केतु की विशेषताएँ, केतु के ऋण, इस तरह देता है शुभ फल.. 

केतु की विशेषताएँ, केतु के ऋण, इस तरह देता है शुभ फल… 
केतु की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पक्षपात नहीं करता। केतु की शुभता के कारण ही व्यक्ति न्यायाधीश का पद पा जाता है अथवा न्याय करने वाला सन्त, महात्मा राजा मंत्री होता है। क्योंकि केतु का प्रभाव परमार्थी बनाता है। तंत्र-मंत्र व आध्यात्म पर केतु का विशेष अधिकार है। प्रथम पूज्य भगवान् श्री गणेश जी को केतु का अधिपति माना जाता है।

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केतु का प्रभाव लग्न लग्नेश या चंदमा पर होने से जातक क्षणिक चिड़चिड़ा और मूडी होता है। अक्सर कोई भी निर्णय अपने मन के अनुसार करता रहता है। न्याय करने की प्रबल भावना होने के कारण स्वयं के दोष को भी क्षमा नहीं करता।

मंगल प्रधान वृश्चिक राशि केतु की उच्च राशि है। इस राशि में स्थित केतु सर्वनाश कर देता है: क्योंकि केतु-राहु हमेशा वक्री गति से चलते हैं। वृश्चिक राशि में उच्च केतु वक्री गति के कारण नीच फल देते हैं। यदि वृश्चिक राशि किसी महिला की हो और केतु अनियंत्रित हो तो ऐसी महिलायें अपने विचित्र स्वभाव के कारण सबको दुःखी कर देती है। 

यदि ऐसी महिलायें बिना किसी बुराई-भलाई के केवल शिव भक्ति में लीन हो जायें और सन्तों की तरह सबका निस्वार्थ भाव से भला करें तो अध्यात्म, तंत्र-मंत्र एवं लेखन कार्य में विशेष ख्याति पाती है। अन्यथा ऐसी महिलाओं और केतु प्रधान जातक के साथ जीवन निभाना बहुत कठिन कार्य है वृश्चिक (बिच्छू) राशि होने के कारण ये सदैव जहर उगलते या डंक मार-मारकर दर्द देता रहता है।

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केतु प्रधान जातक व्यक्ति के विचारों में खलबली बनी रहती है। इनके अन्दर के भाव को समझने वाला इनके स्वभाव से तालमेल बैठाने वाला कोई मिलता नहीं है। असल में ये लोग वकील की तरह होते हैं कि "चित्त भी मेरी पट भी मेरी और अन्टा मेरे बाप का।" अगर इन लोगों से कोई बहस करना चाहे तो कोई जीत नहीं सकता। बात न मानने या नहीं बनने पर ये लोग आत्मघाती निर्णय लेने में जरा भी नहीं चूकते।


केतु प्रधान जातक यदि चाहें तो अपने विचारों, कल्पनाओं को लेखन का रूप देकर बहुत अच्छे लेखक बन सकते हैं। ये लोग रहस्यमयी, तिलस्मी जासूसी, तंत्र-मंत्र एवं ऐसे अद्भुत विषयों के बारे में लेखन कार्य करके सभी को विस्मृित कर सकते हैं। एक अध्ययन के अनुसार आज तक उच्च स्तर और गूढ़ रहस्यों के विषयों को लिखने वाला लेखक वृश्चिक राशि की महिलाएँ एवं केतु से प्रभावित जातक ही हुए हैं।

केतु एक कठोर न्यायप्रिय ग्रह होने के कारण स्व मूल्यांकन का विशेष गुण जातक को प्रदान करता हैं। इसी कारण फौज व न्यायालय सम्बन्धी क्षेत्रों में विशेष सफलता मिलती है। लेकिन कभी-कभी अधिक ईमानदारी के कारण असफल भी हो जाते हैं। किसी के प्रति सच्चा त्याग, ईमानदारी और अनावश्यक कल्याण के फलस्वरूप इन्हें आलोचना सहनी पड़ती है, इसी कारण ये लोग चिडचिड़े और क्रोधी हो जाते हैं।

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यदि निष्कर्ष निकालें तो ज्ञात होता है कि इन न्याय करने वालों के ऊपर घर-परिवार एवं अन्य लोग अन्याय ही करते हैं। इसलिए इनकी आत्मा पीड़ित रहती है। ईश्वर भी इनकी प्रार्थना जल्दी नहीं सुनता। इसीलिए ये लोग दूसरे को या स्वयं को शारीरिक क्षति पहुँचाने को सदैव उत्सुक रहते हैं। 

केतु प्रधान जातक लालची नहीं होते शरीर के नीचे के धड़ को केतु माना गया है। केतु का सिर नहीं होता, इसीलिए कल्पना और विचारों से परिपूर्ण विवेकहीनता के कारण एकाएक क्रोधित हो जाते हैं। अनावश्यक क्रोधवश आपा खो देना, गाली गलौज करना व उसके बाद पश्चाताप करना केतु के अनिष्ट प्रभाव के संकेत हैं। 

