राजस्थान के प्रमुख संत-दिनेश मालवीय

राजस्थान के प्रमुख संत

-दिनेश मालवीय

भारत में राजस्थान को मुख्य रूप से वीरों और बलिदानियों की भूमि माना गया है. वीरता,साहस और अपने देश तथा संस्कृति कि रक्षा के लिए उनकी प्रबद्धता सचमुच अद्वितीय है. लेकिन राजस्थान सिर्फ वीरों की भूमि नहीं है. इस पवित्र माटी में बहुत महान संतों को भी जन्म दिया है, जिन्होंने भक्ति के माध्यम से चेतना की चरम अवस्था को प्राप्त किया. इतना ही नहीं उन्होंने लोकजीवन में पवित्रता कायम करने की दिशा में भी उल्लेखनीय कार्य किये. यहाँ के संतों में निर्गुण तथा सगुण दोनों धाराओं के संत हुए हैं.



राजस्थान के संतों में मेवाड़ राज्य की रानी मीराबाई तो सिरमौर हैं ही और उनका नाम जगत प्रसिद्ध है,लेकिन यहाँ दादूदयाल,रज्जब,दरिया साहब, पीपाजी, रामदेव, सुन्दरदास, हरिरामदास आदि अनेक महान संत भी हुए हैं.

मीराबाई-इनका जन्म मेड़ता राजपरिवार में हुआ था और यह महाराणा सांगा के पुत्र भोजराज की पत्नी थीं. बचपन से ही इन्होंने श्रीकृष्ण को मन ही मन अपना पति मान लिया. श्रीकृष्ण के प्रति उनकी निष्ठा इतनी गहरी थी कि वह जीवन भर अपने सांसारिक पति को कभी पति नहीं मान पायीं.वह श्रीकृष्ण के सगुण स्वरूप की उपासक थीं. राजकुल से जुड़ा होना कभी उनकी भक्ति में आड़े नहीं आया. वह जाति-पाति की सोच से ऊपर उठ चुकी थीं.राज मर्यादाओं का उल्लंघन करने पर उन्हें उनकी ससुराल में अनेक प्रकार से प्रताड़ित भी किया गया, लेकिन वह अपने मार्ग पर अडिग रहीं.

ससुराल में दी जाने वाली प्रताड़नायें जब असहनीय हो गयीं तो उन्होंने अपने घर का त्याग कर दिया. उन्होंने महान भक्त रैदास को अपने गुरु के रूप में वरण किया, जो जाति और कर्म से मोची थे. वह आजीवन अपने गुरु के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित रहीं और उनके चरणों में सदा नतमस्तक रहीं.

मीराबाई सिर्फ भक्त नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना की संवाहक भी थीं. उन्होंने सती प्रथा और जाति प्रथा सहित अनेक सामाजिक बुराइयों को मानने से इनकार कर दिया. मीरा के जीवन के प्रसंग इतने अधिक और व्यापक हैं कि उनको विस्तार से यहाँ लिख पाना संभव नहीं है. लेकिन उनके भक्ति रस में डूबे पद आज भी भारतीय भक्ति-साहित्य की अनमोल धरोहर हैं. आज भी उन्हें बहुत सम्मान और प्रेम के साथ गाया जाता है.

संत पीपाजी- इनका जन्म राजस्थान में गागरौन गढ़ के खीची चौहान राजवंश में हुआ था. पीपाजी महाराज के मन में इतना गहरा वैराग्य जागा कि वह अपने  भतीजे को राजपाट सौंपकर काशी में निवास करने लगे. वहाँ उन्होंने महान संत स्वामी रामानंद से दीक्षा ली. पीपाजी गाँव-गाँव घूमकर भगवान की भक्ति और सदाचार के संदेश का प्रसार करते थे. वह स्वयं भजनों की रचना कर उन्हें गाते थे. इसके लिए उन्हें उनके गुरु ने प्रेरित किया था. गुरु के निर्देश पर वह गुजरात धर्म क का प्रसार करने के लिए पहुँच गये.

पीपाजी ने गुजरात में रामडा,बेट द्वारिका, गांगरौन और काठियावाड में अनेक गद्दियों की स्थापना की. वह जात-पात का भेद नहीं मानते थे. गुजरात और राजस्थान में उनके लाखों भक्त आज भी हैं. देशभर के दर्जी समाज में उन्हें अवतार माना जाता है. राजस्थान में उनके नाम पर अनेक जगहों पर मेले लगते हैं. उन्होंने जातिवाद, पाखंड, छूआछूत आदि बुराइयों को दूर करने मन बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभायी.

संत रामदेव- राजस्थान में यह एक बहुत महान संत हुए हैं. बाबा रामदेव दिल्ली के राजा अनंगपाल के वंश में जन्मे थे. वह एक वीर योद्धा, उच्चकोटि के योगी, भक्त और आध्यात्मिक साधक थे. उनकी राजस्थान ही नहीं पूरे देश में बहुत मान्यता है. उनके स्थान पर श्रद्धा व्यक्त करने हज़ारों भक्त जाते हैं. उन्होंने गाँव-गाँव घूमकर सामाजिक बुराइयों के खिलाफ अलख जगायी.  उनके रात्रि के भक्ति-समागम को जुम्मा जागरण कहा जाता है. राजस्थान और गुजरात में उनके अनेक मंदिर बने हैं, जहाँ बड़ी संख्या में लोग दर्शन को जाते हैं.



