मध्यप्रदेश के समृद्ध सांस्कृतिक अंचल निमाड़ी, मालवी, बुन्देली, बधेली और ग्वालियरी संस्कृति के विविध रंग

मध्यप्रदेश के समृद्ध सांस्कृतिक अंचल निमाड़ी, मालवी, बुन्देली, बधेली और ग्वालियरी संस्कृति के विविध रंग

मध्यप्रदेश की कोई एक संस्कृति नहीं है यहाँ निमाड़ी, मालवी, बुन्देली, बघेली और ग्वालियरी संस्कृति के विविध रंग हैं। प्रत्येक अंचल का एक अलग जीवंत लोक जीवन, बोली और परिवेश है। लोक जीवन कभी एकांगी नहीं होता है और न एक रेखीय होता है, वह बहु-आयामी होता है। लोक में शताब्दियों से अनेक जातियां और जनजातियां एक सांस्कृतिक समन्वय के साथ रहती आयी हैं। इनमें कई किसान, शिल्पकार, कलाकार और परम्परागत पारंगत दक्ष समुदाय होते हैं, जो मनुष्य सभ्यता के प्रारंभ से कला, साहित्य और संस्कृति के महनीय ताने-बाने को बुनते आये हैं। इसी सामुदायिकता से किसी अंचल की संस्कृति की पहचान और प्रतिष्ठा बनती है। संस्कृति किसी एक अकेले का दाय नहीं होती उसमें पूरे समूह का सक्रिय सामूहिक दायित्व होता है। सांस्कृतिक अंचल की इयत्ता इसी भाव भूमि पर खड़ी होती है। जीवन शैली, कला और वाचिक परम्परा मिलकर किसी अंचल की सांस्कृतिक पहचान बनाती हैं।

संस्कार संस्कृति के अलंकरण हैं और अनुष्ठान आस्था के अनुकरण होते हैं। लोकाचार ललित लालित्य हैं, और परम्परा प्रथाएँ प्रदीप्त प्रकाश उनकी प्रपूर्ति में लोकजन निरन्तर नृत्य, गीत-संगीत और चित्रांकन-पूजन आदि का संयोजन करते आये हैं, जो जीवन के अभिन्न अंग बनकर रस और आनंद की वर्षा करते हैं।

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नृत्य क्या है? शरीर-आत्मा की आनंदित लय-ताल का नाम नृत्य है। गीत, संगीत और देह की गतियों का लयात्मक संयोजन ही नृत्य है। लोक में नृत्य दिखावे की वस्तु नहीं, बल्कि वह परम्परा का अटूट हिस्सा होता है। परम्परा में नृत्यादि सदैव सातत्य और जीवत्व प्राप्त करते हैं। यही कारण है कि नृत्य कभी निरुद्देश्य नहीं होते, वे किसी न किसी परम्परा, रीतिरिवाज, अनुष्ठान, धार्मिक क्रिया, पर्व-त्योहार आदि से जुड़े होते हैं जुड़े होते ही नहीं, बल्कि हमारे पूर्वजों ने उन्हें जान-बूझकर परम्परा अनुष्ठान का अंग बनाया है, ताकि पीढ़ी दर पीढ़ी उसकी निरन्तरता बनी रहे। एक पारम्परिक नृत्य की संरचना में हजारों साल लग सकते हैं। एक नृत्य पीढ़ियों के कला अनुभव के सार से बनता है। कोई नृत्य पारम्परिक विधा के रूप में एक दिन में नहीं बन जाता, उसके पीछे किसी जाति के समय की सामूहिक गहरी चेतना संकल्प और सोच होता है। उसके लोकप्रिय और महनीय स्वरूप बनाने के पीछे लोक मनीषा की श्रेष्ठता

कल्पनाशीलता और रचनात्मकता को देखा जा सकता है। यह प्रयास नृत्यों को प्रदर्शनकारी बनाने के लिये कतई नहीं होता, बल्कि नृत्य की सारी खूबसूरती उसके लोकाचार और अनुष्ठान के निर्वाह में होती है। पर्व-त्योहार, परम्परा और अनुष्ठान आदि से नृत्यों को नहीं जोड़ा जाता तो नृत्य की यह सुन्दर संयोजनाएँ आज तक हमारी पीढ़ी तक नहीं पहुँच पातीं। भविष्य में भी यह परम्परा हमें हजारों साल तक मिलेगी। जब तक अनुष्ठान रहेंगे तब तक नृत्य परम्परा जीवित रहेगी। पर आज के समय में पारम्परिक लोक और आदिवासी नृत्यों को अपनी परम्पराओं से काटकर मंचों के लिये मात्र प्रदर्शनकारी कलारूप बनाये जाने की चेष्टा की जा रही है। जो हमारी पारम्परिक संस्कृति के लिये खतरा भी बनते जा रहे हैं। नृत्य प्रदर्शन के पीछे केवल अर्थोपार्जन का लक्ष्य हो गया है।

कोई भी सांस्कृतिक अंचल नृत्य परम्परा के बिना जीवित और जीवन्त नहीं रह सकता क्योंकि खुशी में नाचना मनुष्य का बुनियादी स्वभाव है। इसलिये नृत्य मनुष्य विकास के प्रारंभिक चरणों के साथ ही चलता आया है प्रागैतिहासिक काल के नृत्य गुहाचित्र इसके सबसे बड़े प्रमाण हैं। कहने का मतलब यह है कि आदिम काल से आज तक मनुष्य जीवन में नृत्य परम्परा की अहमियत रही है। यह परम्परा आदिम मानव से लगाकर लोक समूहों में अजस्र रूप से आज तक आयी है।

मध्यप्रदेश के पाँचों लोकांचलों निमाड़, मालवा, बुन्देलखण्ड, बघेलखण्ड और ग्वालियर क्षेत्र और धार-झाबुआ, मंडला-बालाघाट, छिन्दवाड़ा, होशंगाबाद, खण्डवा – बुरहानपुर, बैतूल, रीवा सीधी, शहडोल आदि जनजातीय क्षेत्रों में निवास करने वाली जातियों और जनजातियों में लोक और आदिम नृत्यों की लम्बी परम्परा है। जातियों और जनजातियों में चाहे कोई भी पर्व-त्योहार हो, धार्मिक अनुष्ठान हो, कोई भी संस्कार हो, नृत्य के बिना कोई कारज पूरा नहीं होता किसी भी अंचल की नृत्य परम्परा को समझने के लिये पहले उस अंचल की सांस्कृतिकी को जानना जरूरी है।

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