ब्रह्माँड के रहस्य- 60, यज्ञ विधि.. सोम- 4

सोमरस की फैक्टरी दिखाते हैं..!
ब्रह्माँड के रहस्य -60 यज्ञ विधि,सोम -4
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रमेश तिवारी
हम सोमयाग की प्रक्रियायें,तो आगे पीछे देख ही लेंगे। समझ भी लेंगे। किंतु क्यों न इन सब से पहले उस फैक्टरी को भी तो चल कर देख लें। जहांँ कि सोमरस बनाया जाता था...!

कैसी होती थी सोमरस बनाने की फैक्टरी। कौन से उपकरणों से सोम वल्लियों का रस निकाला जाता था। क्या इस अमृत पेय में अन्य कोई और चीजें भी मिलाई जातीं थी। कैसा होता था स्वाद। चल कर देखना चाहेंगे। अरे ...प्राकृतिक सौन्दर्य के मध्य कितने सुंदर समूह हैं,

साधारण किंतु सुन्दर पर्णकुटियों के। समीप ही निर्झरणी। कल कल कर बहता, निर्मल जल। गौशालायें। फल और फूलों की उद्यानिकी भी तो हैं।

यह क्या ..! ये कूटने की आवाज कैसी..? एक नहीं, अनेक आवाजें आ रहीं हैं। हम मनुष्य सोमरस को निसपन्न करने के उन प्राचीन दृश्यों को कैसे देख सकते हैं..! देख तो सकते हैं किंतु हमको वेदों की शरण में जाना पडे़गा।


क्या कोई असाधारण गतिविधि हो रही है,वहाँ। कोई फैक्टरी है क्या । तो फिर..! चलो चलते हैं आदि ग्रंथ,वेद भगवान (ऋग्वेद) यजुर्वेद और सामवेद की शरण में ।इन तीनों में ही सोम के सम्मान की ऋचायें हैं।

वेद भगवान की ऋचाओं में वर्णन है कि सोम (भगवान) लताओं से निस्रुत रस प्राप्त कर उसको कैसे पीने योग्य बनाया जाता था। देखते हैं -दृश्य -साइफन जैसे कितने ही उपकरण लगे हैं। इन सब में प्रत्येक स्तर पर ऊन की मजबूत छलनियांँ भी तो लगी दिखाई दे रहीं हैं। और अवर्णनीय आनंद देने वाले सोमरस को साइफन की सबसे ऊपर वाली छलनी में उंडेला जा रहा है। सोमरस के थूथडे़ बहोरे जा रहे हैंं। मृदा (मिट्टी) कलश रखे हैं।

दृश्य -पास ही में सोमवल्ली का स्टाक (भंडार) भी । कितनी स्वच्छता पूर्वक उन लताओं को निर्मल और पवित्र सरिताओं के जल से धोया जा रहा है। समीप ही बहुत से गावा (रस कूटने के पत्थर) भी तो रखे हैं। ऋषि और देवगण (भुवन त्रिलोकी की देव जाति के मनुष्य) स्वच्छ और चमकती लताओं को कूट रहे हैं। गावाओं से रस निकाला जा रहा है। थूथडे़ अलग कर, बहुत ही सम्मान और सावधानी से रस को द्रोण पात्रों में भरा जा रहा है।

दृश्य - अरे यह सुकार्य करने वाले, ये सब कौन हैं। हां, रस निष्पादन करने वाले निश्चित और प्रशिक्षित ऋषिगण हैं जिनकी की देखरेख में द्रोण पात्रों में रखा प्राणरस (सोम) अन्य छोटे द्रोण पात्रों से साइफनों तक पहुंघाया जा रहा है। छानने के लिए। बहुत से प्रशिक्षित सोम कर्मी छन्नियों से छने हुए इस हरित और बभ्रू (हरे और भूरे) रस को अन्य विशेष, द्रोण पात्रों में संरक्षित कर रहे हैं।

दृश्य -पवित्र और पूजनीय सोम के इस अमृतमयी रस को वीर्यवान और अधिक स्वादिष्ट बनाने का दल अलग है। वह अभी अपना कार्य प्रारंभ करने ही वाला है। तब तक हम सभी ओर अपनी दृष्टि दौडा़ लेते हैं।

सोमरस निर्माता फेक्टरी में आखिर और क्या ,क्या रखा है ।

दृश्य- उस ओर चलते हैं...! जहां और भी बहुत से द्रोण पात्र रखे हैं। कवर्ड (ढंके हुए )। इनमें हल्के से छिद्र हैं,वायु प्रवेश के। आह..! स्वर्ग लोक (बर्फीले पर्वत क्षेत्रों) की सुरभित सोम (आक्सीजन, पवमान वायु) बह रही है। कितना मनोरम है, यहां का वातावरण..!

मनमोहक,मधुर और अनुपम। रखा क्या है..? इन द्रोण पात्रों में। एक एक पात्र के ढक्कन उठा कर न देखलें। जी, अवश्य ही देखेंगे।

दृश्य -अरे वाह,एक पात्र में गाय का दुग्ध भरा हुआ है। और दूसरे पात्र में गाय का सुगंधित घृत भी तो है। अति शुद्ध और महकता। समीप के पात्र का ढक्कन भी उठाते हैं..! इस पात्र में सारघमधु (शहद) भरा है। अभी तो और भी पात्र हैं..! पहले सब पात्र तो देखलें, फिर पता करते हैं कि यह सब पदार्थ क्यों रखे हैं।

दृश्य -समीप के पात्र में गौदधि भरा है। स्वच्छ और चमकता। स्निग्ध (चिकना)। एक और पात्र को भी देखें...! कौतूहल बढ़ता ही जा रहा है। इस पात्र में तो यव हैं। साफ स्वच्छ। बिने हुए। नुके हुए। यहां तो भूसी भी पडी़ है। यवों को साफ किया गया होगा। किंतु यहां यव क्यों..? यहां यवों (जौं) का क्या काम ...! विचित्र वस्तुयें। अलौकिक पदार्थ। सोमरस निर्माता फेक्टरी में संग्रहीत अन्य पात्रों को देखने की उत्कंठा बढ़ती ही जा रही हैं।

दृश्य -अन्य पात्रों में भी कुछ है..! लगता तो है कि अभी । कुछ न कुछ तो होगा इनमें भी। पात्र तो रखे हैं। बहुत से। अब जब अगला पात्र देखा -तो...! तो क्या..! कितनी सुगंध महक रही है -अरे इसमें तो सत्तू है। भुने अनाज का सिका हुआ। महीन। आश्चर्य हो रहा है। देखकर। पात्र तो और भी हैं अभी । इनमें भी इसी प्रकार के सत्तू रखे हैं। विभिन्न अन्नों के..!

मित्रों सोम फैक्टरी के इन अनुपम दृश्यों को आज यहीं विराम देते हैं। सोम बनाने और उसके गुणकारी प्रभावों तथा और अधिक प्रक्रियाओं पर आगे प्रकाश डालेंगे। तो मिलते हैं कल रात्रि में। इसी समय। तब तक विदा। शेयर करेंगे न। आप सनातन विज्ञान का पोषण करना घाहते हैं,तो

धन्यवाद

Priyam Mishra



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