मन को विषय वासनाओं से बचाये रखने के लिए सत्संग बोहत ज़रूरी है । – कबीर

मन को विषय वासनाओं से बचाये रखने के लिए सत्संग बोहत ज़रूरी है ।


नित खरसान लोहाघुन छूटे, नित की गोष्ट माया मोह टूटे ।
जैसे लोहे के औजार में हवा और पानी के संयोग से जंग लग जाता है परन्तु उसे मांजते रहो तोह जंग छूटता रहता है और औजार चमकता रहता है । वैसे ही हमारे मन की दशा है । पूर्व वासनाएँ, मन इंद्रिय, विषय विकारों, प्राणी तथा नाना व्यवहार के संबंध में मनुष्य के मन में मलिनता आने की संभावना बनी रहती है । इनसे साधक तभी बचा रह सकता है जब वह निरन्तर साधु संतों सज्जनों की संगत करे और उनसे स्वरूप ज्ञान, सदाचार और सद्गुणों की चर्चा करता व सुनता रहे । संत सज्जनों के उत्तम आदर्श देखने व उनकी वाणियों को सुनकर उनका मनन करने से साधक का मन शुद्ध बना रहता है ।

गृहस्थ भक्तों से कहा जाता है कि वह प्रतिदिन अपने घर में अपने पूज्य सन्तों के ज्ञान उपदेश की वार्ता एवं सत्संग करते रहें । इन बातों का रोज़ रोज़ उनके मन पर प्रभाव पड़ेगा । परन्तु बोहत कम ही साधक ऐसा करते हैं । हर गृहस्थ को अपने घर में नित्य एक समय सत्संग का आयोजन करना चाहिए और पूरे परिवार को इसका लाभ लेना चाहिए अगर आस पड़ोस के लोग भी इसमें शामिल हों तोह और भी अच्छा है । फिर गांव या मोहल्ले में भी सत्संग का आयोजन होना चाहिए चाहे सप्ताह में एक बार ही हो । पूरा परिवार जब एक साथ बैठ कर सत्संग विचार करता है तो उनमें आपसी प्रेम बनता है उनके व्यवहार में अगर कोई विकार आया हो तोह वह धुल जाता है । नित्य के सत्संग से मन की मलिनता का नाश होता रहता है । अगर सत्संग न किया जाए तो संसार मे चल रहे माहौल से मन में मलिनता नहीं आएगी तोह क्या आएगा ।
गृहस्थ तोह गृहस्थ ही है किंतु बोहत से साधुओं के आश्रम आदि में भी नित्य सत्संग नहीं होता है । उनका आश्रम मठ कमाने खाने का साधन मात्र बनके रह जाता है । सत्संग के बिना साधु अपने साधना मार्ग से शिथिल हो जाते हैं । उनसे समाज को कोई प्रेरणा नहीं मिलेगी । हम नित्य घर आंगन को साफ करते हैं अगर नहीं करेंगे तोह घर कचरे का ढेर बन जाएगा । इसी प्रकार सत्संग के बिना हमारे मन में मलिनता आ जाएगी ।

राम और माया में से माया का मोह तोह अनादि है और आज भी मनुष्य के अंदर व बाहर धूं धूं कर गुज़र रहा है । परन्तु राम का परिचय व उससे अनुराग दुर्लभ वस्तु है । राम से परिचय व अनुराग तोह सत्संग के माध्यम से ही हो सकता है । साधु सज्जनों के ज्ञान का मनन करने से ही हो सकता है । सत्संग के बिना मन में केवल माया का वास रहेगा राम का नहीं । जो नित्य राम को याद करेगा उसका मन राम में रमा रहेगा और मन शुद्ध व शांत रहेगा । जो माया का मनन करेगा उसका मन मलिनता से ही भरा रहेगा व शान्त रहेगा । जो नित्य सत्संग करके उसको जीवन में उतारेगा वही जीवन में सुखी रहेगा व अंत में अपने निज राम स्वरूप में ही स्थित हो सकेगा ।


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