क्या अध्यात्म में महिलायें पुरुषों की बराबरी कर सकती हैं?

अतुल विनोद

भारत में पिछली कुछ सदियों से स्त्रियों को हर मामले में कमतर आंका गया है| आज के दौर में जब महिलाएं हर क्षेत्र में आगे कदम रख रही हैं, सवाल उठता है कि क्या वो  आध्यात्म में भी पुरुषों की बराबरी कर सकती हैं?

प्रकृति ने स्त्री को अपने आप में अनूठा बनाया है| पुरुष को पैदा करने वाली भी वही है इसलिए प्रकृति ने उसे पहले से ही पुरुष से ऊँचा दर्जा दिया है| महिला और पुरुष दोनों ही ईश्वर की विधि और विधान से सृजित, अपने अपने स्तर पर अनूठी और विलक्षण संरचनाएं हैं| दोनों के बीच भौतिक रूप से बड़े स्तर पर अंतर नजर आता है, ऐसे में यह बात उठी स्वभाविक है कि क्या महिलाएं अध्यात्म की राह पर ठीक उसी तरह से आगे बढ़ सकती हैं जैसे कि कोई पुरुष?

भारतीय सनातन संस्कृति महिलाओं और पुरुषों को अपने अपने स्तर पर बराबर का दर्जा देती है हालांकि दोनों की ही भूमिका है अलग-अलग है पुरुष को एक अलग तरह की भूमिका के लिए प्रकृति ने तैयार किया है और महिला को अलग तरह की भूमिका के लिए दोनों का महत्व बराबर है लेकिन भूमिकाएं अलग-अलग है|  हम भले ही आज महिला और पुरुष को हर काम के लिए बराबरी से सक्षम माने लेकिन यह तर्कसंगत नहीं है, दोनों की क्षमताएं अलग हैं| क्या पुरुष महिलाओं की तरह प्राकृतिक रूप से गर्भधारण कर सकता है| प्रकृति ने एक जीवात्मा को 9 महीने तक अपने गर्भ में पालने की समझा सिर्फ और सिर्फ महिलाओं को दी है पुरुषों को नहीं|

ना तो प्रकृति ने स्त्री को तुच्छ बनाया है नहीं पुरुष को दोनों के बीच आत्म तत्व एक समान है लेकिन भूमिका है एक दूसरे के पूरक की है|  दोनों के सहयोग और मिलन से ही सृष्टि आगे बढ़ती है यही इस नियति का विधान है| महिलाओं को कोमल इसलिए बनाया गया है ताकि एक नवजात शिशु अपने आगमन से लेकर बड़े होने तक उसके आंचल की छाया में प्रेम ममता और कोमलता प्राप्त कर सकें यदि स्त्रियां अपने आप को कठोर बनाने लगेंगे अपने शरीर को कृत्रिम साधनों से बदलने लगेंगे तो एक नवजात बच्चा कैसे मां की कोमलता से रूबरू हो सकेगा | 

भारतीय सनातन धर्म में महिलाओं की भूमिका को हर स्तर पर महत्वपूर्ण माना है महिलाओं को शक्ति का रूप दिया गया है अध्यात्म भी मूल रूप से व्यक्ति की आत्मा शक्ति ही है और इस शक्ति को  मेल नहीं फीमेल कहा गया है| भले ही शारीरिक रूप से पुरुष और महिलाएं अलग अलग दिखाई देते हो लेकिन उनके अंदर जो आत्मा है वह आत्मा मेल और फीमेल दोनों ही तत्वों से मिलकर बनी है आत्मा अपने आप में परिपूर्ण है आत्मा नाश्ता स्त्री है ना ही पुरुष इसलिए अध्यात्म पर महिलाओं का उतना ही अधिकार है जितना कि पुरुषों का|

चाहे महिला हो या पुरुष दोनों में ही शक्ति तत्व और शिव तत्व विराजमान है जब आध्यात्मिक शक्ति जागृत होती है उसी शरीर में मौजूद शिव तत्व से मिलने के लिए बेकरार हो जाती है इसी को कुंडलिनी जागरण और सहस्रार में पहुंचकर शिव तत्व से मिलन कहा जाता है आध्यात्मिक रूप से महिला और पुरुष में किसी तरह का कोई भी अंतर नहीं है अंतर सिर्फ भौतिक शरीर में है| आध्यात्मिक तल पर दोनों ही एक स्तर पर हैं|

भारत में देवी की उपासना जाहिर हो जाता है कि महिलाओं को लेकर भारतीय दर्शन आदर श्रद्धा और विश्वास से भरा हुआ है इसलिए यहां पर देवियों की आराधना सदियों से चली आ रही है|

ऊपरी आवरण से यह तय नहीं होता किसी व्यक्ति की आंतरिक क्षमताएं कितनी है और किस हद तक विकसित हो सकती हैं भौतिक संरचना भी आध्यात्मिक ऊंचाई हासिल करने में बाधा नहीं बन सकती यदि रास्ता सही हो|

भारत में  देवियों से लेकर संत और शादियों तक एक उदाहरण है जो यह बताते हैं इस प्रिय आध्यात्मिक क्षेत्र में शिखर तक पहुंच सकती हैं|इनमें से मैत्रेयी भी एक हैं। मैत्रेयी : जिन्होंने याज्ञवल्क्य को हरा दिया

भले ही बीच का दौर ऐसा आया जब पुरुषों ने स्त्रियों की शारीरिक कमजोरी का फायदा उठाकर वैदिक संस्कृति को तार-तार कर दिया और स्त्री को सिर्फ भोग की वस्तु समझा, लेकिन आज फिर से महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनाने में कामयाब हुई हैं  तो आध्यात्म क्यों अछूता रहता, आज आध्यात्मिक आध्यात्मिक साधना में भी महिलाओं ने भी पुरुषों के बराबर मुकाम हासिल किया है| 

आज के दौर में स्त्रियों को पुरुषों को समान बताया जा रहा है लेकिन स्त्री कभी पुरुष के समान नहीं हो सकती| ना ही पुरुष कभी स्त्री के समान हो सकता है| दोनों के अपने-अपने स्तर हैं, दोनों समान नहीं है, दोनों भिन्न हैं, लेकिन इस भिन्नता में भी दोनों की अहमियत समान है|

पुरुषों की बराबरी की अंधी दौड़ के दौर में महिलाओं को अपनी भूमिकाओं को स्पष्टता से समझना पड़ेगा, उसे पुरुष की तरह नहीं बनना बल्कि उसे  एक बेहतर महिला की तरह ही बनना है| उस महिला की तरह जिसने इतिहास में अपनी सशक्त भूमिका से देवी का दर्जा पाया| पुरुषों की बराबरी करने के लिए स्त्रियों को अपने स्त्रीत्व को, अपनी स्त्रैण प्रकृति को खोने की ज़रूरत नहीं है| जो पुरुष आज बीमार सोच से ग्रसित है उसकी तरह बनकर स्त्रियों को क्या हासिल होगा?  यह विचार कि स्त्री पुरुष की तरह बनना चाहती है, अपने आप में बीमार सोच है। वह पुरुष जैसी क्यों बनना चाहती है? क्या वो हीन है ।

ATUL VINOD



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