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ऐसा मुक्का-ऐसा प्रहार, लहूलुहान लोकतंत्र-मर्यादा तार तार

सार

विधायिका में विधायी सदनों के अध्यक्षों की भूमिका निष्पक्ष और मुखिया की मानी जाती है. इस पद की गरिमा और मर्यादा दलीय सीमाओं से ऊपर होती है. संसदीय व्यवस्था का मॉक ड्रिल विद्यार्थियों के लिए जब किया जाता है तब भी नाटकीय सदन का अध्यक्ष सर्वोपरि मानकर ही प्रहसन को संपादित किया जाता है.

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विस्तार

मध्यप्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष के खिलाफ विपक्ष की ओर से अविश्वास प्रस्ताव लाया गया है. विपक्ष का यह आरोप है कि अध्यक्ष महोदय सत्ताधारी दल और सरकार के इशारे पर काम करते हुए विपक्ष की आवाज को दबाते हैं. मध्यप्रदेश विधानसभा में पिछले दो दिनों से चल रहे घटनाक्रम में विपक्ष के नेता, सदन के नेता और अन्य वरिष्ठ नेताओं की भूमिकाओं पर अपने-अपने नजरिए से चर्चा की जा रही है. किसकी भूमिका अच्छी है, किसकी भूमिका खराब है, इस पर राय अलग-अलग हो सकती है लेकिन जिस सदन में इन भूमिकाओं को अंजाम दिया जा रहा है उस सदन की मर्यादा और गरिमा की चिंता कौन कर रहा है? 

कांग्रेस के वरिष्ठ विधायक जीतू पटवारी जो भी सवाल उठा रहे हैं उस पर तथ्यों के साथ जवाब क्या लोकतंत्र के लिए संतोषजनक नहीं हो सकता था? सदन में बहुमत ही निर्णय निर्धारित करता है. सरकार की ओर से जब पटवारी के निलंबन का प्रस्ताव रखा गया तो अध्यक्ष सदन की राय लेकर ही निर्णय कर सकते थे और जब बहुमत निलंबन के पक्ष में है तो फिर अध्यक्ष उस निर्णय के विरुद्ध कैसे जा सकते हैं? पक्ष-विपक्ष में सामंजस्य और समन्वय से प्रकरण का पटाक्षेप किया जा सकता था लेकिन शायद दोनों पक्षों की ओर से चुनाव को दृष्टिगत रखते हुए मुखरता का दिखावा किया जा रहा है.
 
विधायी सदन लोकतंत्र की परम आत्मा है. लोकतंत्र के पुण्य प्रताप से जो आत्माएं इस परम आत्मा तक पहुंचती हैं उन्हें उसकी मर्यादा और गरिमा को बचाए रखने की भूमिका सबसे पहले निभाना चाहिए. आजकल तो ऐसा हो रहा है कि सदन भी ध्यान आकर्षित करने के लिए अनर्गल, अपवित्र और अमर्यादित आचरण का केंद्र बनता जा रहा है.

मध्यप्रदेश की विधानसभा में जब भी सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच में टकराव बढ़ता है तब अध्यक्ष ही निशाने पर आते हैं. अध्यक्ष बहुमत के विरुद्ध कोई निर्णय कर नहीं सकते और विपक्ष ऐसा मानता है कि अध्यक्ष सरकार के पक्ष में काम कर रहे हैं. पहले भी ऐसा कई बार हुआ है. श्रीनिवास तिवारी के विरुद्ध बीजेपी के नेता प्रतिपक्ष और विधायक दल ने पूरी रात सदन के अंदर धरना दिया था. विधानसभा अध्यक्षों से टकराव और उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव के घटनाक्रम पहले भी सामने आते रहे हैं. वैसा ही अब हुआ है जब कांग्रेस ने विधानसभा अध्यक्ष गिरीश गौतम के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव सदन में रखा है.

