बढ़ती हिंसा के बीच न्याय और शांति की बात जरूरी: सुमित कुमार

बढ़ती हिंसा के बीच न्याय और शांति की बात जरूरी
सुमित कुमार
हिंसा एक जटिल अवधारणा है, दूसरे शब्द में कहें तो यह एक जटिल सिद्धांत है। हिंसा को अक्सर बल प्रयोग या धमकी के रूप में समझा जाता है, जिसका परिणाम चोट, नुकसान, किसी चीज से वंचित कर देना अथवा जीवन की समाप्ति के रूप में सामने आता है। हिंसा का स्वरूप शारीरिक, मौखिक या मनोवैज्ञानिक भी हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) हिंसा को “शारीरिक बल या शक्ति का जानबूझकर उपयोग, धमकी स्वयं के खिलाफ या किसी अन्य व्यक्ति के लिए, या किसी समूह या समुदाय के खिलाफ, जिसके परिणामस्वरूप या तो चोट लगने, मृत्यु, मनोवैज्ञानिक क्षति, या हानी की उच्च संभावना होती है” के रूप में परिभाषित करती है। हिंसा की विस्तारित समझ न केवल प्रत्यक्ष व्यावहारिक हिंसा को शामिल करती है बल्कि संरचनात्मक हिंसा को भी शामिल करती है। संरचनात्मक हिंसा अन्यायपूर्ण और असमान सामाजिक और आर्थिक संरचनाओं से उत्पन्न होती है उदाहरण के लिए गरीबी और संसाधनों से वंचित समुदाय।

विश्व में हिंसा

हर साल, दुनिया भर में 16 लाख से अधिक लोग हिंसा के कारण अपनी जान गंवाते हैं। हिंसा के परिणामस्वरूप मरने वाले लोगों के अलावा कई और ऐसे लोग होते हैं जो हिंसा के कारण कई तरह की शारीरिक, यौन, प्रजनन और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित होते हैं। हिंसा किसी भी राष्ट्र के स्वास्थ्य, अर्थव्ययस्था, कानून, उत्पादकता आदि पर भारी बोझ डालती है। हिंसा के संरचनात्मक और सांस्कृतिक रूपों को अक्सर समाज की गहराई में बो दिया जाता है और इस हिंसा को समाज में सहजता से स्वीकृति मिलने लगती है। इस प्रकार की हिंसा लंबे समय तक चलती है, अंततः इसके परिणाम प्रत्यक्ष हिंसा के रूप में सामने आती है। कई मामलों में उत्पीड़ित भी प्रत्यक्ष हिंसा का उपयोग करते हैं। कम शिक्षा के अवसर, कार्य के सिलसिले में अवकाश तक सीमित पहुंच, काम के कुछ क्षेत्रों में हानिकारक काम करने की स्थिति आदि संरचनात्मक और सांस्कृतिक हिंसा के उदाहरण हैं, जिसका लोगों के अधिकारों की पहुंच तक सीधा प्रभाव पड़ता है। फिर भी हिंसा के इन स्वरूपों को शायद ही कभी मानवाधिकारों के उल्लंघन के रूप में पहचाना जाता है।

सैन्य खर्च, हथियारों का व्यापार और हिंसा

हथियारों का उत्पादन और व्यापार निस्संदेह शांति के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक है। हथियारों के उत्पादन और निर्यात को अक्सर आर्थिक आधार पर प्रोत्साहित किया जाता है और इसके कारण शांति और सुरक्षा पर पड़ने वाले प्रभाव पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है। विश्व सैन्य खर्च लगातार बढ़ रहा है, 2014 में दुनिया ने सेना पर अनुमानित 1776 बिलियन यूरो खर्च किया है। ओवरसीज डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट के अनुसार दुनिया भर के सभी गरीब देशों में 32 बिलियन डॉलर प्रति वर्ष में मुफ्त प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा प्रदान की जा सकती है, यह एक सप्ताह के वैश्विक सैन्य खर्च से भी कम है।

आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) का अनुमान है कि सशस्त्र हिंसा से हर साल कम से कम 74 लाख महिलाएं, पुरुष, युवा और बच्चे मारे जाते हैं। हिंसा से प्रभावित लोगों में से अधिकांश गरीबी में रहते हैं। अधिकांश सशस्त्र हत्याएं युद्धों के बाहर होती हैं, हालांकि सशस्त्र संघर्षों में बड़ी संख्या में मौतें होती रहती हैं। इसके अलावा, सशस्त्र हिंसा से बड़ी संख्या में लोग घायल होते हैं और इसके कारण दीर्घकालिक पीड़ा का सामना करते हैं। एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार मानवाधिकारों के लगभग 60 फीसदी उल्लंघन में छोटे हथियारों और हल्के हथियारों का उपयोग शामिल है।

