भक्ति, ऊर्जा और आत्मजागरण का महापर्व…महाशिवरात्रि


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स्टोरी हाइलाइट्स

सनातन धर्मियों के लिए यह पावन रात्रि न केवल एक धार्मिक उत्सव है , बल्कि आध्यात्मिक उन्नति, ऊर्जा संतुलन और आंतरिक परिवर्तन का अनूठा अवसर है..!!

सनातन परंपरा में महाशिवरात्रि का पर्व शिवभक्तों के लिए अत्यंत विशेष और पावन अवसर होता है। फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की दिव्य रात्रि को,..... साधना की, आत्मजागरण की, और शिवत्व से जुड़ने की रात्रि कहा जाता है, जिसे हम महाशिवरात्रि पर्व के रूप में मनाते हैं।

सनातन धर्मियों के लिए यह पावन रात्रि न केवल एक धार्मिक उत्सव है , बल्कि आध्यात्मिक उन्नति, ऊर्जा संतुलन और आंतरिक परिवर्तन का अनूठा अवसर है।

महाशिवरात्रि का वास्तविक अर्थ केवल व्रत रखना या पूजा करना नहीं है, बल्कि स्वयं के भीतर स्थित चेतना, शांति और संतुलन को अनुभव करना है। वेद, पुराण और शास्त्रों में भगवान शिव को केवल एक देवता के रूप में नहीं बल्कि ब्रह्मांडीय चेतना के प्रतीक के रूप में वर्णित किया गया है।

शिव पुराण में वर्णित है: - 

“शिवरात्रिः परा रात्रिः सर्वपापप्रणाशिनी।”

अर्थात-  शिवरात्रि वह श्रेष्ठ रात्रि है जो सभी पापों का नाश करने वाली है। यहाँ “पाप” का अर्थ केवल धार्मिक दोष नहीं बल्कि मानसिक अशांति, नकारात्मक विचार, भय और असंतुलन भी है। इसलिए इस पर्व को मानसिक शुद्धि का पर्व भी कहा जाता है
महाशिवरात्रि की रात उपवास, रात्रि जागरण और शिवलिंग का अभिषेक करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। श्रद्धा से किया गया ‘ओम नमः शिवायः’ मंत्रजाप जीवन के कष्टों को दूर कर शांति और संतुलन प्रदान करता है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार देखें........ तो इसी दिव्य रात्रि में भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था। अतः यह दिन केवल एक पर्व नहीं, बल्कि शिव–शक्ति के दिव्य मिलन का प्रतीक है। अर्थात चेतना और ऊर्जा के संगम का दिन ।

दूसरी महत्वपूर्ण कथा समुद्र मंथन से जुड़ी है....... मान्यता के अनुसार, इस रात्रि भगवान शिव ने तांडव किया था जब देवताओं और असुरों ने अमृत पाने के लिए समुद्र मंथन किया, तो पहले घातक विष “हलाहल” निकला। तब भगवान शिव ने सृष्टि की रक्षा के लिए वह विष स्वयं पी लिया। और उसे अपने कंठ में रोक लिया, जिससे उनका कंठ नीला हो गया और वे “नीलकंठ” कहलाए। तब देवताओं ने पूरी रात जागकर शिव की स्तुति की।  

ग्रंथों में शिवरात्रि की एक ओर और प्राचीन कथा का वर्णन मिलता है ....... एक बार ब्रह्मा जी और विष्णु जी के बीच यह विवाद उत्पन्न हुआ कि सृष्टि में कौन श्रेष्ठ है। तभी आकाश से एक अनंत अग्नि स्तंभ प्रकट हुआ। उसका न आदि दिखाई देता था, न अंत।

ब्रह्मा ऊपर की ओर और विष्णु नीचे की ओर उस स्तंभ का अंत खोजने निकले, परंतु दोनों असफल रहे। तब उस अग्नि स्तंभ से भगवान शिव प्रकट हुए और उन्होंने बताया कि वही अनादि-अनंत परम तत्व हैं।......यह अग्नि स्तंभ ही “ज्योतिर्लिंग” कहलाया।

इसी तरह  शिवपुराण में वर्णित एक कथा के अनुसार,...... एक शिकारी जंगल में शिकार की प्रतीक्षा में एक बेल के पेड़ पर बैठा था। उसे ज्ञात नहीं था कि नीचे शिवलिंग स्थापित है।

रात भर वह जागता रहा और समय बिताने के लिए बेलपत्र तोड़कर नीचे गिराता रहा। संयोग से वह शिवरात्रि की रात थी। इस प्रकार अनजाने में उसने उपवास, जागरण और बेलपत्र अर्पण — तीनों शिव पूजा के अंग पूर्ण कर दिए।

अगले जन्म में वह चित्रभानु नामक राजा बना और अंततः उसे मोक्ष प्राप्त हुआ।

महाशिवरात्रि के आध्यात्मिक महत्व की बात करें...... तो ‘शिव’ का अर्थ है — कल्याण, शांति और परम चेतना। महाशिवरात्रि हमें अपने भीतर के अंधकार, नकारात्मकता और अहंकार के विसर्जन की प्रेरणा देती है। यह रात्रि जप,तप, साधना की है और जागरण केवल जागते रहने का नाम नहीं, बल्कि अंतर्मन को जगाने का संदेश है।   ध्यान, तप, जप और मौन — ये साधन हमें बाहरी दुनिया से हटाकर भीतर की यात्रा पर ले जाते हैं।

शिव का स्वरूप विरक्ति, संतुलन और करुणा का प्रतीक है। जटाओं में गंगा, मस्तक पर चंद्रमा, कंठ में विष — यह संदेश देता है कि जीवन में विषमताएँ आएँगी, पर संतुलन बनाए रखना ही शिवत्व है।

धार्मिक और आध्यात्मिक रूप से महाशिवरात्रि प्राणी जगत के लिए जितनी महत्वपूर्ण है उतनी ही  वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी विशेष है।...........महाशिवरात्रि का महत्व केवल श्रद्धा, भक्ति  और आस्था तक सीमित नहीं है। योग परंपरा के अनुसार, इस रात्रि पृथ्वी की स्थिति ऐसी होती है कि मानव शरीर की ऊर्जा स्वाभाविक रूप से ऊपर की ओर प्रवाहित होती है। इसी कारण इस रात जागकर ध्यान करने की परंपरा है — ताकि ऊर्जा का यह प्रवाह जागरूकता में परिवर्तित हो सके।

भगवान शिव को ‘आदियोगी’ भी कहा जाता है अर्थात योग के प्रथम गुरु। योग विज्ञान बताता है कि रीढ़ सीधी रखकर बैठने से ऊर्जा केंद्र सक्रिय होते हैं। शिवरात्रि की रात सामूहिक ध्यान, मंत्रोच्चार और भजन इसी ऊर्जा को संतुलित करने का माध्यम हैं।

शिवलिंग का आकार भी वैज्ञानिक दृष्टि से ऊर्जा संरचना का प्रतीक माना जाता है — अंडाकार रूप सृष्टि की अनंतता का संकेत देता है। जल से अभिषेक का भाव शीतलता, संतुलन और शुद्धि का प्रतीक है।

महाशिवरात्रि पर्व हमें स्मरण कराता है कि जहाँ शिव हैं, वहाँ शक्ति है,......यह हमें सिखाती है कि मौन में शक्ति.... ध्यान में समाधान.... और समर्पण में मुक्ति है।
तो आइए, इस पावन रात्रि हम अपने भीतर के शिव को जागृत करें।

आप सभी को महाशिवरात्रि के पावन पर्व की मंगलकामनाएँ।
हर-हर महादेव