संत धन्ना- जाट परिवार में जन्में, यह भी काशी के स्वामी रामानंद के शिष्य थे.इनका जन्म टोंक जिले एक ग्राम धुन्धा में हुआ था. वह सगुण उपासक थे. संत धन्ना भी जातिगत भेदभाव के बहुत विरोधी थे और मानते थे कि समाज में कोई बड़ा-छोटा जाति और कुल से नहीं, बल्कि अपने आचरण से होता है. वह संत नामदेव, भक्त रैदास, संत सेन आदि का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि ये सभी लोग नीची मानी जाने वाली जातियों में जन्म लेकर भी अपने शुद्ध आचरण से समाज में पूज्य हो गये. संत धन्ना द्वारा रचित चार शबदों को “श्री गुरुग्रंथसाहिब” में शामिल किया गया है. “आरता” नाम की इनकी रचना बहुत पसिद्ध है.

संत जम्भ्नाथ- इनका जन्म राजस्थान के नागौर क्षेत्र में एक राजपूत परिवार में हुआ था. कहते हैं कि बहुत अधिक आयु होने पर भी वह कुछ बोले नहीं, लेकिन बाद में मुनीन्द्र जम्भ ऋषि के नाम से प्रसिद्ध हुये. वह आजीवन ब्रह्मचारी रहे और उनका पूरा जीवन पवित्र तथा निष्कलंक रहा. जाति सहित किसी भी प्रकार के भेदभाव से वह बहुत ऊपर थे.

उन्होंने चौंतीस साल की उम्र में घर का त्याग कर दिया और “समराथल धोरे” नामक स्थान पर जा विराजे. वहाँ वह भक्ति और सदाचार का उपदेश देते थे. एक बार भयंकर अकाल पड़ने पर उन्होंने भूखे लोगों और पशुओं के लिए बहुत सहायता का प्रबंध किया. उन्होंने  विक्रम संवत 1542 में कार्तिक कृष्ण अष्टमी को विश्नोई पंथ की स्थापना की.

जोधपुर के संस्थापक राजा जोधाजी,बीकानेर के संस्थापक राव बीकाजी, मीराबाई के पितामह राव दूदा आदि प्रतिष्ठित लोग भी उनके शिष्य हो गये. दिल्ली के अत्याचारी सुल्तान सिकंदर लोधी के बुरे कामों को कुछ कम करने का श्रेय उन्हें ही जाता है. वह उनका भक्त बन गया था. नागौर का शासक मोहम्मद खान भी उनसे भेंट करके बहुत प्रभावित हुआ था. उन्होंने निर्गुण मत का प्रचार किया.

जाम्भोजी ने विष्णु के सर्वशक्तिमान निराकार रूप को माना. उनकी रचनाओं में ओंकार जप, निरंजना की उपासना, अजपाजप, सतगुरु महिमा, सोहंजाप आदि का बार-बार उल्लेख मिलता है. विश्नोई सम्प्रदाय के लोग अहिंसा के नियमों का पालन करते हैं. वृक्ष काटने के विरोध में सैंकड़ों विश्नोई लोगों ने अपना बलिदान किया.

संत हरिदास- यह एक क्षत्रिय परिवार में जन्में थे. उन्होंने निरंजनी संप्रदाय को आगे बढाने वाली संत परंपरा को प्रोत्साहित किया. उनके बारह प्रमुख शिष्य थे और अनुयायियों की संख्या हजारों में थी. राजस्थान में इनकी अनेक गद्दियाँ और मठ हैं. हरिदासजी ने नौ ग्रंथों की रचना की.



दादूदयाल- राजस्थान के संतों में इनका स्थान बहुत महत्वपूर्ण है. वह निर्गुण ईश्वर के उपासक थे. वह धुनिया जाति के थे. उनका जन्म गुजरात के अहमदाबाद में हुआ था. संत रज्जब संत दादूदयाल के ही शिष्य थे. मध्यकाल में जाति-व्यवस्था और अनेक बुराइयों को दूर करने की दिशा में दादूदयाल का बहुत महत्वपूर्ण योगदान है. उनके पदों की आचार्य रजनीश यानी ओशो ने बड़ी सुंदर व्याख्या की है.



सुन्दरदास-राजस्थान के एक वैश्य परिवार में जन्में संत सुन्दरदास को उनके माता-पिटा ने छह वर्ष की उम्र में ही संत दादूदयाल की सेवा में भेज दिया था. वह उनके बहुत प्रिय शिष्य बन गये.  उम्र में छोटे होने के कारण उन्हें “सुन्दरदास छोटे” के नाम से जाना गया. उन्होंने काशी में वेदान्त, सांख्य, योग,दर्शन, ब्रह्मसूत्र, शंकर भस्य आदि का बहुत गहरा अध्ययन किया.



राजस्थान के अन्य प्रमुख संतों में संत दरिया साहब , संत हरिरामदास, संत रामदास , महर्षि नवल महाराज आदि भी शामिल हैं.


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