ऋषि परम्परा- 3

ऋषि ऋभु

-दिनेश मालवीय

इस महान ऋषि का नाम बहुत अल्पज्ञात है, लेकिन इससे इनकी महानता कम नहीं होती. यह परमहंस कोटि के ऐसे महात्मा थे, जो हमेशा सहज स्थिति में रहते है. वह मल, विक्षेप था आवरण से पूरी तरह रहित होकर जहाँ-कहीं भी पड़े रहते थे. शरीर के अतिरिक्त इनकी कोई कुटिया अथवा आश्रम नहीं था.

एक दिन ऐसे ही विचरते हुए यह महर्षि पुलस्त्य ऋषि के आश्रम के पास पहुँच गये. वहाँ पुलस्त्य के पुत्र निदाघ वेदाध्ययन कर रहे थे. उन्हें देखकर निदाध ने आगे आकर उनका अभिवादन किया. महर्षि ऋभु सोचने लगे कि इस जीवन का वास्तविक लाभ आत्मज्ञान है. यदि वेदों को पूरी तरह रट लिए जाए और वस्तुतत्व का ज्ञान न हो तो वह किस काम का? उन्होंने कहा कि निदाध ! तुम आत्मज्ञान का सम्पादन करो.

महर्षि की बात सुनकर उसके मन में जिज्ञासा जाग गयी. उसने इनकी शरण ली और अपने पिता का आश्रम छोड़कर इनके साथ भ्रमण करने लगा. उसकी निष्ठा और जिज्ञासा को देखकर उन्होंने उसे तत्वज्ञान का उपदेश दिया. उन्होंने उसे गृहस्थ धर्म में प्रवेश कर साधना का आदेश दिया.

निदाध पिता के पास लौट आया और उसका विवाह कर दिया गया. उसने देविका नदी के तट पर अपना आश्रम बनाया और वहाँ पत्नी के साथ रहकर साधना करने लगा. बहुत दिनों बाद ऋभु को उसकी याद आगयी और वे उसके पास पहुँच गये. निदाध उन्हें पहचान नहीं पाया. लेकिन उसने उनका पूरा आदर सत्कार कर उन्हें प्रेम से भोजन कराया, फिर उसने उनसे पूछा कि क्या आप भोजन से तृप्त हो गये? आप कहाँ रहते हैं? किधर पधारने की इच्छा है. 

ऋभु ने कहा कि-

“ब्राह्मण! भूख और प्यास प्राणों को ही लगती है. मैं प्राण नहीं हूँ. जब भूख-प्यास मुझे लगती ही नहीं तब तृप्ति-अतृप्ति का सवाल ही नहीं है. यह सब मन के धर्म है. आत्मा इनसे पृथक है. रहने और आने-जाने के बारे में उन्होंने कहा कि आकाश की भांति आत्मा सर्वगत है. उसका आना-जाना नहीं होता. मैं न आता हूँ, न जाता हूँ और न किसी स्थान पर रहता ही हूँ. निदाध ये गूढ़ तत्व की बातें सुनकर उनके चरणों में गिर गया. उन्होंने बताया कि मैं ही तुम्हारा गुरु हूँ. इसके बाद महर्षि चले गये.

बहुत दिनों बाद फिर महर्षि अपने शिष्य के आश्रम में आये. संयोगवश उस दिन राजा की सवारी निकल रही थी. सड़क पर बहुत भीड़ थी. निदाध एक ओर खड़ा होकर भीड़ हटने की प्रतीक्षा करने लगा. इतने में ही गुरु ने पास आकर पूछा-“ यह
भीड़ कैसी है?”

निदाध ने बताया कि राजा की सवारी निकल रही है. गुरु ने पूछा कि इनमें राजा कौन है और दूसरे लोग कौन हैं? निदाध ने कहा –“ जो इस पर्वत के समान ऊंचे हाथी पर सवार है, वह राजा है. उसके अलावा दूसरे सभी लोग हैं. ऋषि ने पूछा-“ मुझे हाथी और राजा का ऐसा लक्षण बताओ कि मैं समझ सकूँ कि ऊपर कौन है? नीचे क्या है?”

यह प्रश्न सुनकर निदाध उनपर सवार हो गया और बोला-“ देखो, मैं राजा की भांति ऊपर हूँ. आप हाथी के समान नीचे हो. अब समझ जाओ कि राजा और हाथी कौन है.” महर्षि ने बहुत शांति के साथ कहा -“यदि तुम राजा और मैं हाथी की भांति स्थित हूँ तो बताओ तुम कौन हो और मैं कौन हूँ? यह बात सुनते ही वह गुरु के चरणों में गिर गया और बोला-“ आपके सामान अद्वैतसंस्कार-संस्कृत चित्त और किसीका नहीं है. आप अवश्य मेरे गुरुदेव हैं.मैं ने अनजाने में बड़ा अपराध किया.

ऋषि ने कहा कि कौन किसका अपराध करता है? यदि एक वृक्ष की दो शाखाएं परस्पर रगड़ खायें तो उनमें किसका अपराध है? मैंने तुम्हे पहले व्यतिरेक मार्ग से आत्मा का उपदेश दिया था. उसे तुम भूल गये. अब अन्वय मार्ग से किया है. यदि इन दोनों मार्गों पर विचार करोगे तो संसार में रहकर तुम इससे अलिप्त रहोगे. ऐसा कह कर ऋषि चले गये.

ऋषि की क्षमाशीलता देखकर सनकादि गुरुओं को बहुत आश्चर्य हुआ. उन्होंने ब्रम्हा के सामने इनकी महिमा गायी और इनका नाम क्षमा का अक्षर लेकर ऋभुक्ष रख दिया. तब से सभी सम्प्रदायों के लोग इन्हें ऋभुक्षानंद के नाम से याद करते हैं. उनकी कृपा से निदाध आत्मनिष्ठ हो गया. आज भी महर्षि हमारे पास न जाने किस रूप में आए होंगे. वह आज भी सच्चे साधकों का मार्गदर्शन करते हैं.


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