जिंदगी का आखिरी लक्ष्य ज्ञान है ? कर्म करें या धर्म ?

जिंदगी का आखिरी लक्ष्य ज्ञान है ?

आमतौर पर मनुष्य जीवन का अंतिम लक्ष्य सुख को मानता है| लेकिन अध्यात्म-दर्शन सुख को परिवर्तनशील स्थिति मानता है, जो आती है फिर चली जाती है| मूल रूप से मानव जाति का अंतिम लक्ष्य ज्ञान का लाभ प्राप्त करना ही है| सुख को यदि हम अपना मुख्य उद्देश्य मानने लगेंगे तो यह हमारी भूल होगी, सुख और दुख जीवन के रास्ते में आने वाले और लगातार एक दूसरे में परिवर्तित होने वाले वह कारक हैं, जो हमें जीवन  के  मूल लक्ष्य ज्ञान की समझ देते हैं| सुख और दुख से हमें जो मिलता है वही हमारे संस्कार में जुड़ता है| हमारे संस्कार ही हमारे चरित्र का निर्माण करते हैं| हर व्यक्ति का व्यक्तित्व और उसका चरित्र सुख और दुख के उसके अनुभवों से मिलकर बनता है| सुख से भी शिक्षा मिलती है, लेकिन दुख से जो शिक्षा मिलती है वह सुख से भी ज्यादा महत्वपूर्ण होती है| दुख और दरिद्रता ने मनुष्य को ज़्यादा  सिखाया है| तारीफ की बजाए बुराई और आलोचनाओं ने मनुष्य जाति का अधिक  उत्थान किया है|

 

सवाल यह उठता है कि ज्ञान का स्रोत कहां है, ज्ञान बाहर से हासिल होता है या ज्ञान का ओरिजिन हमारे अंदर ही है? दरअसल, ज्ञान का मूल हर एक पिंड में इस सृष्टि की शुरुआत से ही मौजूद है| व्यक्ति अपने अंदर मौजूद उस ज्ञान का आविष्कार करता है, यानी ज्ञान के ऊपर जो धूल चढ़ी हुई है उसे हटाकर उसे उद्घाटित करता है| इस दुनिया में जिन भी नियमों या सिद्धांतों की खोज की गई वह पहले से ही मौजूद थे| बस उन्हें ढूंढा गया, उन्हें सामने लाया गया|
मनुष्य की चेतना जो आत्मा मन और प्राण से मिलकर बनी है, उसमें वास्तविक ज्ञान मौजूद होता है| जैसे जैसे व्यक्ति साधना के क्षेत्र में आगे बढ़ता है, चेतना के अंदर मौजूद उस ज्ञान का अनावरण होने लगता है, आग माचिस की तीली में मौजूद होती है| बस उस तीली को माचिस के रोगन से घिसना पड़ता है| यह जो घर्षण है यही साधना है, इसी साधना से हम धीरे-धीरे अपने अंदर मौजूद ज्ञान की चिंगारी को भड़काने का काम करते हैं|
हर व्यक्ति हमेशा कुछ न कुछ कर्म करता रहता है, हमारे शरीर के अंदर भी लगातार कर्म होता रहता है| सांसे चल रही है, यह सासों का कर्म है| रक्त परिभ्रमण कर अपना कर्म करता है| मस्तिष्क लगातार विचारों को पैदा करके अपना कर्म करता है| हर जगह हर समय कोई ना कोई कर्म होता रहता है| कर्म ही शक्ति है, और यही शक्ति हमारे चरित्र पर प्रभाव डालती है| हम सब एक शक्तिशाली टावर हैं, जो अपने आसपास से लगातार ऊर्जा को अपनी तरफ आकर्षित कर रहे हैं| हमारे अंदर और बाहर जो भी कुछ सही या गलत, नैतिक या अनैतिक हो रहा है, वह सब इस टावर के जरिए हमारे चरित्र व व्यक्तित्व में समाहित होता जा रहा है| और इसी चरित्र से इच्छाशक्ति पैदा होती है| यही इच्छा शक्ति बड़े-बड़े कार्यों बड़ी-बड़ी खोजों और आविष्कारों का कारण बनती है| यही इच्छा शक्ति किसी को हिटलर बनाती है तो किसी को विवेकानंद |

 

मनुष्य की इच्छाशक्ति, मनुष्य का संकल्प, उसे जो चाहे वह बना सकता है| यह संकल्प अचानक पैदा नहीं होता, यह संकल्प आन्तरिक व वाह्य ब्रह्मांड से प्राप्त ऊर्जाओं की समष्टि होता है|

हम सब अपने जीवन में वही हासिल करते हैं, यह वही देते हैं, जिसके हम लायक होते हैं| जैसे इंटरनेट की दुनिया में ज्ञान का भंडार मौजूद है, लेकिन एक व्यक्ति, एक क्लिक पर ज्ञान का समुद्र होते हुए भी वही हासिल कर सकता है, जिसका वह उत्तराधिकारी होता है| जैसा उसका चरित्र होगा, जैसा उसका संकल्प होगा, उसी तरह का कंटेंट वह आत्मसात कर पाएगा| बाकी सब कुछ उसके लिए निरर्थक होगा, बेफिजूल का होगा|

 

भारतीय दर्शन में कर्म के योग का अर्थ है, हमारे अंदर मौजूद शक्ति और ज्ञान के केंद्र को उद्घाटित कर देना| कर्म में स्वार्थ उसकी शक्ति को कम करेगा और निस्वार्थ भाव से किया गया कर्म उसकी शक्ति को और ज्यादा बढ़ाएगा| जो व्यक्ति निस्वार्थ भाव से कर्म करते हुए आगे बढ़ता रहेगा, वही 1 दिन महानता को उपलब्ध हो सकेगा|

आजीविका चलाने के लिए किए जाने वाले कर्म अलग है और आत्म-उत्थान के लिए किए जाने वाले कर्म अलग है|

 

हर व्यक्ति को आजीविका के लिए कर्म करने का अधिकार है, वह कर्म छोटा भी हो सकता है और बड़ा भी| लेकिन दोनों ही महत्वपूर्ण हैं| बाहरी साधनों और आंतरिक लक्ष्य की पूर्ति के लिए लगातार कर्म करते रहना ज़रूरी है| भौतिक जरूरतों के लिए हमें सांसारिक कर्म और आंतरिक उन्नति के लिए साधना ,उपासना रूपी कर्म करते रहना चाहिए|

 

जो लोग शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करते हैं| वे साधारण से साधारण कर्म में भी शांति महसूस करेंगे और जो जीवन के निचले तालों पर जी रहे हैं, वह बड़े से बड़े और महान से महान कार्य में भी अशांति महसूस करेंगे|

 

कर्म के रहस्य को समझने की इस यात्रा में आगे हम और भी विषयों को छूने की कोशिश करेंगे| आप पढ़ते रहिए न्यूज़ पुराण  ध्यान रखिए जीवन के रास्ते में संघर्ष करते-करते कभी ना कभी वह समय जरूर आता है| जब हम कर्म के वास्तविक स्वरूप को समझ जाते हैं, और बिना किसी स्वार्थ के अपने कर्म के पथ पर आगे बढ़ने में अपने आप को सक्षम पाते हैं| इसी तरह से किया गया कर्म धर्म है |
अतुल विनोद

ATUL VINOD



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