हमारा वर्ण, गोत्र और जाति क्या है?

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हमारा वर्ण, गौत्र और जाति क्या है ?

विवाह के उपरांत जैसे पत्नी का गौत्र, वर्ण और जाति वही हो जाती है जो उसके पति की है; वैसे ही परमात्मा को समर्पित होते ही हमारी भी जाति “अच्युत” यानी वही हो जाती है जो परमात्मा की है| जाति, वर्ण आदि तो शरीर के होते हैं, आत्मा के नहीं| हम तो शाश्वत आत्मा हैं, यह देह नहीं; अतः आत्मा की चेतना जागृत होते ही हमारी न तो कोई जाति है, न कोई वर्ण और न कोई गौत्र| उस चेतना में हम शिव हैं, यह शरीर नहीं|
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“जाति हमारी ब्रह्म है, माता-पिता हैं राम|
गृह हमारा शुन्य में, अनहद में विश्राम||”

ब्रह्म यानि परमात्मा के सिवाय हमारी अन्य कोई जाति नहीं हो सकती| परमात्मा के सिवा न हमारी कोई माता है और न हमारा कोई पिता| शुन्य यानि परमात्मा की अनंतता ही हमारा घर है और ओंकार रूपी अनहद की ध्वनि का निरंतर श्रवण ही हमारा विश्राम है|
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वास्तव में यह सारा ब्रह्मांड ही हमारा घर है, और यह समस्त सृष्टि ही हमारा परिवार जिसके कल्याण के लिए हम निरंतर श्रम करते हैं| भगवान परमशिव ही हमारी गति हैं, और वे ही हमारे सर्वस्व हैं| हमारा उनसे पृथक होने का आभास एक मिथ्या भ्रम मात्र है, वे ही एकमात्र सत्य हैं| हम स्वयं को अब और सीमित नहीं कर सकते| हमारा एकमात्र सम्बन्ध भी सिर्फ और सिर्फ परमात्मा से ही है|
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इस दैहिक सांसारिक चेतना से ऊपर उठकर ही हम कोई वास्तविक कल्याण का कार्य कर सकते हैं| हमारे लिए सबसे बड़ी सेवा और सबसे बड़ा यानी प्रथम अंतिम व एकमात्र कर्त्तव्य है …. परमात्मा को उपलब्ध होना| बाकी सब भटकाव है|
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रात्री को सोने से पूर्व भगवान का गहनतम ध्यान कर के सोएँ| सोएँ इस तरह जैसे जगन्माता की गोद में निश्चिन्त होकर सो रहे हो| प्रातः उठते ही एक गहरा प्राणायाम कर के कुछ समय के लिए भगवान का ध्यान करें| दिवस का प्रारम्भ सदा भगवान के ध्यान से होना चाहिए| दिन में जब भी समय मिले भगवान का फिर ध्यान करें| उनकी स्मृति निरंतर बनी रहे| यह शरीर चाहे टूट कर नष्ट हो जाए, पर परमात्मा की स्मृति कभी न छूटे।

Pradeep Yogi Pathak


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