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लोभ का विस्तार- ओशो

एक बार एक मित्र ने ओशो से पूछा- पाने योग्य चीज को ज्यादा मात्रा में पाने की कोशिश करना भी क्या लोभ है?  अधिक धन प्राप्त करके अधिक दान करने को आप क्या कहेंगे? यह भी एक प्रकार का लोभ ही है। काम, क्रोध और लोभ-इन तीनों शत्रुओं में से लोभ अधिक अनिष्टकारी है। काम, क्रोध या मोह लोभ के मुकाबले कुछ भी नहीं हैं। लोभ बहुत गहरी घटना है। यदि कोई छोटा बच्चा पैदा होता है, तो उसके भीतर काम नहीं होता, पर लोभ होता है। उसमें काम भावना तो बाद में आती है, लेकिन लोभ जन्म के साथ पैदा होता है। क्रोध तो परिस्थितियों के अनुसार उत्पन्न होता है। कभी परिस्थिति प्रतिकूल होती है तब हम क्रोधित हो जाते हैं।

लोभ और क्रोध का संबंध-  क्रोध लोभ के साथ जुड़ा हुआ है। अगर भीतर लोभ न हो, तो क्रोध नहीं होगा। जब आपके लोभ में कोई बाधा डालता है, तो आप क्रोधित हो जाते हैं। जब आपके लोभ की पूर्ति में कोई सहयोग नहीं करता है, तब आप क्रोधित हो जाते हैं। लोभ ही क्रोध के मूल में है। गहरे देखें, तो काम का विस्तार, वासना का विस्तार भी लोभ का ही विस्तार है। जीवशास्त्री कहते हैं कि मनुष्य की मृत्यु निश्चित है, लेकिन व्यक्ति मरना नहीं चाहता है। अमरता भी एक लोभ है। व्यक्ति हमेशा जीवित रहना चाहता है। इस शरीर को हम मिटते हुए देखते हैं। अब तक कोई उपाय नहीं है, जिससे शरीर को बचाया जा सके।

संतान भी है लोभ-  जीवशास्त्री के अनुसार, यही कारण है कि मनुष्य कामवासना को पकड़ता है। मैं नहीं बचूंगा, तो कोई हर्ज नहीं, मेरा अंश तो बचा रहेगा। मेरा यह शरीर नष्ट हो जाएगा, लेकिन मैं किसी और के माध्यम से जीवित तो रह पाऊंगा। संतान की इच्छा अमरता की ही इच्छा है। लोभ अद्भुत है। वह विषय बदल ले सकता है। धन के लिए ही लोभ किया जाए, ऐसा आवश्यक नहीं। लोभ किसी भी चीज के लिए हो सकता है। वासना के अलावा, मोक्ष पाने के लिए भी लोभ हो सकता है। लोभ की गहराई को हमें समझना होगा। लोभ के साथ अन्याय नहीं हुआ है। जिन्होंने भी समझा है लोभ को, उन्होंने उसे मूल में पाया है।

शब्‍दों में नहीं समझ आता लोभ-  लोभ शब्द से हमें उसके बारे में समझ में नहीं आता, क्योंकि सुन-सुनकर हम बहरे हो गए हैं। इस शब्द से हमें उसके बारे में बहुत ज्यादा समझ में नहीं आता है। लोभ का मतलब है कि मैं भीतर से खाली हूं और मुझे अपने को भरना है। यह खालीपन ऐसा है कि भरा नहीं जा सकता है। यह खालीपन हमारा स्वभाव है। खाली होना हमारा स्वभाव है। भरने की वासना लोभ है। हम अपने को भर न पाएंगे। हम धन, पद, यश, ज्ञान, त्याग, व्रत, नियम, साधना आदि से स्वयं को भरते रहें, तो भी अपने को भर न पाएंगे। भीतर विराट शून्य है।

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