कितना पुराना है सनातन धर्म?

…..अतुल विनोद

सनातन का मतलब है उसका उदय का कोई काल नहीं हो सकता| 'सनातन' का अर्थ है - शाश्वत या 'हमेशा बना रहने वाला', अर्थात् जिसका न आदि है न अन्त|अदि ईश्वर हिरण्यगर्भ की चेतना का स्वधर्म ही इस विश्व का धर्म है| वही सनातन है, इस धर्म से सबसे पहले पुरुष और प्रकृति यानि परशिव(ब्रम्हा विष्णु महेश की इच्छा क्रिया व् ज्ञान का मेल ) और शक्ति(प्रकृति) प्रेरित हुए| इसीलिए उन्होंने इस संसार का सृजन शुरू किया, परमात्मा स्वयम इस सृजन की प्रक्रिया का हिस्सा है| जिसकी स्फुरणा, स्पन्दन या चेतना से ये जगत विस्तारित है|
ईश्वर के धर्म से स्प्रफुरित पृकृति स्व-लाभ भूलकर जगत के कल्याण में भागीदारी कर रही है| धरती, आकाश, सौर मंडल गेलेक्सी, यूनिवर्स, मल्टीवर्स का प्रत्येक हिस्सा ईश्वरीय धर्म का पालन करते हुए अनादीकाल से अपना अपना धर्म निभा रहे हैं|
सूरज प्रकाश फैला रहा है तो धरती धारण किये हुए है| एक का धर्म प्रकाशित होना है तो दुसरे का धारण करना, धैर्य पूर्वक| मनुष्य के अत्याचार के बाद भी प्रकृति और धरती आपना अपना धर्म नहीं छोड़ रहे | यही सनातन धर्म है जिसका न कोई आदि है न अंत है| जो निरंतर है, जो समय ही है, सनातन सिर्फ समय है, समय ही ईश्वर है वही धर्म है|
मानव निर्मित धर्म समय के अंदर हैं यानि ये समय के एक खंड में उपजेंगे और फिर ख़त्म हो जायेंगे| लेकिन जो समय के साथ चलेगा वही सनातन धर्म होगा | जैसे धरती, आकाश, तारे सनातन धर्म को स्वतः ही समझने लगे| उसी तरह मानव की चेतना ने भी इस धर्म को स्वतः ही आत्मसात किया| लेकिन मानव उस वक्त इतना विकसित नहीं था कि वह उसे लिपिबद्ध करता धीरे धीरे मानव चेतना ने विकास किया और हजारों साल तक उसने एक दूसरे तक इसे श्रुति और स्मृति के माध्यम से हस्तांतरित किया| कालान्तर में मनुष्य ने भाषा के अविष्कार के साथ ही इसे लिपिबद्ध किया जो वेद कहलाये| ईश्वरीय सनातन धर्म को समझाने के लिए वेदों में तात्कालिक सहज भाषा व उदाहरण के साथ सनातन ईश्वरीय रीति निति सिद्धांत बताये गए| निश्चित ही उन्हें लिखने वालों ने मानव के अपरिपक्व मन को समझाने के लिए अपने विवेक बुद्धि व उस वक्त के व्यवहारिक उदाहरणों का सहारा लिया|


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