योग के उद्देश्य ? आत्मा को परमात्मा में मिला देना,आनन्द की प्राप्ति; दुःख से मुक्ति ही मोक्ष..

योग के उद्देश्य ? आत्मा को परमात्मा में मिला देना,आनन्द की प्राप्ति; दुःख से मुक्ति ही मोक्ष..
योग के उद्देश्यों में चार बातें मुख्य हैं: आत्मा को परमात्मा में मिला देना| आनन्द की प्राप्ति; दुःख से मुक्ति। अन्तिम रूप में योग का लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति है। मोक्ष को कई अर्थों में ले सकते हैं। हर प्रकार के सांसारिक बन्धनों से हमेशा के लिए मुक्ति, दुःख से मुक्ति,आवागमन से, बार-बार जन्म-मृत्यु से छुटकारा, आत्मा का परमात्मा में विलय।अगर योग को थोड़े और व्यापक रूप में लें तो भक्तियोग, कर्मयोग, ज्ञानयोग आदि को भी इसमें सम्मिलित कर सकते हैं। लेकिन हम यहां पर योग को गीता तथा पतंजलि के योग के अर्थ में ही लेंगे।


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योग के उद्देश्य

पतंजलि के अनुसार योग के आठ अंग हैं। 

ये हैं:-

1. यम (नैतिक कर्तव्य)

2. नियम (अनुशासन)

3. आसन (शरीर की स्थिति)

4. प्राणायाम (श्वास प्रश्वास पर नियंत्रण) 

5. प्रत्याहार (बाहरी वस्तुओं और इन्द्रियजनित आनंदानुभूति से मुक्ति)

6. धारणा (किसी एक ही विषय पर मन की एकाग्रता)

7. ध्यान (धारणा के विषय को चेतना के केन्द्र में रखकर उस पर चिन्तन)

8. समाधि (गहरे ध्यान के द्वारा प्राप्त दिव्य चेतना की वह अवस्था जब आत्मा का परमात्मा में विलय हो जाता है)


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1. यम पांच हैं:- 

अहिंसा (किसी की हानि नहीं करना)। 

अस्तेय। 

सत्य, (चोरी नहीं करना)। 

ब्रह्मचर्य (अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण)। 

अपरिग्रह (लोभ पर काबू रखकर व्यर्थ संग्रह न करना)। 


चूंकि व्यक्ति समाज में पैदा होकर, सारी उम्र उसी के अंदर उसी के साथ रहता है, इसलिए उसे ऐसे नियमों का पालन करना पड़ता है ताकि वह भी सुखी रह सके और अन्य लोगों को भी दुःख न हो। अगर आदमी पैदा होते ही जंगलों में चला जाए, जिन्दगी भर अकेला रहे तो उसे किसी तरह के नैतिक मूल्यों और कर्तव्यों की आवश्यकता न रहे। अकेला आदमी हिंसा करेगा भी किसकी ? झूठ बोलेगा किससे ? चोरी करेगा किसकी? अपनी इन्द्रियों पर काबू नहीं रखे तो भी किसी का नुकसान नहीं, और अगर कोई और वहां होगा ही नहीं तो धनसंचय करेगा कहां से ? लोभ करेगा किसकी वस्तुओं पर ? 

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 

उपर्युक्त पांच यमों के पालन से व्यक्ति समाज में रहकर औरों को भी सुखी रख सकता है, स्वयं भी सुखी रह सकता है। इसलिए ही यह विधान बनाया गया है।

2.  नियम भी पतंजलि के अनुसार पांच हैं — शौच अर्थात् शरीर और मन की शुद्धता

3. तप अर्थात् साध्य की प्राप्ति के लिए कष्ट सहते हुए भी निरन्तर साधना करते जाना।

4. स्वाध्याय अर्थात सद्ग्रन्थों का अध्ययन।

5. ईश्वर प्रणिधान अर्थात सारे प्रयासों और कर्मों को ईश्वर को अर्पित कर देना।


पतंजलि के अष्टांग योग के तीसरे अंग आसन का अर्थ शरीर की स्थिति है। पतंजलि ने आसन के सम्बन्ध में सिर्फ एक सूत्र दिया है स्थिरम् सुखमासनम् यानी शरीर को ऐसी स्थिति में रखना कि व्यक्ति काफी देर सुखपूर्वक उसी में स्थिर रह सके। इस तरह जिस योग की कल्पना पतंजलि ने की है उसमें उनके उद्देश्य की प्राप्ति के लिए, पद्मासन, सुखासन अथवा सिद्धासन काफी है (इनका वर्णन हम आगे चलकर यथास्थान करेंगे। 



