धर्मसूत्र 7: जीवन का लक्ष्य:  दिव्य चेतना …शांति, शक्ति और आनंद: अतुल विनोद

भारतीय धर्म-दर्शन में योग का महत्वपूर्ण स्थान है| महर्षि अरविंद ने  इसे बहुत अच्छी तरह से डिफाइन किया है| हमारी पूरी लाइफ ही योग है| इस लाइफ में दिव्य चेतना उपलब्ध हो और उसके जरिए हमें शांति, प्रकाश, प्रेम, शक्ति और आनंद हासिल हो| हम इससे भी ऊपर पहुंचे और अपनी सारी इच्छाओं को छोड़कर ईश्वरीय शक्ति और क्रिया के लिए एक यंत्र में बदल जाएँ| जीवन को समझना यूं तो बहुत कठिन है| सभी धर्म दर्शन में मनुष्य जीवन को एक खास उद्देश्य बताया गया है| परमात्मा ने हम सब को किसी स्पेशल टास्क के लिए भेजा है| यूं तो हम अपने – अपने लक्ष्य को तैयार कर लेते हैं लेकिन धर्म दर्शन कहता है कि अपने जीवन के ऊपर अपने छोटे-छोटे उद्देश्य मत लादिए| खुद को एक ऐसे यंत्र में तब्दील कीजिए जो ईश्वर के उद्देश्य के लिए  मुफीद साबित हो|

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हम खुद को ईश्वर के यंत्र के रूप में कैसे तब्दील कर सकते हैं ?  

ये तय करना सृष्टि का ही काम है कि वह किसे अपने कार्य के लिए बेहतर यंत्र मानती है? लेकिन यदि किसी माध्यम से व्यक्ति को इस तरह का विचार मिल जाए तो ये भी ईश्वर की मर्जी का हिस्सा है| ईश्वर का यंत्र बनने के लिए हमें कुछ करना नहीं है| बस अपने मन को दिव्य चेतना से जोड़े रखना है| लगातार दिव्य चेतना से कांटेक्ट करते रहने से मन के उच्चतर द्वार खुल जाते हैं| आपको अपने अंदर की दिव्य शक्ति से जोड़ने वालि कड़ी किसी मानव में मौजूद गुरु तत्व से भी मिल सकती है| चेतन और अवचेतन से ऊपर की दिव्य सत्ता हमारे जीवन की बागडोर थाम लेती है| तब हमारी बुद्धि का कोई उपयोग नहीं रह जाता| सामान्य रूप से बुद्धि काम करती रहती है, लेकिन दिव्य चेतना समय-समय पर पूरा शासन अपने हाथ में लेकर हमारे जीवन को आगे बढ़ाती है|

योग ध्यान साधना भी उसी दिव्य चेतना के अधीन हो जाता है|  कुंडलिनी रूपी ये दिव्य चेतना जब जागृत होती है तो फिर आपको साधना, आराधना, उपासना की विधियां खोजने की जरूरत नहीं होती|  तब आपको ये भी निर्धारित नहीं करना है कि,आपका धर्म कौन सा है, आपकी साधना पद्धति कौन सी है, तब ये चेतना खुद ही आपके अनुकूल साधन, उपासना, जप – तप आपको रहस्यमय तरीके से प्रदान करती जाती है|