केतु शुष्क व अग्नि ग्रह है। इसका दुष्प्रभाव चोट, अग्निभय, ऊपर से गिरने, हथियार से खतरा, बुखार, फोड़े-फुंसी, आँतों के विकार, पागलपन, रक्तचाप, वाणीदोष, तेज बोलने की आदत, पुरानी कब्जियत, बहरापन, बार-बार ज्वर आना जैसे रोग कभी-कभी तकलीफ देते रहते हैं। इनकी वाणी में मिठास होती है। ये कई कलाओं में माहिर होते हैं। रविवार का दिन थोड़ा खराब ही जाता है। कुत्ते अवश्य काटते हैं या किसी जानवर के कारण दुर्घटनायें होती रहती हैं।

केतु के ऋण:- भतीजे-भांजे को दुःख पहुँचाने, कुत्ते को मारने या मरवाने आदि से केतु ग्रह शुभ होकर भी खराब फल देने लगता है।

उपाय:- गणेश पूजन, गणेश जी को 23 पान के पत्ते बुधवार को चढ़ायें। श्री हनुमान जी को 108 पान के पत्तों से मंगलवार को शृंगार करें। कुत्तों को प्रतिदिन रोटी खिलाने से विशेष लाभ होता है। कानों में सोना (बाली) पहिने, कान में छेद करायें व कुत्ते की सेवा करें।

केतु का पितृ-ऋण:- कुत्ते व फकीर को कष्ट देना, बदचलनी, किसी लड़के या लड़की का चरित्र खराब करना, परिवार के बुजुर्गों को कष्ट देना आदि से पितृ-ऋण का प्रभाव बढ़ जाता है। इसका दुष्प्रभाव बढ़ने से यह आकस्मिक चोट, खतरा व धोखा देता है।

उपाय:- जिस कुतिया ने बच्चे को जन्म दिया हो उसे 7 दिन तक भरपेट भोजन कराना। यदि घर के बायीं ओर विधवा स्त्री रहती हो तो उसकी मदद करें और आशीर्वाद लेवें।

कर्क का केतु वाला जातक एकाग्रचित्त, परिश्रमी, संगीतज्ञ और अध्यात्मवादी होता है।

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मिन राशि गत केतु- फल यदि जातक का छाया-ग्रह केतु:-

1. मेष राशि में स्थित हो तो, भौतिकवादी, धन-संग्रह करने वाला, स्वार्थी, लोभी, मुख पर चेचक के दाग, चंचल, बहु-भाषी तथा सुखी।

2. वृष में हो तो, तीर्थ व धार्मिक पर्वों में रुचि लेने वाला, निरु द्यमी, आलसी, उदार, दानी तथा परोपकारी होता है क्योंकि वृष धर्म का रूप होता है।

3. मिथुन में हो तो, वात विकारी, अल्प सन्तोषी, दम्भी, अल्पायु, प्रभावशाली, संगीतज्ञ, व्यवहार कुशल, विद्वान और सम्माननीय।

4. कर्क में हो तो, "धननाशक, अध्यात्मवादी, परिश्रमी, ध्यान केन्द्रित करने वाला, कफ व प्रेत बाधा पाने वाला।

5. सिंह में हो तो, बहुभाषी, डरपोक, असहिष्णु, सर्प-दंश भय और उत्कृष्ण गुणों वाला और विविध कला-विज्ञ।

6. कन्या में हो तो, प्रायः रोगी रहने वाला, धन-नाशक, मूर्ख ओर दुर्बल।

7. तुला में हो तो, कामी, क्रोधी, दुःखी, प्रायः कुष्ट रोगी, हठी, और असन्तोषी।

8. वृश्चिक में हो तो, क्रोधी, कुष्ठरोगी, धूर्त, वाचाल, निर्धन और व्यसनी।

9. धनु में हो तो, मिथ्यावादी, आर्दशवादी, चंचल, धनी, यश्वसी, आस्तिक और तीर्थाटन प्रेमी।

10. मकर में हो तो, उद्यमी, चंचल, तेजस्वी और गूढ़-रहस्य ज्ञाता।

11. कुम्भ में हो तो, भौतिकवादी, साधरण धनी, व्ययशील, भ्रमणप्रिय और भोगासक्त। 

12. मीन में केतु स्थित हो तो, जातक आस्तिक, सज्जन, कर्णरोगी और कभी-कभी अलौकिक शक्तियों से सहयोग पाता है।

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कर्क का केतु वाला जातक जब अपनी क्षमता को सही दिशा नहीं दे पाता, तब प्रेत बाधा और कफ से कष्ट पाता है।


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