कुशल राजनीतिज्ञ हनुमान -दिनेश मालवीय

कुशल राजनीतिज्ञ हनुमान

-दिनेश मालवीय

आज के दौर में राजनीति शब्द एक गाली जैसा हो गया है. लेकिन राजनीति का उद्देश्य जन-कल्याण और दुष्टों का विनाश है. श्रीराम भक्त हनुमान सर्व ज्ञान सम्पन्न हैं. ज्ञान में राजनीति भी शामिल है. राजनीति का एक सम्पूर्ण शास्त्र है. हनुमानजी राजनीति में बहुत निपुण हैं. हालाकि शुक्राचार्य ने कहा है कि-" श्रीराम के सामान नीतिमान राजा पृथ्वी पर न कोई हुआ है और न कभी होना ही संभव है". फिर उनके सबसे प्रिय सेवक हनुमानजी राजनीति में निपुण न हों, यह कैसे हो सकता है?

राजनीति के क्षेत्र में हनुमानजी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह सही समय पर सही मंत्रणा देते हैं. सही मंत्रणा नहीं मिलने पर समझदार से समझदार व्यक्ति बड़ी भूल कर जाता है. हनुमानजी जिसके भी साथ रहे, उसे सही समय पर सही मंत्रणा दी. इस बात का उल्लेख स्वयं श्रीराम ने अपने भाई लक्ष्मण से किया है.

वाल्मीकि रामायण में श्रीराम लक्ष्मण से कहते हैं-" लक्षमण! यह महामनस्वी वानरराज सुग्रीव के सचिव हनुमान हैं. यह उन्हीं के हित के लिए मेरे पास आये हैं. जिसे ऋग्वेद की शिक्षा नहीं मिली, जिसने यजुर्वेद का अभ्यास नहीं किया और जो सामवेद का विद्वान नहीं है, वह इस प्रकार सुन्दर भाषा में वार्तालाप नहीं कर सकता. निश्चय ही इन्होने सम्पूर्ण व्याकरण का कई बार स्वाध्याय किया है, क्योंकि बहुत-सी बातें करने पर भी इनके मुख से कोई अशुद्ध उच्चारण नहीं हुआ."

श्रीराम से पह्ली भेंट में ही श्रीराम हनुमानजी पर मुग्ध हो जाते हैं. उनकी योग्यता के विषय में वह अपने भाई से कहतेहैं कि-" वध करने के लिए तलवार उठाये हुए शत्रु का ह्रदय भी इस अद्भुतवाणी से बदल सकता है. जिसराजा के पास इनके समान मन्त्र-कुशल दूत  हो, उसके सभी मनोरथ दूत की बातचीत से सिद्धहो जाते हैं"

अपने प्राणके शत्रु बाली से बुरी तरह भयभीत सुग्रीव की श्रीराम से मित्रता करवाना हनुमानजी की कुशल राजनीति का परिचायक है. वहएक श्रेष्ठ दूत के रूप में श्रीराम के पास जाकर सुग्रीव और श्रीराम में इस तरह मित्रता करवाते हैं, जो दोनों के हित में हो. श्रीरामबाली का वध कर सुग्रीव के जीवन की रक्षा करता है और सुग्रीव सीताजी की खोज में उनकी मदद करता है. दोनों के बीच मित्रता अटूट और पक्की रहे इसके लिए वह इसे अग्नि को साक्षी मानकर करवाते हैं.

ऋष्यमूक पर्वत पर सुग्रीव ने जब श्रीराम और लक्ष्मण को देखा तो उसे संदेह हुआ कि वे बाली द्वारा भेजे हुए हैं. तब हनुमानजी ने उसे समझाया कि आपको यहाँ बाली का कोई भय नहीं है. यदि वह यहाँ आया तो श्राप के वश उसे के सिर के हजारों टुकड़े हो जायेंगे. इसके बाद वह ब्राहमण के वेष में श्रीराम से मिलता हैं और उनकी सुग्रीव से मित्रता करवाते हैं. हनुमानजी की मंत्रणा के फल स्वरूप ही सुग्रीव को बाली से मुक्ति और किष्किन्धा राज्य की प्राप्ति हुयी.

राजपाटपाकर जब सुग्रीव श्रीराम को दिए गये वचन को भूलकर विलासिता में लिप्त हो गया, तब हनुमानजी ने एक श्रेष्ठ राजीनीतिज्ञ होने का परिचय देते हुआ उसे बहुत निर्भीकता से उसका कर्तव्य और वचन याद दिलवाया. वह जानते थे कि यदि सुग्रीव ने अपने वचन का पालन नहीं किया तो लक्ष्मण किष्किन्धा तो तहस नहस कर देंगे. हनुमानजी को पता था कि किस समय क्या बात करनी चाहिए और क्या नहीं.

जिस समय रावण से अपमानित होकर विभीषण श्रीराम के पास आये तो उन्होंने श्रीराम के शिविर में प्रवेश पाना चाह. तब श्रीराम ने अपनी सुरक्षा समिति के परामर्शदाताओं से मंत्रणा चाही, तो सुग्रीव ने कहा कि शत्रु शिविर से आये रावण के भाई पर विशवास नहीं करना चाहिए. वह जासूसी करने आया है. उसे बंदी बनाया जाए या उसका वध कर दिया जाए. अंगद और अन्य सभी ने सुग्रीव की बात का समर्थन किया. परन्तु हनुमानजी से पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि- विभीषण को एकदम अपने शिविर में बिना संकोच के प्रवेश दे दिया जाए. वह बिलकुल शरण देने योग्य हैं और हमारे लिए लाभदायक तथा सहायक सिद्ध होंगे.इस पर सभी ने आपत्ति की और हनुमानजी से पूछा कि आप यह बात किस आधार पर कह रहे हैं.

हनुमानजी ने कहा -" मैं जो कुछ निवेदन करूंगा, वहवाद-विवाद, तर्क,स्पर्धा, अधिक बुद्धिमत्ता दिखाने के अभिमान या किसी कामना से नहि न्करूंगा.मैं तो कार्य की गंभीरता को नज़र में रखकर यथार्थ ही कहूँगा. जब विभीषण खुद ही कह रहाहै कि वह रावण का छोटा भाई है और आपकी शरण चाहता है, तो इसमें जासूसी वाली बात कहाँ से आती है? उसेशरण देना सर्वथा उचित है. उनकी बात मानकर श्रीराम ने विभीषण को शरण दी.

हनुमानजी की परामर्श श्रीराम के लिए कितनी हितकारी सिद्ध हुयी, यह राम-रावण युद्धके दौरान अनेक अवसरों पर स्पष्ट हो गया. यदि विभीषण मेघनाद द्वार किये जा रहे गुप्त यज्ञ की बात नहीं बताता और उसके आधार पर लक्ष्मण उस यज्ञ को नष्ट नहीं करते, तो श्रीराम के लिएयुद्ध जीतना बहुत कठिन हो जाता.  इसी प्रकार नकली सीता के वध की चालाकी विभीषण नहीं बताते तो , वानर सेना का उत्साह समाप्त हो जाता, क्योंकि शत्रु की इस चाल से श्रीराम अचेत हो गये थे.

इसके अलावा रावण की नाभि में अमृतकुंड की बात भी विभीषण ने हीश्रीराम को बताई, वरना उसका वध ही नहीं हो सकता था.

इस प्रकार हम देखते हैं कि हनुमानजी राजनीति के ज्ञान में भी बहुत निपुण थे. वह जिसके भी साथ रहे, उसे उनकी मंत्रणा से लाभ मिला.

Priyam Mishra



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