नारद पुराण: जिसे सुनने मात्र से व्यक्ति पापों से मुक्त हो जाता है-दिनेश मालवीय

नारद पुराण संक्षेप

-दिनेश मालवीय

यह एक वैष्णव पुराण है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसको सुनने मात्र से व्यक्ति पापों से मुक्त हो जाता है. इसका मुख्य विषय भगवान् विष्णु की भक्ति है.

इस पुराण में ऋषिगण सूतजी से प्रश्न पूछते हैं. सूतजी उनका सीधा उत्तर न देकर इसके लिए सनत्कुमारों के माध्यम से बताते हैं कि भगवान् विष्णु ने अपने दक्षिण भाग से ब्रह्मा और वाम भाग से शिव को प्रकट किया है. लक्ष्मी, उमा, सरस्वती और दुर्गा आदि विष्णु की ही शक्तियाँ हैं. श्रीविष्णु को प्रसन्न करने का सबसे अच्छा साधन श्रद्धा, भक्ति और सदाचरण का पालन है. जो भक्त निष्काम भाव से ईश्वर की भक्ति करता है और अपनी सभी इन्द्रियों को मन द्वारा संयमित रखता है, उसे ईश्वर की निकटता प्राप्त होती है.

इस पुराण में अतिथि को देवता मान कर उसका पूरा आदर-सत्कार करने और विद्वानों तथा ज्ञानियों को सदा नमन करने की शिक्षा दी गयी है. इसमें जीवन के चार निर्धारित आश्रमों का निष्ठा के साथ पालन करने को कहा गया है.

नारद पुराण में गगावतरण का प्रसंग और गंगा किनारे स्थित तीर्थों के महत्त्व का विस्तार से वर्णन है. इसमें सगर द्वारा शक और यवन जातियों से युद्ध का विवरण भी मिलता है.नारद पुराण दो भागों में विभाजित है- पूर्व भाग और उत्तर भाग.

पूर्व भाग में ज्ञान के विविध सोपानों का सांगोपांग वर्णन मिलता है. इसमें ऐतिहासिक गाथाएँ, गोपनीय धार्मिक अनुष्ठान, धर्म का स्वरूप, भक्ति का महत्त्व बताने वाली अद्भुत कथाएं, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष, मन्त्र विज्ञानं, बारह महीनों की व्रत-तिथियों के साथ जुडी कथाएं, एकादशी व्रत का महत्त्व, गंगा का महत्त्व, ब्रह्मा के मानस पुत्रों- सनक, सनंदन, सनातन और सनत्कुमार आदि का नारद से संवाद आदि शामिल हैं.

उत्तर भाग में महर्षि वशिष्ट और ऋषि मान्धाता की व्याख्या दी गयी है. यहाँ वेदों के छह अंगों का विश्लेषण है. ये अंग हैं- शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष.

शिक्षा के अंतर्गत मुख्य रूप से स्वर, वर्ण आदि के उच्चारण की विधि का विवेचन है. मंत्रों की तान, राग, स्वर, ग्राम और मूर्छ्ता आदि के लक्षण, मंत्रों के ऋषि, छंद और देवताओं का परिचर्य और गणेश पूजा का विधान इस भाग में बताया गया है.

कल्प में हवन और यज्ञ आदि अनुष्ठानों की चर्चा है. इसके अनुसार, चौदह मन्वंतर एक काल या 4,32,00,00,000  वर्ष होते हैं. यह ब्रह्मा का एक दिन कहलाता है. अर्थात काल गणना का उल्लेख तथा विवेचन भी किया जाता है.

व्याकरण में शब्दों के रूप तथा उनकी सिद्धि आदि का पूरा विवेचन किया गया है.

निरिक्त में शब्दों ने निर्वाचन पर विचार किया जाता है. शब्दों के रूढ़, यौगिक और योगारूढ़ स्वरूप को इसमें समझाया गया है.

ज्योतिष के अंतर्गत गणित अर्थात सिद्धांत भाग, जातक अर्थात होरा स्कंध अथवा ग्रह-नक्षत्रों का फल, ग्रहों की गति, सूर्य संक्रमण आदि विषय शामिल हैं.

छंद के अंतर्गत वैदिक और लौकिक छंदों के लक्षणों आदि का वर्णन है. इन छंदों को वेदों का चरण कहा गया है, क्योंकि इनके बिना वेदों की गति नहीं है. छंदों के बिना वेदों की ऋचाओं का सस्वर पाठ नहीं हो सकता. इसीलिए वेदों को ‘छांदस’  भी कहा जाता है. वैदिक छन्दों में गायत्री, शम्बरी अरु अतिशम्बरी आदि हैं, जबकि लौकिक छन्दोंमें ‘मात्रिक’ और ‘वार्णिक’भेद हैं.

भारत के गुरुकुलों और आश्रमों में शिष्यों को चौदह विद्याएँ सिखाई जाती थीं- चार वेद, छह वेदांग, पुराण, इतिहास, न्याय और धर्मशास्त्र.

नारद पुराण में विष्णु की पूजा के साथ-साथ रामकी पूजा का भी विधान बताया गया है. हनुमानजी और श्रीकृष्ण की उपासना की विधियाँ भी बतायी गयी हैं. काली और महेश की पूजा के मंत्र भी दिए गये हैं. लेकिन मुख्य रूप से यह पुराण वैष्णव ही है. इसमें गोहत्या और देव निंदा को घोर पाप मानते हुए ऐसे लोगों के समक्ष नारद पुराण का पाठ करने की मनाही की गयी है.


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