हनुमानजी द्वारा अर्जुन का गर्व हरण -दिनेश मालवीय

हनुमानजी द्वारा अर्जुन का गर्व हरण

-दिनेश मालवीय

महाभारत में सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर को ही सबसे बड़ा हीरो माना जाता है. यह काफी हद तक सही भी है. पांडवों के पास युद्धजिता सकने की सामर्थ्य रखने वाला  सबसे बड़ा योद्धा अर्जुन ही था. यह भी सही है कि उस युग में उससे बड़ा कोई धनुर्धर था भी नहीं. कुछ लोगों का मानना है कि कर्ण उससे श्रेष्ठ था, लेकिन कहने को कोई कुछ भी कह सकता है.अर्जुन निर्विवाद रूप से सर्वश्रेष्ठ था. इस भीषण और विनाशकारी युद्ध में पांडवों की जीत का से हरा अर्जुन के सिर ही बाँधा जाता है. अपने समय के अजेयमाने जाने वाले महारथी योद्धा भीष्म, आचार्य द्रोण, कर्ण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा आदि को युद्ध में उसी ने पराजित किया था.

लेकिन उपलब्धि पर हर किसी को घमंड हो जाता है. अर्जुन भी अपवाद नहीं था. उसेभी अपने सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर होने काबहुत घमंड हो गया.भगवान ने यह बात अनेक बार कही है कि अहंकार ही उनका भोजन है. वह अपने भक्त में अहंकार का बीज पनपते ही उसे नष्ट कर देते हैं. इसके लिए वह अवसर भी निर्मित कर देते हैं.

अर्जुन यह भूल गया कि उसके सारथी बने श्रीकृष्ण स्वयं भगवान थे और भीमसेन को दिए गये वचन के अनुसार उसके रथ की ध्वजा पर महावीर हनुमानजी विराजमान थे. फिर भी वह मान रहा था कि विजय अकेले उसके दमपर मिली है.

युद्ध समाप्त होने पर जैसे ही श्रीकृष्ण और हनुमानजी अर्जुन के रथ से अलग हुए, वैसे ही उसका रथ जलकर भस्म हो गया. अर्जुन सहित सभी पांडव इस दृश्य को अवाक्देखते रहे. युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से जब इसका कारण पूछा तो, उन्होंने बताया कि भयंकर के आघात से यह रथ पहले ही जल चुका था. लेकिन उस पर मैं स्वयं और उसकी ध्वजा पर हनुमानजी विराजमान थे, इसलिए यह अभी तक सुरक्षित रहा. जैसे ही हम दोनों रथ से अलग हुए, रथ जलकर ख़ाक हो गया.

महाभारतयुद्ध के बाद युधिष्ठिर राजा बने. अर्जुन ने एक बार फिर दिग्विजय की. इससे उसका अभिमान और अधिक बढ़ गया. भगवान ने उसके गर्व हरण की योजना रची. एक दिन वह श्रीकृष्ण के साथ रथ में घूमने निकले. वहाँ उन्हें टहलते हुए हनुमानजी मिल गये. हनुमानजी ने श्रीकृष्ण को साष्टांग दंडवत की.अर्जुन तो पहले से ही अपने आपने आपको सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर मानकर गर्व से भरा हुआ था. उसने हनुमान जी से कहा कि आपनेतो त्रेता युग में राम-रावण युद्ध मेंसक्रिय  भाग लिया. महाभारत युद्ध के भी आप गवाह रहे हैं. कृपया यह बताइए कि इन दोनों युद्धों में आपको सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर कौन लगा? हनुमानजी ने कहा कि उन्होंनेरावण के पुत्र मेघनाद से बढ़कर कोई धनुर्धर आज तक नहीं देखा.  अर्जुन नेकहा कि आपने श्रीराम और लक्ष्मण का नाम क्यों नहीं लिया. उनकी तुलना में मेघनाद को श्रेष्ठ बतलाया.

हनुमानजी ने कहा कि श्रीराम तो जगत के ईश्वर हैं और लक्ष्मणजी शेषावतार हैं. इसलिए, सांसारिक लोगों में मेघना दही सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर था. उससे बड़ा धनुर्धर धरती पर न कभीहुआ न होगा.

अर्जुन ने पूछा कि मेघनाद में ऐसी क्या विशेषता थी ? हनुमान जी ने कहा की एक योजन दूरी से हांक देकर जब मैं उस पर आक्रमण करता था, तो इस बीच वह हमारे ऊपर सौ वाण चला देता था.

हनुमानजी की बात सुनकर अर्जुन बहुत जोर से हँसा. वह बोला कि बस उसमें इतनी-सी विशेषता थी? मैं तो एक योजन की दूरी से शत्रु को आने से पहले लाखों वाणों से छलनीकर सकता हूँ.  मैं पवनदेव की गति को भी रोक या बदल सकता हूँ.

हनुमानजी ने कहा की भगवान श्रीकृष्ण की गवाही में तुम्हारे इस दावे का परीक्षण हो जाए. अर्जुन तुरंत गांडीव उठाकर खड़ा हो गया. हनुमानजी उससे एक योजनदूर जाकर खड़े हो गये. हनुमानजी ने वहाँ सेघोर सिंहनाद किया और बहुत फुर्ती से आकर अर्जुन के पास आकर उसका धनुष पकड़ लिया. अर्जुन तब तक तरकश से वाण भी नहीं निकाल पाया. हनुमानजी ने कहा कि अर्जुन तुम तो इतनी देर में तरकश से वाण तक निकाल पाए, लेकिन मेघनाद इतनी देर में सौ वाण चला देता था. अब तुम खुद समझ लो कि मैंने उसकी प्रशंसा क्यों की थी.

अर्जुन का सिर शर्म से झुक गया और वहकातर होकर श्रीकृष्ण की ओर देखने लगा. श्रीकृष्ण ने भी हनुमान जी के कथन का समर्थन किया. अर्जुन का गर्व चूर-चूर हो गया और उसने अपनी पराजय स्वीकार कर ली.

इसलिए किसी भी व्यक्ति को कभी यह नहीं समझना चाहिए कि दुनिया में उससे बढ़कर कोई नहीं है.

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