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देश प्रथम” का भाव अपरिहार्य है 

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Mon , 14 Apr

सार

संस्कृति को संभालने का दावा करने और जिम्मा लेने वाले संगठन में संघ की गिनती पिछले कई दशकों से होती आ रही है, संघ मानता रहा है कि सबकी राय को जानना चाहिए और लोग भी उसकी राय जानें, भले ही वे इसे स्वीकार करें या न करें..!

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विस्तार

संघ में मंथन चल रहा है | विषय वर्तमान और भविष्य है, यह बात शत प्रतिशत सही है कि वर्तमान के लिए रणनीति बनाते समय या भविष्य के निर्धारण के लिए अतीत को साथ लेकर चलना होता है | जब बात देश की और उसके सामने आती चुनौतियों की हो, तो “देश प्रथम” सोचने वालों को बहुत सोचना होता है | आज समाज का एक बड़ा हिस्सा अपनी संख्या, सामर्थ्य , प्रतिष्ठा  और नेतृत्व पर सोचने को मजबूर हो गया है |उसके इस चिंतन और मंथन में कुछ आंकड़े, वादे और नारे शामिल हैं | आंकड़े वादे और नारे राजनीति के अंग होते हैं और अस्मिता सदैव संस्कृति का हिस्सा | कल भी थी और कल भी रहेगी | संस्कृति को संभालने का दावा करने और जिम्मा लेने वाले संगठन में संघ की गिनती पिछले कई दशकों से होती आ रही है | संघ मानता रहा है कि सबकी राय को जानना चाहिए और लोग भी उसकी राय जानें, भले ही वे इसे स्वीकार करें या न करें।

संघ के अंदरूनी दायरे में एक बात अक्सर कही जाती है कि व्यक्ति से बड़ा संगठन होता है, संगठन से बड़ा समाज होता है और समाज से बड़ा देश होता है। भारत और राष्ट्र को लेकर जो वैदिक और पारंपरिक भारतीय अवधारणा रही है, उस अवधारणा के तहत संघ हिंदुस्तान में पैदा हुए हर व्यक्ति को हिंदू ही मानता है। ऐसी बात विनायक दामोदर सावरकर भी कहते रहे। संघ चूंकि इसी नजरिए से हिंदुस्तान, हिंदू और हिंदुत्व की व्याख्या करता रहा है, इसलिए एक धारणा यह बन गई कि संघ मुसलमानों का विरोधी है। इस अवधारणा को पल्लवित और पोषित करने में वे राजनीतिक ताकतें हमेशा सक्रिय रहीं, जिनकी राजनीति अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के साथ ही अल्पसंख्यकों में भय बनाये रखने की बुनियाद पर टिकीं रही |

देश के विभाजन का  भारतीय इतिहास ऐसा ही एक अध्याय रहा  है| जिसे संघ ही क्यों,राष्ट्रीय विचारधारा आज तक स्वीकार नहीं कर पाई । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्विराष्ट्रवाद का विरोधी रहा है। हाल ही में संघ के सर कार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने राष्ट्र को लेकर जो कहा है, वह संघ की वैचारिकी ही नहीं, राष्ट्र की अवधारणा को समझने का फार्मूला हो सकता  है। उन्होंने कहा है, ''राष्ट्र'' लोक यानी लोग, संस्कृति और मातृभूमि से मिलकर बना है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय इसे ‘चिति’  यानी मानस लोक का विस्तार मानते थे,वैसे यह पंडित दीनदयाल उपाध्याय का भी मौलिक शब्द नहीं है, ये शब्द “दैशिक शास्त्र” में 1921 में पहली बार प्रकाशित हुआ है |पुणे के  नर केशरी प्रकाशन ने इसे छापा था। संघ को अल्पसंख्यक समुदाय के कुछ लोगों की उस वैचारिकी से एतराज रहा है, जिसके लिए राष्ट्र से पहले उनका मजहब रहा है। डॉक्टर अंबेडकर ने भी अल्पसंख्यक समुदाय की इस अवधारणा को लक्षित किया है। एक स्थान पर उन्होंने लिखा है कि उनके मन में एक साथ दो मुल्क होते हैं, पहला है मजहब, देश उसके बाद आता है। शायद यही  वैचारिकी भी संघ को अल्पसंख्यक विरोधी साबित करने का आधार बनती रही है। यही वजह है कि संघ प्रमुख मुस्लिम बौद्धिकों और अल्पसंख्यक समुदाय के प्रमुख लोगों से मिलते हैं तो सवाल उठते हैं और ये सवाल सिर्फ बाहर से ही नहीं उठते, बल्कि कार्यकर्ता समुदाय के बीच से भी खड़े हुए और हो रहे  हैं।

एक अनुमान के मुताबिक, देश की मुस्लिम जनसंख्या करीब 19.2 करोड़ है। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया की कुल मुस्लिम आबादी का 11  प्रतिशत हिस्सा अकेले भारत में ही बसता है। जाहिर है कि जनसंख्या की इतने बड़े हिस्से से संवाद ना रखना किसी भी संगठन की समझदारी नहीं मानी जाएगी।इस बारे में कोई आधार पहले से निर्मित नहीं करना और यकायक संवाद संधान इसे अगले आम चुनाव की तैयारी से जोड़ने लगता है | 2019 में दोबारा सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मशहूर नारे ‘सबका साथ, सबका विकास’ में ‘सबका विश्वास’ भी जोड़ दिया। इसका भी मतलब यह भी है कि सरकार को सबका भरोसा चाहिए। संघ के प्रमुख और पुराने कार्यकर्ता कहते हैं कि संघ प्रमुख उस वैचारिक कुहासे को साफ करने की कोशिश कर रहे हैं, जो माहौल में देश की आजादी के दौर से ही छाए हुए हैं। इसका एक मतलब यह भी निकाला जा रहा है कि हिंदुत्व को संघ भूल गया है। मीडिया में जो छपा उसका आशय कुछ ऐसा ही निकला |