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जब तक हम बुद्धि से मन को चलाने की कोशिश करते हैं, तब तक दिव्य चेतना का साक्षात्कार नहीं होता| ईमानदारी, अहंकार के विसर्जन और पूर्ण समर्पण से ये दिव्य चेतना उदित हो जाती है| इसके जागरण के बाद पूरा जीवन ईश्वर के निर्देशन में चलता है और उसी के द्वारा निर्धारित कार्यों को पूरा करने का यंत्र बन जाता है| भारतीय धर्म दर्शन में लगभग सभी उच्च स्तरीय दिव्य किताबों में इस दिव्य चेतना का किसी न किसी रूप में वर्णन है| योग शास्त्रों में भी परोक्ष रूप से इसी दिव्य चेतना की प्राप्ति से लक्ष्य प्राप्ति के बारे में बताया गया है| दिव्य चेतना के निर्देशन में जैसे-जैसे हमारी साधना आगे बढ़ती है, बौद्धिक मानसिक और प्राणिक,सभी स्तरों पर हमारे प्रारब्ध के जमा हुए तामसिक संस्कार मिटने लगते हैं| यदि साधक निष्ठा और आस्था से लगातार उस दिव्य चेतना से जुड़ा रहे, उसे याद रखे, उसके निर्देशन को सुनते रहे, तो उसके स्थूल, सूक्ष्म शरीर के रिफाइनमेंट (परिष्कार) का काम शुरू हो जाता है| साधक की इंटरनल कैपेसिटी सिस्टम और बनावट के मुताबिक रूपांतरण की प्रक्रिया चलती है| दिव्य कुंडलिनी चेतना यदि स्वतंत्र रूप से कार्य करे तो व्यक्ति चरमोत्कर्ष पर पहुंच जाता है| दिव्य चेतना के जागरण के बाद ही सही योग घटित होता है|

खास बात ये है कि दिव्य चेतना की जागृति के बाद व्यक्ति को ‘अच्छा – बुरा’ ‘शुभ – अशुभ’ कुछ भी सोचने की जरूरत नहीं है, जो शुभ है वह अपने आप आपके पास होगा और जो अशुभ है, बह अपने आप  दूर होता चला जाएगा| इस योग साधन से स्थूल से लेकर सूक्ष्म और कारण स्तर तक सब कुछ परिवर्तित हो जाता है| दिव्य शक्ति रूपांतरण शुरु करते ही सबसे निचले स्तर से ऐसे कार्य भी शुरू कराती है जो सोचने में हल्के और निचले स्तर के लगते हैं लेकिन जब तक हर स्तर पर रूपांतरण नहीं होगा तब तक व्यक्ति ऊंचा नहीं हो सकता| इसलिए उस शक्ति के लिए कुछ भी उपेक्षित नहीं है|

इस योग में आंतरिक रूपांतरण ही नहीं होता, बल्कि जीवन के बाहरी पहलू भी ठीक होते चले जाते हैं| हालांकि इस रूपांतरण की प्रक्रिया में हमारी आदतें, शारीरिक और प्राणिक आकांक्षाएं दिव्य शक्ति का अनुशासन सहज ढंग से नहीं मानती लेकिन  धीरे-धीरे ये सब भी दिव्य शक्ति के प्रभुत्व को स्वीकार कर लेती हैं| बुद्धि, प्राण और शरीर को पूरी तरह से दिव्य शक्ति के अधीन करने के लिए, लगातार चिंतन, मनन, दिव्यता का आवाहन और असफलता के बावजूद प्रयत्न करते रहना है| यहाँ से सवाल उठना सहज है कि क्या दिव्य शक्ति बलपूर्वक ऐसा नहीं कर सकती? क्या दिव्य शक्ति कुछ भी गलत नहीं करती| वो 24 घंटे में तभी आपके ऊपर अधिकार करती है जब आप किसी खाली स्थान पर शांत बैठते हैं, आपका मन चाहे तब दिव्य शक्ति की क्रियाओं को रोक सकता है| 

गीता, उपनिषद, वेद और पुराण में इस दिव्य शक्ति का मर्म छिपा हुआ है, लेकिन इस तरह से उनका अर्थ आम इंसान नहीं समझ सकता| उनके अंदर छिपे हुए योग के इस महत्वपूर्ण रहस्य को समझने के लिए दिव्य शक्ति का जागरण जरूरी है| भारतीय धर्म दर्शन में इस विराट अस्तित्व (कॉस्मिक एक्जिस्टेंस) को सत्य और सनातन माना गया है| हमारा धर्म दर्शन हमेशा से ही सत्य के साक्षात्कार पर जोर देता रहा है| उस सत्य के साक्षात्कार के लिए हमें कुछ खास करने की जरूरत नहीं है, बस जिज्ञासा, श्रद्धा विश्वास और समर्पण ही काफी है, तब मार्गदर्शन मार्गदर्शक और मार्ग अपने आप मिल जाता है| 

