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सांस्कृतिक गौरव का स्वर्णिम काल और राजनीति की कदमताल

सार

किसी भी राष्ट्र का ओज वहां के सांस्कृतिक गौरव में निहित होता है। सांस्कृतिक गौरव के प्रतीकों से ही देश की पहचान होती है। जिस देश के सांस्कृतिक मूल्य सुरक्षित रहते हैं उस देश को मिटाना किसी भी कीमत पर संभव नहीं होता है।

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विस्तार

भारत की मजबूत सांस्कृतिक पहचान को ध्वस्त करने के सदियों के प्रयासों के बावजूद भारतीयता का पूरी ताकत के साथ खड़े रहना यही बताता है कि हमारी सांस्कृतिक जड़ें बहुत गहरी और मजबूत हैं। सांस्कृतिक पुनर्स्थापना और नवजागरण किसी भी राष्ट्र का बुनियादी दायित्व कहा जा सकता है। भारत पर आक्रमण हुए तब आक्रमणकारियों ने भारत की संस्कृति को ही नष्ट करने का प्रयास किया, चाहे भारत के इतिहास को बदला गया हो, चाहे शिक्षा और संस्कृति को मिटाया गया हो या मंदिरों को नष्ट किया गया हो या जीवन मूल्यों को बर्बाद किया गया हो। 

हमारी बहुलता और सांस्कृतिक एकता को नुकसान पहुंचा कर ही भारत को गुलाम बनाया जा सका है। जैसे अस्तित्व नष्ट नहीं हो सकता वैसे संस्कृति भी हमेशा जीवित रहती है। दृष्टि और दृष्टिकोण के कारण प्राथमिकताएं बदल सकते हैं लेकिन मौलिक गुण हमेशा विद्यमान रहते हैं। भारत के सांस्कृतिक गौरव के उत्थान और राजनीतिक कदमताल का आज स्वर्ण काल कहा जा सकता है। 

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने पिछले दिनों गुवाहाटी में अपने वक्तव्य में कहा था कि भारत जोड़ने की असली शुरुआत तो 2014 में शुरू हो चुकी है। राजनीतिक व्यवस्था की विभिन्न दृष्टियों और विचारधाराओं के बीच 2014 में भारत में मोदी दृष्टि का उदय हुआ था। राजनीतिक नजरिए से मोदी काल को किसी भी रूप में परिभाषित किया जा सकता है लेकिन भारत के सांस्कृतिक गौरव की दृष्टि से इसे स्वर्णकाल ही कहा जा सकता है। धनतेरस और दीपावली के महापर्व के पहले प्रधानमंत्री मोदी द्वारा केदारनाथ और बद्री विशाल के पूजन दर्शन की परंपरा से पूरा देश सांस्कृतिक रूप से रिचार्ज हो गया है। 

विरासत पर गर्व के साथ विकास के ऐश्वर्य पर आगे बढ़ते भारत की गति विश्व को हैरत में डाल रही है। सांस्कृतिक गौरव के विस्तार पर राजनीतिक विचारों में मतभेद साफ दिखाई पड़ते हैं। हमारे आस्था केंद्र सिर्फ एक ढांचा नहीं हैं बल्कि हमारे लिए प्राण वायु की तरह काम करते हैं। वह हमारे लिए ऐसे सत्य हैं जो कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी हमें जीवंत बनाए रखते हैं। 

सांस्कृतिक केंद्रों को लेकर विवाद चलते रहे हैं इसका कारण शायद यह रहा है कि इतिहास के लंबे कार्यकाल में भारतीय आस्था केंद्रों को चोट पहुंचाई गई थी। आजाद भारत आस्था के अपने केन्द्रों पर फिर से सक्रिय हुआ है। जन भावनाओं के साथ सरकार की ओर से भी आस्था के विषयों पर ज्यादा फोकस किया गया है।  

नए भारत में सांस्कृतिक उत्थान का जो नया इतिहास लिखा जा रहा है, उसका सबसे बड़ा प्रतीक अयोध्या में राम मंदिर माना जा सकता है। यहाँ भव्य मंदिर का निर्माण हो रहा है। अयोध्या में दीपोत्सव की रामराज्य की परंपरा बड़ी आस्था और भव्यता के साथ शुरू हुई है। यह दीपोत्सव इस वर्ष भी मनाया जाएगा और प्रधानमंत्री भी इस दौरान अयोध्या में रहेंगे। 

भारत के तीर्थ स्थलों, मंदिरों और ज्योतिर्लिंग के विकास की नई शुरुआत हुई है। काशी में नए कॉरिडोर का निर्माण हो चुका है। उज्जैन में महाकालेश्वर मंदिर में महाकाल लोक का भव्य लोकार्पण पिछले दिनों हुआ है। भारत का ऐसा कोई भी प्रमुख तीर्थ नहीं बचा है जहां जीर्णोद्धार, विस्तार और सौन्दर्यीकरण के लिए प्रयास प्रारंभ न हुए हों। केदारनाथ धाम में निर्माण हो रहे हैं। चाहे विंध्याचल हो, मां काली का पावागढ़ में मंदिर हो या कोई दूसरा तीर्थ स्थल। हर जगह निर्माण और विकास की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।  

भारतीय संस्कृति के सभी आयामों के विकास को नया स्वरूप दिया जा रहा है। भारतीय संस्कृति के आयामों भाषा, परंपरागत खेती, संगीत, कला, नृत्य, खेल, प्राचीन ग्रंथ और लोक परंपरागत उत्सवों को पुनर्जीवित करने के प्रयास स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं। सामाजिक एवं राष्ट्रीय महत्व के उत्सव को भारतीय संस्कृति के प्रतीक के रूप में स्थापित करने के प्रयासों से युवाओं में अपनी विरासत और संस्कृति के प्रति नया भाव विकसित हुआ है। भारतीय सांस्कृतिक गौरव के पुनरुत्थान की यह यात्रा भारत को नई ऊंचाइयों पर ले जाने में सफल हो सकती है।