धर्म भागना नहीं, जागना सिखाता है, राम, कृष्ण और ऋषियों ने रखा कर्म का आदर्श.. दिनेश मालवीय

धर्म भागना नहीं, जागना सिखाता है, राम, कृष्ण और ऋषियों ने रखा कर्म का आदर्श.. दिनेश मालवीय
dineshसनातन धर्म - संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषताओं में एक यह है, कि इसमें जीवन की अवहेलना नहीं की गयी है. भारत में दो सबसे प्रमुख अवतार श्रीराम और श्रीकृष्ण के हुए. दोनों ने अपने जीवन और आचरण से आदर्श प्रस्तुत किया कि जीवन से भागना नहीं, बल्कि जागना है. उन्होंने किसी भी स्तर पर कर्तव्यों और दायित्यों की अवहेलना नहीं की. इसके लिए उन्होंने कर्म को इस तरह करने की की कुशलता का का पाठ पढ़ाया, जिससे कर्मों में अभीमान उत्पन्न नहीं हो.

भगवान श्रीराम के जीवन में बहुत महत्वपूर्ण प्रसंग यह आता है, कि उन्हें सांसारिक कर्मों से वैराग्य हो गया. सारा संसार दुःख रूप और निस्सार महसूस होने लगा. राजकाज और अपने अन्य सभी दायित्वों से वे विमुख हो गये. सदा उदासीन रहने लगे. उनके पिता राजा दशरथ ने उनके मन की स्थिति में सुधार और नकारात्मकता का भाव दूर करने के लिए उन्हें तीर्थाटन पर भेज दिया.

श्रीराम अपने मित्रों के साथ तीर्थाटन करके लौटे, तब भी उनकी दशा में कोई बदलाव नहीं आया. राजा ने अपने गुरु महर्षि वशिष्ठ को सारी बात बताकर उनसे कुछ उपाय करने को कहा. बशिष्ठजी ने श्रीराम को जीवन में कर्म का रहस्य समझाया. उन्होंने श्रीराम को जो उपदेश दिए, वे “योगवाशिष्ठ” नामक ग्रंथ के आकार में उपलब्ध हैं. जीवन में दायित्वों और कर्म के रहस्य को समझने के लिए इस ग्रंथ का अध्ययन बहुत सहायक है. इस ग्रंथ में कर्म और ज्ञान को मनुष्य रुपी पक्षी के दो पंख बताया गया है.

Ramayana 1

श्रीकृष्ण अवतार में भगवान् ने अर्जुन को माध्यम बनाकर “श्रीमदभगवतगीता” के रूप में कर्म का आदर्श समझाया. अर्जुन ने महाभारत युद्ध शुरू होने से पहले जब अपने भाई-बंधुओं और अन्य नातेदारों को युद्ध के लिए तत्पर देखा, तो उसे गहरा विषाद हुआ. वह युद्ध से विमुख हो जाना चाहता था. उसने तो यह तक कहा कि युद्ध में अपने सगे-संबंधियों को मारने की अपेक्षा वह भीख माँगकर खाना पसंद करेगा. भगवान् ने अर्जुन को जीवन और कर्म के सभी लौकिक और आध्यात्मिक पक्षों को बहुत सटीक तरीके से इस तरह समझाया कि अर्जुन युद्ध के लिए तत्पर हो गया.


LordKrishna

इस सन्दर्भ में पुराणों में वर्णित राजा प्रियव्रत की कथा भी बहुत महत्वपूर्ण है. प्रियव्रत मनु के बड़े बेटे थे. लेकिन उन्हें राजकाज में कोई दिलचस्पी नहीं थी. उन्होंने उत्तानपाद को  राजा बनाया और तपस्या करने वन में चले गये. उत्तानपाद के वंशजों द्वारा बहुत लम्बे समय तक शासन करने के बाद ऐसा समय आया कि राज्य राजा से विहीन हो गया. मनु ने तपस्या में रत अपने बड़े बेटे प्रियव्रत से संन्यास छोड़कर राजकाज सम्हालने का आग्रह किया. लेकिन प्रियव्रत नहीं माने.