इस प्रस्ताव पर चर्चा की मांग को लेकर विधानसभा में अवमानना का नया कष्टकारी दृश्य लोकतंत्र प्रेमियों को देखना पड़ा है. विपक्ष के नेता जब विधानसभा अध्यक्ष के अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा की मांग कर रहे थे तब संसदीय कार्यमंत्री नरोत्तम मिश्रा ने नियम प्रक्रिया का हवाला देते हुए अपनी बात रखी. उन्होंने कहा कि नियमों के अनुसार प्रस्ताव प्राप्त होने के 14 दिन बाद इस पर विचार हो सकता है. उत्तेजना के माहौल में संसदीय कार्यमंत्री की ओर से नियम प्रक्रिया की पुस्तक उछाल दी गई, जिस पर विपक्ष के नेता ने अवमानना का नोटिस संसदीय कार्यमंत्री के खिलाफ प्रस्तुत कर दिया. यद्यपि संसदीय कार्यमंत्री ने खेद व्यक्त कर दिया है. नरोत्तम मिश्रा की छवि बहुत सुसंस्कृत और व्यवहार कुशल नेता की है. ऐसा बताया जाता है कि कांग्रेस के पूर्व मंत्री ने नियम प्रक्रिया की  पुस्तक को सदन के अंदर फाड़ने का भी दुष्कृत्य किया.

विधानसभा में एक सदस्य के निलंबन और विशेषाधिकार हनन के जो भी घटनाक्रम सामने आए हैं वह सब वरिष्ठ सदस्यों से जुड़े हुए हैं. इतने वरिष्ठ सदस्यों से इस तरह के व्यवहार की अपेक्षा लोकतंत्र नहीं करता है. संसदीय शासन प्रणाली संवाद और समन्वय से जन कल्याण और सेवा की जीवन पद्धति है. इस प्रणाली में गरिमा और मर्यादा सर्वोपरि होती है. जब भी इसका ह्यस होता है तब लोकतंत्र ठगा हुआ महसूस करता है. अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव आने का मतलब है कि राज्य विधानसभा में लोकतंत्र की सांस अटक गई है. आज लोकतांत्रिक व्यवस्था और मूल्यों में आ रही गिरावट चिंता का विषय बनी हुई है. सत्ता संघर्ष में विपक्ष लोकतंत्र को खतरे में बताते हुए कई बार अलोकतांत्रिक होता हुआ भी देखा जा रहा है.

देश की विपक्षी पार्टी के सबसे बड़े नेता राहुल गांधी ने भी आज भारत के लोकतंत्र को खतरे में बताया है. अंग्रेजों के देश लंदन में कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में संबोधन में वे कह रहे हैं कि भारत में लोकतंत्र खतरे में है. संवैधानिक संस्थाओं पर कब्जा किया जा रहा है. लोकतांत्रिक नेताओं की जासूसी हो रही है. कुछ समय पहले ही अमेरिका के एक उद्योगपति ने भारत के लोकतंत्र को खतरे में बताते हुए लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं की स्थापना के लिए अरबों डॉलर का फंड घोषित किया है. यह चिंता की बात है कि भारत के लोकतंत्र के पहरेदार विदेशों में जाकर विदेशी लोगों सी भाषा भारत के लोकतंत्र के लिए उपयोग करते हैं. लोकतंत्र को देश के अंदर ही पक्ष-विपक्ष और सबको मिलकर मज़बूत करने की जरूरत है.

मध्यप्रदेश में संभवतः यह विधानसभा का आखिरी सत्र है. इसके बाद चुनाव के पहले मानसून सत्र एक-दो दिन का हो सकता है. फिर चुनाव होंगे और नई विधानसभा गठित होगी. विधानसभा के इस सत्र की शुरुआत के पहले सभी सदस्यों ने अपनी स्मृतियां सुरक्षित रखने के लिए छायाचित्र  खिंचाये हैं. यह फोटो हर सदस्य के घर पर उनकी विधानसभा में सदस्यता का तो स्मरण दिलाएगा लेकिन सदन के अंदर जिस तरह के आचरण और व्यवहार किए गए हैं उसकी याद सुखद बनी रहे ऐसा प्रयास भी सभी सदस्यों को करना चाहिए. 

सरकार और सत्ताधारी दल को कांग्रेस विधायक के खिलाफ निलंबन समाप्त करने का प्रस्ताव रखना चाहिए और कांग्रेस को अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव वापस लेना चाहिए. पहले भी विधानसभा में दो सदस्यों राकेश चौधरी और कल्पना परुलेकर को बर्खास्त कर दिया गया था, जिन्हें बाद में सदन द्वारा बहाल कर दिया गया था. लोकतंत्र में कटुता का कोई स्थान नहीं है. हर सदस्य की गरिमा सदन की गरिमा है. इस पर कोई आंच आने देना हर सदस्य का मान प्रभावित करेगा.