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पतंजलि ने अपने योग का कोई विशेष नाम तो नहीं दिया है, लेकिन उसका नाम 'राजयोग' पड़ गया है। राजयोग का अर्थ होता है किसी एक आसन (पद्मासन, सुखासन अथवा सिद्धासन) में स्थिर होकर निरन्तर ध्यान करते हुए समाधि की अवस्था में पहुंचकर अंततः मोक्ष प्राप्त कर लेना। लेकिन आसन अलग से ही एक बड़ा विज्ञान बन गया।

आध्यात्मिक


'हठयोग प्रदीपिका' अथवा 'घेरंडसंहिता' आदि ने आसनों की संख्या काफी बढ़ा दी। शरीर अगर स्वस्थ न रहे तो चित्त भी शान्त नहीं हो सकता और न व्यक्ति ध्यान लगा सकता है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए व्यायाम की आवश्यकता आदिकाल से ही अनुभव होती आई है। व्यायाम में शरीर को हरकत देकर उसे तन्दुरुस्त रखने की चेष्टा होती है।



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भारतीय शरीर वैज्ञानिकों ने कभी-न-कभी यह जाना कि शरीर को हिला डुलाकर, उसे तीव्र गति से हरकत देकर तो स्वस्थ रखा ही जा सकता है, उसे विशेष विशेष प्रकार की स्थितियों में कुछ कुछ देर तक स्थिर रखने से उसे और अधिक स्वस्थ रखा जा सकता है। यह आविष्कार ही योगासनों का जनक हुआ। शरीर के विभिन्न अंगों के संकोचन और प्रसारण के द्वारा उन्हें पुष्ट करने के लिए विभिन्न आसनों की सृष्टि हुई। इस तरह शरीर के द्वारा प्राप्त किए जाने वाले संभावित आसनों की संख्या सैकड़ों हुई। काट-छांट करके कुछ योगियों ने इसकी संख्या चौरासी तय की। 



आज योग विज्ञानी अपने-अपने अनुभव के अनुसार आसनों की संख्या तय करते हैं जो बीस से लेकर पचास-पचपन तक देखने में आती है। आसनविज्ञान का प्रचलित नाम हठयोग है। गुरु गोरक्षनाथ (गोरखनाथ) ने हठयोग के प्रचार में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, ऐसा कहा जाताहै। 



इस तरह हम देखते हैं कि योग के दो भाग हैं राजयोग जो प्रधानतया ध्यान का योग है, चित्तवृत्ति-निरोध का योग है, मन में शांति लाकर उसकी चंचलता को समाप्त कर आध्यात्मिक अनुभव और अंततः आत्मा को विश्वात्मा में विलीन कर देने का योग है; और हठयोग जो शरीर को श्रेष्ठतम स्वास्थ्य प्रदान करने का योग है। हठयोग का भी अंतिम उद्देश्य, योगियों के अनुसार, आध्यात्मिक अनुभव और मोक्ष ही माना जाता है।



प्राणायाम को हम हठयोग का ही भाग मानेंगे। कहते हैं सारा विश्व प्राण नामक ऊर्जा से व्याप्त है। हम इस ऊर्जा को अपने अंदर श्वास प्रश्वास की क्रियाओं द्वारा प्राप्त करते हैं। अनुभव बताता है कि अगर हम अपनी श्वास प्रश्वास प्रणाली पर नियंत्रण कर लें तो एक ओर हम सुन्दर स्वास्थ्य लाभ करते हैं, दूसरी ओर मन की चंचलता को नष्ट कर अपने आपको गहनतम समाधि तक ले जाने के योग्य बना लेते हैं।


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