जेनरेशन गैप… बुजुर्गों को भी बदलना होगा….

{अक्सर बुजुर्गों की दयनीय स्थिति के लिए नयी पीढ़ी को ही जिम्मेदार ठहराया जाता है,जबकि सभी नवयुवको,नवयुवतियों को उनके उपेक्षित व्यव्हार के लिए जिम्मेदार नहीं माना जा सकता, और सभी युवा, बुजुर्गों के प्रति संवेदनहीन नहीं होते। कहीं न कहीं बुजुर्गों की पुरानी या पारम्परिक सोच भी जिम्मेदार होती है।}

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अक्सर सुनने को मिलता है की नयी पीढ़ी पुरानी पीढ़ी को स्वीकार्य नहीं होती, नयी पीढ़ी पुरानी  पीढ़ी की दृष्टि में उद्दंडी,संस्कारहीन,और बेवफा होती है। नयी पीढ़ी से उनकी असंतुष्टि उनके लिए बहुत सारी परेशानियों का कारण बनती है, और दोनों पीढ़ी के मध्य कडुवाहट और दरार को बढाती है। अनेक बार बुजुर्गो को गिरते स्वास्थ्य एवं असहाय स्थिति में भी एकाकी जीवन जीने को मजबूर होना पड़ता है, और वे अपनी इस दयनीय स्थिति के लिए नयी पीढ़ी को जिम्मेदार ठहराते हैं। नयी पीढ़ी का उपेक्षित व्यव्हार उन्हें अवसादग्रस्त कर देता है, परिणाम स्वरूप उनका अंतिम प्रहर मानसिक द्वंद्व और शारीरिक कष्टों के साथ व्यतीत होता है।

अक्सर बुजुर्गों की दयनीय स्थिति के लिए नयी पीढ़ी को ही जिम्मेदार ठहराया  जाता है,जबकि सभी नवयुवको,नवयुवतियों को उनके उपेक्षित व्यव्हार के लिए जिम्मेदार नहीं माना  जा सकता, और सभी युवा, बुजुर्गों के प्रति संवेदनहीन नहीं होते। कहीं न कहीं बुजुर्गों की पुरानी या पारम्परिक सोच भी जिम्मेदार होती है। इस प्रश्न का उत्तर वे स्वयं दे सकते हैं,यदि वे अपनी दिल पर हाथ रखकर ईमानदारी से सोचें क्या वे अपने बुजुर्गों को संतुष्ट कर पाए थे, निश्चित रूप से उनका उत्तर नकारात्मक ही होगा,और वे अपने इस ज्वलंत प्रश्न का उत्तर ढूंढ सकेंगे की नयी पीढ़ी से उनका सामंजस्य क्यों नहीं बन पा रहा । ऐसी क्या वजह है जिस कारण पुरानी पीढ़ी नयी पीढ़ी से तालमेल नहीं कर पाती। इसका कारण नयी पीढ़ी में दोष ढूँढने से नहीं मिलेगा,क्योंकि यह तो प्रत्येक पीढ़ी अपनी नयी पीढ़ी को कोसती आ रही  है और पीढ़ी के अंतर के रूप में जाना जाता है। जिसका कारण नयी पीढ़ी की बेबफायी नहीं है, बल्कि मानव विकास में तीव्रता से आ रहा परिवर्तन  है।