मनु ने अपने पिता ब्रह्माजी से प्रियव्रत को समझाने के लिए कहा. ब्रहमाजी ने प्रियव्रत को समझाया कि जिस प्राणी को भी जीवन प्राप्त होता है, उसी समय उसके लिए कुछ कर्म निर्धारित किये जाते हैं. इन कर्तव्यों का हर स्थिति में निर्वाह करना चाहिए. उन्होंने कहा कि तुम्हें पसंद हो या नहीं, लेकिन जिस पृथ्वी पर तुमने जन्म लिया है, उसकी रक्षा करना तुम्हारा कर्तव्य है. तुम अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए भी मोक्ष प्राप्त कर सकते हो. इसके लिए घर-परिवार और कर्मों का त्याग अनिवार्य नहीं है. प्रियव्रत ने वन से लौटकर राजकाज सम्हाल लिया. उनका विवाह विश्वकर्मा की पुत्री बहिर्मती के साथ हुआ. प्रियव्रत को एक पुत्री और दस पुत्र हुये उन्होंने कई वर्षों तक शासन किया. अपने  सारे कर्तव्य पूरे करने के बाद प्रियव्रत अपने गुरु केसे परामर्श लेकर फिर तप करने चले गये.


सन्यास और उसके प्रकार


इसी तरह के अनेक दृष्टांत हमारे ग्रंथों  में भरे पड़े हैं. संन्यास का भी जीवन में अपना महत्त्व है. सनातन जीवन-दर्शन में जीवन को चारा आश्रमों अथवा जीवन की अवस्थाओं में बाँटा गया है- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास. संन्यास जीवन का अंतिम चरण है. हालाकि अपवाद स्वरूप किसीको बहुत गहरा वैराग्य हो जाने पर उसे सन्यास की अनुमति है. लेकिन ऐसा बहुत कम होता है. हमारे अधिकांश ऋषि-मुनि गृहस्थ रहे.

हमारे शास्त्रों में सन्यास के दो प्रकार बताये गये हैं - विद्वत संन्यास और विद्विशा संन्यास. विद्वत सन्यास में ऐसा होता है कि व्यक्ति को जब लगता है कि जीवन में अब कुछ भी पाना और जानना शेष नहीं रहा, लिहाजा मैं सन्यास लेता हूँ. विद्विशा संन्यास का मकसद जीवन का अंतिम तत्व प्राप्त करना होता है. व्यक्ति में मन में यह निश्चय हो  जाता है कि दुनिया दुखों का ही घर है. इसलिए इसके सुख प्राप्त करने में उसकी कोई रूचि नहीं होती. वह संन्यास लेकर अपना शेष जीवन जीवन के अंतिम तत्व की अनुभूति में लगा देता है.


नकली संन्यास


जीवन और कर्म के रहस्य को नहीं समझकर सिर्फ अज्ञान या परिस्थितिवश जो संन्यास लिया जाता है, वह नकली संन्यास की श्रेणी में आता है. तुलसीदास ने लिखा है कि-“नारि मुई गृह सम्पत्ति नासी, मूढ़ मुड़ाई होई सन्यासी”. यानी पत्नी मर जाने या गृह-सम्पत्ति का नाश हो जाने पर सिर मुंडाकर लोग सन्यासी हो जाते हैं. ऐसे लोगों का उद्देश्य जीवन के अंतिम तत्व या ईश्वर को प्राप्त करना नहीं होकर, सिर्फ ढोंग करके संसार को ठगना होता है.


गृहस्थ सन्यासी


भगवान् ने बताया है कि मनुष्य अपने कर्तव्य कर्मों को स्वरूप से नहीं त्यागकर उनमें कर्ताभाव नहीं रखकर किस तरह कर्म करते हुए भी सन्यासी की तरह जीवन जी सकता है. उन्होंने कर्मों को स्वरूप से त्यागने का विरोध किया है.

इस तरह हम देखते हैं कि सम्पूर्ण सनातन ग्रंथों में जीवन की कहीं अवहेलना नहीं की गयी है. जीवन को उसकी पूर्णता में जीते हुए मोक्ष का मार्ग दिखाया गया है. दुर्भाग्य से हमारे देश में एक ऐसा समय भी आया, जब लाखों की संख्या में लोग घर छोड़कर भिक्षुक बन गये. इसके बहुत दुष्परिणाम हुए. सामाजिक-आर्थिक तानाबाना बिखर गया. इसके दुष्परिणाम हज़ारों साल बाद आज भी “सन्यास” की गलत धारणा के रूप में दिखाई देते हैं. 

सनातन धर्म जीवन से भागना नहीं, जागना सिखाता है. जागने से तात्पर्य यही है कि व्यक्ति यह नहीं माने कि मैं कुछ कर रहा हूँ. अपने कर्मों को पूरी निष्ठा से करे, लेकिन उन्हें ईश्वर को समर्पित कर दे. यही जीवन को परिपूर्णता में जीने का रहस्य और मंत्र है.


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