मध्यप्रदेश के झाबुआ आदिवासी गुडिया को मिलेगा जी आई टैग ” जो आदिवासियों की है विरासत “…

मध्यप्रदेश के झाबुआ आदिवासी गुडिया को मिलेगा जी आई टैग.. जानिए मध्य प्रदेश की इस अनूठी गुड़िया की कला के बारे में जो भील और भिलाला आदिवासियों की विरासत है | अतुल पाठक 

भारतीय हस्तशिल्प में एक ऐसा मैजिक है, जिसे देखकर आप इसकी और बस खिंचे ही चले जाते हैं। इसके पीछे बस इसकी अट्रैक्टिव और यूनिक आर्ट है। ऐसा हो ही नहीं सकता कि आप  हैंडीक्राफ्ट के किसी मार्केट में जाएं और वहां से कोई हाथ का बना सामान न लाएं ठीक ऐसी ही एक  कला है झाबुआ के आदिवासी गुड़िया में जो जल्द ही फेमस दार्जिलिंग की चाय व गोवा की फेनी और महाराष्ट्र की अल्फांसो आम जैसे जीआई टैग वाले उत्पादों में सम्मानित सूची में जगह मिल गई। 

मध्य प्रदेश की ये अनूठी गुड़िया कला भील और भिलाला आदिवासियों की विरासत है, ये गुडिया आदिवासी मूल के 53 अन्य “संभावित” उत्पादों के साथ लिस्ट में है, जिन्हें केंद्र सरकार ज्योग्राफिकल इंडिकेशन टैग के रूप में दर्जा करेगी। मध्यप्रदेश की गुड़िया यानी आदिवासीयों की खूबसूरत जोड़ी पर्यटकों को लुभाने के लिए 2017 ट्विटर पर भी पहुंची थी |

प्रचार-प्रसार के अभाव में रोजगार न मिलने से गुड़िया गढ़ने वालों की संख्या घटकर आधी रह गई। हुनरमंद हाथ गुजरात में दूसरा काम करने लगे लेकिन जीआई टैग मिलने से इसके निर्माण को फिर से प्रोत्साहन मिलेगा और झाबुआ , आलीराजपुर में मुख्य रूप से सात  हैंडीक्राफ्ट (हस्तशिल्प) कलाकृतियों को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मान्यता है।

इनमें झाबुआ की आदिवासी गुड़िया( ट्राईबल डॉल) , गलसन हार, पिथोरा आलीराजपुर की बैलगाड़ी (लकड़ी), पंजा दरी, भावरा का पिथोरा आर्ट (पेंटिंग), जोबट का ब्लॉक प्रिंट और कट्ठीवाड़ा का बांस आर्ट  खास तौर पर हैं।  झाबुआ में  70 के दशक में इन शिल्पों (आर्ट्स) को पहचान दिलाने के लिए सरकार ने काम शुरू किया। हालांकि मार्केटिंग न होने से रोजगार की संभावनाएं कम होती गई । 

भारतीय हस्तशिल्प बाजार (एक्सपोर्ट प्रमोशनल काउंसिल के मुताबिक)

4,67,000 एक्सपोटर्स 41 विश्व बाजार में भारतीय हस्तशिल्प के ही फीसद हिस्सा यूएस, यूके, जर्मनी, इटली, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया में भारतीय शिल्प के लिए बड़ा बाजार उपलब्ध है | अब सरकार की कोशिश है कि झाबुआ की संस्कृति देखने के लिए लोग झाबुआ आएं और यहाँ पर  पर्यटन बढ़ेगा तभी हस्तशिल्प को भी बड़ा मार्केट मिलेगा। 

आदिवासी गुड़िया सौ या सवा सौ रुपए में ही बन जाती है। जब ये झाबुआ में सेल होती है तो  200 रुपए व भोपाल जैसे बड़े स्थानों पर ढाई सौ या उससे अधिक रेट में बिकती है। देश और विदेशों में यहां की संस्कृति की प्रतीक आदिवासी गुड़िया की काफी मांग है। कई हस्तशिल्प प्रेमी इसे अपने घर में सजाना चाहते हैं। 

आदिवासी गुड़िया के अलावा यहां बनने वाली कई शिल्पकृतियों (हैंडीक्राफ्टस) की दूर-दूर तक डिमांड बनी रहती है। जिसमे राधा-कृष्ण, बैलगाड़ी, गलसन माला, तीर-कमान, घर सजाने की चीजें, बैग, पर्स, गोफन सहित कई संस्कृति  सिंबॉलिक क्राफ्ट की मांग देश में ही नहीं बल्कि विदेशों के भी बाजार में बनी रहती है। 

गुड़िया को ज्योग्राफिकल इंडिकेशन मिलने से इसका मार्केट तेजी से बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है | जीआई- (जियोग्राफिकल इंडिकेशन) टैग एक  साइन है जिसका उपयोग किसी उत्पाद की उत्पत्ति या निर्माण के लिए ज्योग्राफिकल टेरिटरी को शो करने लिए किया जाता है | इसके मिलने से उस प्रोडक्ट की क्वालिटी का इंश्योरेंस भी मिलता है| ट्राईफेड के अनुसार यह प्रैक्टिस देश भर से जीआई-टैग वाले उत्पादों के लिए बाजार के निर्माण की केंद्र सरकार की बड़ी योजना का हिस्सा है।

 


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