EEPISODE 5: जाने उस प्रार्थना का रहस्य जिससे प्रसन्न होते हैं देवों के देव महादेव|Where and How it Originated………Namameesh Meeshan Nirvan Roopam

Episode5: शिव उपासना “रुद्राष्टकम” का पक्षीराज़ गरुड़ और काकभुशुण्डिका से जुड़ा राज़?

इस स्तुति से क्यूँ प्रसन्न होते हैं महादेव? “रुद्राष्टकम” का महाकाल उज्जैन कनेक्शन ?

नमामीशमीशान निर्वाणरूपम्। विभुम् व्यापकम् ब्रह्मवेदस्वरूपम्। निजम् निर्गुणम् निर्विकल्पम् निरीहम्। चिदाकाशमाकाशवासम् भजेऽहम् में छुपे हैं शिव को प्रसन्न करने के कौनसे रहस्य?

जाने उस प्रार्थना का रहस्य जिससे प्रसन्न होते हैं देवों के देव महादेव

कैंसे,कहाँ और किसके मुख से कब प्रस्फुटित हुआ रुद्राष्टक नमामीश मीशान……………………

नमामीश मीशान——-

शिव रूद्राष्टकम :  शम्भू  की आराधना का श्रेष्ठ पाठ…जो भगवान महाकाल की सबसे प्रभावशाली स्तुति है,जिसे सुनकर भक्त का रोम रोम पुलकित हो जाता है| शिव का वो पाठ जो त्वरित फलदायी है|कहते हैं कोई भी साधक ज्यादा कुछ न करके यदि भगवान शिव का ध्यान करते हुए रामचरित मानस से लिए गए इस लयात्मक स्तोत्र का श्रद्धापूर्वक पाठ करें, तो वह शिवजी का कृपापात्र हो जाता है। भारत के घर-घर में बड़ी संख्या में भक्तगण रुद्राष्टक का नित्य पाठ करते हैं. क्या आप जानते हैं की भगवान शिव को प्रसन्न करने वाला रुद्राष्टक कहाँ, क्यों और कैसे प्रकट हुआ? आइये जानते हैं इसका राज़.

उज्जैन के श्रीमहाकालेश्वर मंदिर में यह परम कल्याणकारी स्त्रोत एक अनन्य शिवभक्त के मुख से प्रकट हुआ.श्रीरामचरित मानस में इसकी प्रेरक कथा इस तरह है- भगवान श्रीराम को मेघनाद के नागपाश से मुक्त कराने पर गरुड़ को घमंड हो गया. वह मोहित हो गये कि परम शक्तिशाली भगवान श्रीराम एक राक्षस के बंधन में कैसे आ गये? गरुड़ यह भूल गये कि श्रीराम मनुष्य रूप में लीला कर रहे थे.

काक्भुशुंडी रामचरितमानस का एक बहुत महत्वपूर्ण और प्रेरक पात्र है. कल्पांत में भी उनका अंत नहीं होता. वह ब्रह्मज्ञानी और परम अनुभवी हैं. गरुड़ के मोह के निवारण के लिए भगवान शंकर ने उन्हें काकभूशुंडी से रामकथा सुनकर मोह से छूटने का सुझाव दिया. काक्भुशुंडी से कथा सुनकर गरुड़ का संदेह दूर हुआ. इससे प्रभावित होकर गरुड़ ने काक्भुशुंडी से कौवे का शरीर पाने का रहस्य पूछा. काक्भुशुंडी ने गरुड़ को कौवे का शरीर पाने और उस शरीर से प्रेम का रहस्य बताया.

काक्भुशुंडी ने बताया की मुझे इसी शरीर से श्रीराम की भक्ति प्राप्त हुयी है, काकभूशुंडी ने इस शरीर को पाने के पीछे का रहस्य बताने के लिए अपने पिछले जन्मों की कथा बतायी उन्होंने बताया कि मैंने अनेक जन्मों तक अनेक प्रकार के योग, जप, ताप, यज्ञ और दान जैसे पुण्य कर्म किये. है गरुडजी! ऐसी कौन सी योनि है जिसमें मैंने बार-बार जन्म न लिया हो. मुझे बहुत से जन्मों की याद है, क्योंकि शिवजी की कृपा से मेरी बुद्धि को मोह ने नहीं घेरा.