ईश्वर को बुद्धि से प्राप्त नहीं किया जा सकता बल्कि बुद्धि तो पैदा होने के बाद विकसित होना शुरू होती है| हम चाहें कि अपनी बुद्धि के घोड़े दौड़ा कर ट्रिक्स और तकनीक के जरिए सत्य हासिल करलें, लेकिन ये तो संभव नहीं है| सत्य रिसर्च का सब्जेक्ट नही है| डीप स्टडी, रिसर्च, इन सब से भी सत्य हासिल किया जा सकता| सत्य को हासिल करने के लिए छोटी सी बुद्धि से कुछ नही मिलेगा| इसके लिए हमारे पूरे जीवन, शरीर, मन और मस्तिष्क के साथ हायर कॉन्शसनेस के प्रति समर्पण होना बेहद ज़रूरी है| हमारा धर्म दर्शन कहता है कि सिर्फ उस हायर कॉन्शसनेस में प्रवेश ना करो बल्कि उसके जरिए अपनी मन बुद्धि प्राण शरीर का परिष्कार करो और उस दिव्य चेतना को धारण करके ईश्वर का इस धरती का सर्वश्रेष्ठ यंत्र बन जाओ| सीधी सी बात है कि उस दिव्यता को इस जगत में प्रतिष्ठित कर दो, आमतौर पर हमारे धर्म दर्शन में कर्म ज्ञान और भक्ति के माध्यम से ईश्वर से जुड़ने की बात कही गई है, लेकिन धर्म के गूढ़ ज्ञान को डीकोड किया जाए तो उसमें साफ तौर पर उस ईश्वरीय दिव्यता के सहारे, मानव जाति, जीव, जंतु और प्रकृति के कल्याण की बात छुपी हुई है|

हमारी लाइफ बहुत छोटी-छोटी बातों में उलझ कर रह जाती है, टारगेट्स, अचीवमेंट, प्रेस्टीज, मटेरियलिस्तिक ज़रूरतों की पूर्ती में ही जीवन निकल जाता है|  हमारा धर्म दर्शन कहता है कि ये सब तो आपका नैसर्गिक जन्मसिद्ध अधिकार है, वो सारी चीजें आपको अपने आप ही मिलेंगी जिनकी आपको जरूरत है, लेकिन ये सारी चीजें बाहरी चेतना से जुड़ी हुई हैं| हम सबको आध्यात्मिक चेतना की स्वतंत्र सत्ता में एंटर करना है| जो जैसा है उसे वैसा ही एक्सेप्ट कर लेने से जीवन और अस्तित्व का परिवर्तन हो जाता है| परिवर्तन तब नहीं होता जब हम अपने आप को इंटेंशनली आर्टिफिशियल ढंग से चेंज करना चाहते हैं| हमारा धर्म दर्शन व्यक्तिगत लाभ की वकालत नहीं करता, सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामया की बात करता है| 

                                  सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामया “सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चित् दुःख भाग भवेत्” 

      ” सब सुखी हों और सब के दुख दूर हों, इस पृथ्वी की चेतना दिव्य चेतना में रूपांतरित हो “

भारतीय धर्म दर्शन किसी भी मत, पंथ, संप्रदाय का विरोधी नहीं है| धर्म कहता है कि आप किसी भी मार्ग से चलें लेकिन आप का अंतिम लक्ष्य ईश्वरीय चेतना के प्रकाश में बदलना होना चाहिए| सत्य एक है अलग-अलग मतों में उसे अलग-अलग रूपों से पुकारा जाता है,  भारतीय धर्म दर्शन कहता है कि, हम मानव मात्र के कल्याण और प्राणियों में सद्भावना के लिए कार्य करें| हमारा देश सिर्फ अपने कल्याण के लिए नहीं है| भारत से निकलने वाली धर्म और अध्यात्म की चिंतन धारा पूरे विश्व को और मानव सभ्यता को आगे ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाये|

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