्रकारों को बहिष्कार के लिए चुना गया है उनके पक्ष और विपक्ष में कोई कुछ भी कह सकता है. इतना तो तय है कि उन लोगों की वाणी और सवालों की मारक क्षमता कांग्रेस और उसके गठबंधन के साथियों को इतनी हताहत कर गई कि बहिष्कार पर उतर गए. आलोचना और सवाल मीडिया की सच्चाई और लोकतंत्र के पहरेदार हैं. अगर मीडिया का कोई हिस्सा इसमें कहीं कमजोर भी साबित हो रहा है तो इसके लिए मीडिया जगत को कमजोर करने की किसी भी कोशिश को भारत में कभी भी स्वीकार नहीं किया गया है. इस बार भी ऐसे प्रयास स्वीकार नहीं होंगे.

कांग्रेस और उसके गठबंधन को बहिष्कार की घोषणा वापस लेना ही पड़ेगी. बहिष्कार की शुरुआत कांग्रेस की ओर से की गई है. अगर इसको अपनाकर मीडिया भी दलों और नेताओं की खबरों के बहिष्कार की रणनीति पर आगे बढ़ेगा तो फिर इंडी अलायंस को काफी समस्या पैदा हो सकती है.

मीडिया के सवालों से असहज होकर बहिष्कार का कदम तो ऐसा ही है कि बुराई से समस्या नहीं है समस्या बुराई पकड़ने के माध्यम से है. राजनीतिक दल अपनी गलतियों और भूलों को नहीं देखते हैं. जब भी मीडिया उन अतीत की गलतियों को वर्तमान के संदर्भ में दिखाती है तो राजनीतिक दल आहत हो जाते हैं. 

भारत की सियासत तो सरहद और शहादत पर भी सवाल खड़े करती है. न्यायिक फैसलों पर भी राजनीतिक सुविधा के हिसाब से निष्पक्षता को तोड़ा मरोड़ा जाता है. राजनीतिक दलों और गठबंधन में राजनीति के दांव-पेंच तो जनमानस स्वीकार कर चुका है लेकिन कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडियापालिका को भी राजनीति का शिकार होना पड़ता है. कार्यपालिका के अफसरों को महीन चक्की से पीसने की धमकी भी दी जाती है.

मीडिया और पत्रकारों के अधिकार और स्वतंत्रता पर राजनीति कभी भी फोकस नहीं करती है. बड़े-बड़े मीडिया समूह कारपोरेट घरानों के कब्जे में हैं. इन मीडिया हाउस में फैसले पत्रकारों की मर्जी से नहीं होते हैं. सारे सूत्र कठपुतली जैसे संचालित होते हैं. राजनीतिक दल छोटे मीडिया और भाषायी पत्रकारिता को पर्याप्त महत्व नहीं देते हैं. स्वतंत्र और निष्पक्ष मीडिया का दिल तभी धड़केगा जब उसे इतनी खुराक मिले कि उसकी धमनियों में खून का संचार हो सके. 

मीडिया में किसी भी सुधार के लिए पहल मीडिया की ओर से ही होनी चाहिए लेकिन बहिष्कार की पद्धति लोकतंत्र के तिरस्कार की पृष्ठभूमि तैयार करती है. राजनीति का पूरा इकोसिस्टम डर और लोभ का वातावरण पैदा कर रहा है. यह सब निष्पक्षता के लिए हो रहा है? निष्पक्षता की अपेक्षा केवल मीडिया से ही और खुद के लिए सत्ता की जंग में सब कुछ जायज बनाने की भूल क्या दिखाई नहीं देती?

आपातकाल में मीडिया को नियंत्रित किया गया. डिफेमेशन एक्ट लाकर मीडिया को डराने का असफल प्रयास किया गया. मीडिया पर हमले का डीएनए लोकतंत्र का डीएनए तो नहीं है लेकिन मीडिया पर हमला पहले भी होता रहा है. राजनीति और मीडिया दोनों को सुधार की जरूरत है. अपनी-अपनी भूलों को सुधारकर लोकतंत्र की जान को संभालने की जरूरत है. हलाल चाहे राजनीति हो या मीडिया हो लहूलुहान लोकतंत्र ही होगा.