काक्भुशुंडी ने अपने अनेक जन्मों के बारे की कथा कही. उन्होंने बताया कि एक बार अयोध्या में बहुत वर्षों तक रहा. वहां अकाल पड़ने पर मैं दीनहीन, मलिन और दरिद्र रूप में उज्जैन चला आया. कुछ काल बीतने पर कुछ सम्पति पाकर मैं वहीँ भगवान् शिव की आराधना करने लगा. एक ब्राह्मण वेद विधि से हर समय शिवजी की पूजा करते थे. वह परम साधु और परमार्थ के ज्ञाता थे. मैं उनका शिष्य बन गया. मैं कपटपूर्वक उनकी सेवा करता रहा. वह बड़े ही दयालु और नीतिवान थे. मुझे बाहर से विनम्र देखकर उन्होंने मुझे पुत्र की भांति पढ़ाया. उन्होंने मुझे शिवजी का मन्त्र दिया.

मैं शिवजी के मंदिर में जाकर मंत्र जपता था. मेरे मन में दंभ और अहंकार बढ़ गया. गुरूजी मेरा आचरण देखकर दुखी थे. वे मुझे रोज़ समझाते थे, पर मुझपर इसका उल्टा ही असर होता था.

एक बार मैं भगवान् शिव के मंदिर में शिवनाम जप रहा था. उसी समय गुरूजी वहाँ आये, लेकिन मैंने अभिमानवश उठकर उन्हें प्रणाम नहीं किया. गुरूजी दयालु थे. उन्होंने कुछ नहीं कहा और न उन्हें कोई दुःख हुआ. लेकिन गुरु का अपमान बहुत बड़ा पाप है. भगवान शिव इसे सहन नहीं कर सके. मंदिर में भविष्यवाणी हुई की अरे मूर्ख! यद्यपि तेरे गुरु को क्रोध नहीं है, वे बहुत कृपालु और परम ज्ञानी हैं. लेकिन मैं तुझे शाप दूंगा, क्योंकि नीति का विरोध मुझे अच्छा नहीं लगता. जो मूर्ख गुरु से ईर्ष्या करता है, वह करोड़ों युगों तक रौरव नरक में पड़ा रहता है. फिर पशु-पक्षी आदि योनियों में दस हज़ार जन्मों तक दुःख पाता है. अरे पापी! तू गुरु के सामने अजगर की भांति बैठा रहा. तेरी बुद्धि पाप से ढँक गयी है. जा तू सर्प हो और सर्प योनि में किसी बड़े भारी पेड़ के खोल में जाकर रह.

शिवजी का भयानक शाप सुनकर गुरुजी हाहाकार करने लगे. मुझे काँपता हुआ देख उनके मन में बहुत संताप हुआ. उन्होंने प्रेमसहित दंडवत करके भगवान शिव से मुझे इस शाप से मुक्त कराने की प्रार्थना की. इसके लिए उन्होंने रुद्राष्टक —नमामीशमीशन निर्वाणरूपं गाया. इस स्तोत्र में भगवान् शिव के व्यापक और सर्वव्यापी रूप को दर्शाते हए उनके गुणों का गान किया गया है.

भगवान् शिव प्रसन्न हुए, तो गुरूजी ने उनसे मुझे शाप मुक्त करने की प्रार्थना की. शिवजी ने उनसे कहा कि मेरा शाप कभी व्यर्थ नहीं जाता. लेकिन तुम्हारी साधुता देखकर मैं इस पर विशेष कृपा करूँगा. यह हज़ार जन्म पायेगा, लेकिन जन्म और मृत्यु में होने वाले दुःख इसे नहीं होंगे. इसे बुढापा नहीं आएगा और किसी भी जन्म में इसका ज्ञान नहीं मिटेगा.

कौवे का शरीर पाने की कथा सुनाते हुए काक्भुशुंडीजी ने बताया कि एक जन्म में मैं लोमश ऋषि के पास गया. उन्होंने निर्गुण ब्रह्म का प्रतिपादन किया. यह मत मुझे नहीं भाया. मैंने उनसे वाद-विवाद किया और सगुण मत का महिमामंडन करने लगा. मेरा तर्क करने का तरीका बहुत उद्दंडता भरा था जो उनके अपमान की श्रेणी में आता था. उन्होंने मुझे कहा कि तेरे ह्रदय में अपने पक्ष का बड़ा भारी हठ है. जा कौवा हो जा. इस प्रकार में कौवे का शरीर पा गया. मुझे इसी शरीर में ब्रह्मज्ञान प्राप्त हुआ,इसीलिए मुझे इस शरीर से प्रेम है. अपनी इच्छा से मरने का वरदान प्राप्त है, लेकिन मैं इस शरीर को नहीं छोड़ता.