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लिंग आधारित हिंसा

संरचनात्मक और सांस्कृतिक हिंसा में लिंग आधारित हिंसा लगातार होने वाली हिंसा है। यह हर समाज में मौजूद है और इसके परिणाम लगभग सभी मनुष्यों को प्रभावित करते हैं। यूएनएफपीए के अनुसार, लिंग आधारित हिंसा "पुरुषों और महिलाओं दोनों के बीच असमानताओं को दर्शाती है और पीड़ितों के स्वास्थ्य, गरिमा, सुरक्षा और स्वायत्तता से समझौता करती है। इसमें बच्चों के यौन शोषण, बलात्कार, घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न, महिलाओं और लड़कियों की तस्करी और कई हानिकारक पारंपरिक प्रथाओं सहित मानवाधिकारों के उल्लंघन की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल है। इनमें से कोई भी दुर्व्यवहार गहरे मनोवैज्ञानिक निशान छोड़ सकता है, सामान्य रूप से महिलाओं और लड़कियों के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकता है, जिसमें उनका प्रजनन और यौन स्वास्थ्य भी शामिल है, और कुछ मामलों में परिणाम मृत्यु होता है।

लिंग आधारित हिंसा का शारीरिक होना जरूरी नहीं है। वास्तव में कई युवा मौखिक हिंसा का भी शिकार होते हैं, विशेष रूप से एलजीबीटीक्यू समुदाय से आने वाले युवा। संघर्ष की स्थिति में विशेष रूप से महिलाओं के खिलाफ हिंसा का नया रूप सामने आता है। ये सामूहिक बलात्कार से लेकर जबरन यौन उत्पीड़न, जबरन गर्भधारण या यौन दासता तक हो सकते हैं। सशस्त्र संघर्षों के दौरान लैंगिक भूमिकाओं का ध्रुवीकरण बढ़ जाता है, इसके साथ महिलाओं को युद्ध की वस्तुओं और विजय प्राप्त करने वाले क्षेत्रों के रूप में देखा जाता है।

संसाधनों के लिए संघर्ष

पानी, कृषि योग्य भूमि, खनिज तेल, धातु, प्राकृतिक गैस, आदि जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार या नियंत्रण के वर्चस्व ने इतिहास में हिंसक संघर्षों को बढ़ावा दिया है। कुछ संसाधनों की कमी जैसे कि पानी या कृषि योग्य भूमि, आवासीय जमीन, संसाधनों की खपत और जलवायु परिवर्तन में वृद्धि के कारण यह संघर्ष अधिक व्यापक रूप ले लेता है। यह अधिक क्षेत्रीय या अंतर्राष्ट्रीय तनाव पैदा करता है, जिससे संभावित रूप से हिंसक संघर्ष अधिक बढ़ जाते हैं।

विश्व शांति और गांधीवादी संगठन

दुनिया भर में कई जन संगठन अहिंसक समाज के लिए प्रयासरत हैं। 2019 में जब पुरी दुनिया में महात्मा गांधी की 150वीं जयंती मनाई जा रही थी, तब जन संगठनों के साथ-साथ कई सरकारों ने भी गांधीवादी विचारों को बढ़ावा देने की बात की। एकता परिषद जैसे जन संगठन ने विश्व शांति एवं न्याय के लिए ‘‘जय जगत 2020’’ यात्रा शुरू की थी। कोविड-19 की वजह से यह यात्रा भले अधूरी रह गई थी, लेकिन इसने पूरी दुनिया में स्थानीय स्तर पर न्याय और शांति के लिए एक मंच को तैयार किया। अभी पिछले 21 सितंबर से विश्व शांति दिवस से एकता परिषद ने वैश्विक स्तर पर न्याय और शांति को लेकर स्थानीय पदयात्रा की शुरुआत की है, जिसका समापन 2 अक्तूबर को विश्व अहिंसा दिवस पर किया जाएगा। गाँधीवादी विचारक राजगोपाल पी.व्ही. का मानना है कि ऐसी यात्राओं से गांधी के संदेश को जमीनी स्तर तक ले जाने में मदद मिलती है। साथ ही स्थानीय लोगों से संवाद के माध्यम से हिंसा के स्वरूपों के बारे में पता चलता है, जिससे शांति और न्याय के लिए स्थानीय, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हस्तक्षेप करने और रणनीति बनाने में मदद मिलती है।

युद्ध और हिंसा अनिवार्य रूप से मानव अधिकारों के हनन का परिणाम है। शांति की स्थिति प्राप्त करने के लिए मानव अधिकारों की संस्कृति का निर्माण एक पूर्व शर्त है। स्थायी शांति और सुरक्षा तभी प्राप्त की जा सकती है जब सभी मानवाधिकारों को पूरा किया जाए। शांति की संस्कृति का निर्माण और उसे बनाए रखना मानव जाति के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। वैश्विक स्तर पर समाज में शांति के माध्यम से न्याय स्थापित करने का सपना कई जन संगठन और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने देखा है और इसे पूरा करने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं। आज वैश्विक स्तर पर बढ़ रही हिंसा को कम करने के लिए समाज में न्याय और शांति की बात हर तरीके से करने की आवश्यकता है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

Priyam Mishra



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