गत पांच दशक में जितनी  तीव्रता से मानव विकास हुआ है इतनी तीव्र गति से पहले कभी नहीं हुआ,शायद पिछले हजार वर्षों में भी इतना विकास नहीं हो पाया। विकास की यह गति  और भी तीव्र होती जाएगी,और  आने वाले पच्चीस वर्षों में पिछले सौ वर्षों में हुए कुल विकास से भी अधिक विकास हो सकता है। तीव्र विकास में सिर्फ वैज्ञानिक उपलब्धियां ही शामिल नहीं होती, ये वैज्ञानिक उपलब्धियां अपने साथ बहुत सारे सामाजिक परिवर्तन भी साथ लाती हैं,जैसे जीवन शैली,व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता, नयी मान्यताएं, नयी सोच, नयी महत्वाकांक्षाएं एवं प्रतिस्पर्द्धा इत्यादि। अतः नयी पीढ़ी विकास होने के कारण अधिक योग्य, अधिक विचार शील अर्थात उन्नत विचार वाली, और अधिक महत्वाकांक्षी होती जाती है। जो पुरानी  पीढ़ी को उनकी  मान्यताओं,उनके आत्मसम्मान पर कुठाराघात लगता है। एक तरफ नयी पीढ़ी को पुरानी  पीढ़ी कम पढ़ी लिखी,सुस्त,दकियानूस,परम्परावादी,और परिवर्तन विरोधी लगती है,तो दूसरी तरफ पुरानी  पीढ़ी नयी पीढ़ी  को अधिक भौतिक वादी (पैसे की भागदौड में शामिल),अहसान फरामोश, और उग्र स्वभाव रखने वाली,संस्कार हीन मानती है। पुरानी पीढ़ी के लिए भौतिक वादी  मूल्यों से अधिक भावनात्मक मूल्यों का अधिक महत्त्व है,और जीवन शैली में आ रहे तीव्र परिवर्तन स्वीकार्य नहीं है,वे प्रत्येक परिवर्तन को अपनी संस्कृति पर चोट  समझते हैं। अतः वे समय समय पर होने वाले परिवर्तनों का विरोध करते देखे जा सकते हैं,और नयी पीढ़ी को आलोचनात्मक दृष्टि से देखते हैं। पुरानी  पीढ़ी की यह सोच हमेशा  से नयी पीढ़ी से सामंजस्य बनाने में अवरोध उत्पन्न करती है,उनमे दूरियां और कडुवाहट उत्पन्न करती  है,और दोनों वर्गों के लिए पीड़ादायक साबित होता है। अब क्योंकि परिवार में बुजुर्ग व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर होते जाते है, अतः वे ही इस तनाव ग्रस्त स्थिति  से अधिक त्रस्त होते हैं, और युवा पीढ़ी ऊर्जावान और आत्मनिर्भर होने के कारण  कम प्रभावित होती  है।

युवा पीढ़ी गलाकाट प्रतिस्पर्द्धा, भौतिकवाद के कारण आने वाली नयी  नयी चुनौतियों में उलझ कर रह जाती है,वह सभी परिवर्तनों को स्वीकार  करने को तत्पर रहती है,वह शीघ्र से शीघ्र आधुनिकतम सुविधाओं को जुटाने के लिए, व्यस्ततम जीवन और कठोर परिश्रम करने को उद्यत रहती है। बदलती जीवन शैली का आकर्षण उन्हें भावनात्मक रूप से संवेदन हीन बना देता है, यदि बुजुर्गों का व्यव्हार सकारात्मक न होकर आलोचनात्मक होता है तो उसे उनकी उपेक्षा करने की मजबूरी बन जाती है,जिसके कारण पूरा समाज कलुषित होता है,सभ्य मानव समाज का सर शर्म से झुक जाता है,और समाज में बुजुर्ग का अंतिम प्रहर कष्टदायक,उपेक्षित और निःसहाय हो जाता है।

उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट हो जाता है की हमेशा  युवा पीढ़ी बुजुर्गों की उपेक्षा के लिए जिम्मेदार नहीं होती,यदि बुजर्ग बदलते परिवेश को समझते हुए युवा वर्ग की परेशानियों,अपेक्षाओं,महत्वाकांक्षाओं को जाने और समझें,उनके चुनौती भरे जीवन में सहयोगी बनकर, नयी विचार धारा  को अपनाने का प्रयास  करें, तो वे अवश्य ही नयी पीढ़ी से सम्मान,प्यार एवं सहयोग पा सकते हैं। नयी पीढ़ी को भी बुजुर्गो के समय को याद करते हुए उनके विचारों के प्रति सहनशील होना  चाहिए और यथा संभव अधिकतम सहयोग देकर उन्हें संतुष्ट रखने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार  मानव सभ्यता की जीत होगी,और वर्तमान युवा पीढ़ी को भी भविष्य में आने वाला उनका बुढ़ापा सुरक्षित बीतने की सम्भावना बढ़ जाएगी।

 

सत्यशील अग्रवाल….


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