इस रुद्राष्टक के अंत में कहा गया है की इसे पढने वाले पर भगवान् शम्भु प्रसन्न होंगे. हर एक शिवभक्त को इसे हर दिन पढना चाहिए. इस बात को हमेशा ध्यान में रखा जाना चाहिए कि अपने को कुछ भी सिखाने वाले गुरु का कभी अपमान नहीं करना चाहिए.हालाकि शिष्य कितना भी बड़ा अपराध कर दे, लेकिन गुरु कभी उसका अमंगल नहीं करते. यह प्रसंग आज के विद्यार्थियों के लिए भी प्रेरक है.शास्त्रों में कहा गया है कि शिवे रुष्टे गुरुस्त्राता गुरौ रुष्टे न कश्चन यानी भगवान नाराज हो जाएँ तो गुरु रक्षा कर सकते हैं, लेकिन गुरु रुष्ट हो जाएँ तो हरि भी रक्षा नहीं करते. इस प्रकार, परम कल्याणकारी रुद्राष्टक श्री महाकालेश्वर मंदिर में एक शिव भक्त के मुख से शिष्य की रक्षा के लिए भगवान् शिव से प्रार्थना के रूप में प्रकट हुआ और युगों से भक्तों के कल्याण में सहायक बना हुआ है.

The Origin of the Ode that Propitiates Lord of Lords  Mahadeva

Where and How it Originated………Namameesh Meeshan Nirvan Roopam

Shiva Rudrashtak is the best of hymns to propitiate Lord Shiva.
Recitation of this beautiful hymn fills every pore of the devotee with
transcendental bliss. Anyone who recites this hymn rhythmically with
devotion and sincerity, is graced by Shiva. This ode is recited by
Shiva devotees in most of the households in India with great devotion.
Do you know where, why and how it originated?

This divine hymn streamed out from the mouth of an ardent Shiva
devotee at Shri Mahakaleshwar temple, Ujjain. The Ramcharit Manas
contains a very inspiring story about this.

When Shri Ram allowed Himself to be bound by Meghnada, Garuda cut the
bonds. A mighty bewilderment possessed Garuda as to how the
all-powerful Lord Rama was tied down by a puny demon with coils of
snakes. He forgot that Shri Rama was enacted the sport of a combat and
it was his pastime as a human incarnation.

Kakbhushundi is an important character in the Ramcharit Manas. He is
enlightened and steeped in God Consciousness. He is immortal. Lord
Shiva advised him to go to Kakbhushundi and hear of the many virtues
of Shri Rama to end the distress born of infatuation.

Following Shiva’s advice, Garuda went to Kakbhushundi and after
hearing the Rama’s narrative got rid of his confusion and infatuation.
Impressed by the divine knowledge and wisdom of Kakbhushundi, Garuda
asked him the reason for being in a crow’s body. The latter narrated
him the entire tell and secret of his not leaving this body.
Kakbhushundi told Garuda that he had got the selfless devotion to
Godin this body, so he loves this and not willing to leave it. He told
Garuda that in many previous lifetimes he had practiced various
austerities, Yoga, Jap, Yagya and made charities. Which life form I
had not assumed! I remember my many lifetimes because by Shiva’s grace
my mind has not been infatuated.

Kakbhushundi said to Garuda-Once I lived in Ayodhya for many years and
when a famine occurred there he moved to Ujjain-miserable, downcast,
penniless and afflicted. When some time elapsed, I acquired some
wealth and after that I began worshipping Lord Shiva there. There was
a Brahman who constantly worshipped Lrd Shiva according to the Vedic
rites and had no other occupation. He was an extremely pious soul and
a knower of the highest truth. I served him though with a guileful
heart. The Brahman was very kind-heartd and an abode of piety. Seeing
men outwardly so humble, he taught me as his own son. He imparted to
me a mystic formula sacred to Lord Shiva and gave men every kind of
good advice. One day I was repeating Shiva’s Name in a temple sacred
to Lord Shiva, when my Guru came in. But in my pride I did not rise to
greet him. He was too gracious to say anything; neither did he feel
the least resentment in his heart. But the grievous sin of showing
disrespect to a Guru was more than the great Lord Shiva could
tolerate.”

“ An ethereal voice proceeded from the temple itself-“ You wretched
and conceited fool, even though your preceptor has no anger in him and
he is very tender-hearted and possessed of true and perfect wisdom,
yet, O fool, I must pronounce a curse on you; for any transgression of
propriety is loathsome to me if I do not punish you. O wretch, the
sanctity of my Vedic laws will be violated. The fools who bear malice
against their Guru are cast into the hell named Raurava for a muriad
Yugas. After thyt they take birth in the sub-human species and suffer
torment for ten thousand successive existences. Since you remained
rooted to your seat like a python, O vile wretch, take the form of a
snake. O vilest of the vile, go and take up your abode in the hollow
of some huge tree.”

“The Guru raise a piteous wail as he heard Lord Shiva’s terrible
curse. When he saw men trembling with fear, deep agony possessed his
soul. Reflecting on my awful fate, the Guru prostrated himself before
Lord Shiva and, with his voice choked with emotion, he prayed to him
with the hymn….Namameesh Meeshan Nirvan Roopam…The ode praised the
omnipresent and all-pervading Shiva. Shiva was pleased and said- “Ask
for a boon.” The Guru prayed to him to spare me and do that which my
bring me supreme blessedness”. Shiva said-“Although he has committed a
grievous sin and I in my wrath have pronounced a curse on him, yet,
realizing your goodness, I shall do him a special favour. My curse
shall not go in vain. This fellow shall surely pass through a thousand
incarnations. But the terrible agony involved in each successive birth
and death shall not affect him in the least. In none of his births
shall his awareness leave him.”

Then Kakbhushundi narrated the story of his becoming a crow. He said-
“In a previous lifetime I went  to Sage Lomash. The enlightened sage
gave sermon on Brahma, the unborn, the One without a second and
without attributes. I was not convinced and sought to establish with
great obstinacy the doctrine that God takes and embodied form. I
entered into a hot discussion with him. My obstinacy bordered on
insult and humiliation. At last the sage uttered these angry words- ‘
Fool, you refuse to accept the supreme lesson, I have been inculcating
on you and indulge in endless arguments and couner-arguments. You give
ne credence to my authentic words and like a crow look on everything
with distrust .Fool, you are exceedingly self-opinionated, therefore
you shall at once take the form of a crow. I was immediately
transformed into a crow.”

Kakbhushundi said that he loved this body of a crow because he had
attained the supreme knowledge in it. I have the boon of death at
will, yet I do not leave this body.

At the end of the Rudrashtak there a is hymn that says that Shiva is
pleased with those men who devoutly repeat it.

Every Shiva devotee must recite this hymn daily to please Shiva. It
should be always remembered that we should never insult anyone who
teaches us anything. Although a Guru never causes any harm to his
disciple howsoever grievous offence he may have committed. This
episode from the Ramcharit Manas is very inspiring for all,
particularly students. There is a Shloka- Shive Rushta Gurustrata,
Guro Rushte n Kashchan, meaning- If God is displeased Guru can save
you; but if Guru is displeased, nobody can save you.

Thus the great Rudrashtak spilled out from the mouth of an ardent
Shiva devotee and by reciting it large number of devotees receiving
the grace of Shiva by uttering it with devotion.

EPISODE4 : Scientific analysis of Shiva Lingam,

शिवलिंग के पीछे छुपा है विज्ञान ? शक्‍ति के स्रोत है शिवलिंग और न्यूक्लियर रिएक्टर ? जानकर हैरान रह जायेगे ?

EPISODE3- उज्‍जैन महाकाल मंदिर: क्या है भस्‍म आरती का रहस्‍य? कैसे होती है महाकाल की भस्म आरती? क्यों करते हैं महादेव की भस्म आरती? क्या अब भी चढ़ती है चिता भस्म? अन्य ४ आरतियाँ कैसे और कब होती है उनमें क्या ख़ास है?

EPISODE3 LINK

EPISODE 2- श्री महाकालेश्वर परिसर में बने है अद्भुद मंदिर, देखें श्री महाकाल सभा-मंडप में विराजे देवी देवताओं के अद्भुद स्वरुप और मंदिरों को | घर बैठे इस विडियो से महाकाल तीर्थ दर्शन का लाभ लें |

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EPISODE 1 -क्या उज्जैन का श्रीमहाकालेश्वर मंदिर भगवान श्रीकृष्ण के पूर्वज की तपस्या स्वयं प्रकट हुआ? श्रीकृष्ण के धरती पर अवतार लेने की पहली घोषणा क्या श्रीमहाकालेश्वर मंदिर की स्थापना से जुड़ी हुई है? श्रीकृष्ण के किस पूर्वज की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने स्वयं प्रकट किया था मंदिर? श्रीकृष्ण के जन्म की घोषणा इस मंदिर की स्थापना के साथ किस देवता ने की थी ? जानने के लिए देखें ये वीडियो लिंक

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