शिव पुराण संक्षेप -दिनेश मालवीय

शिव पुराण संक्षेप

-दिनेश मालवीय

शैवमत का यह सबसे प्रतिष्ठित ग्रंथ है. इसमें मुख्य रूप से शिव-भक्ति और शिव महिमा का गुणगान किया गया है. शिव पुराण में उनके जीवन चरित्र पर प्रकाश डालते हुए उनके रहन-सहन, विवाह और उनके पुत्रों के जन्म के विषय में विस्तार से बताया गया है. इसके अनुसार शिवजी सदैव लोकोपकारी और सभी का हित करने वाले हैं. वह त्रिदेवों में शामिल हैं. दूसरे देवताओं की तुलना में उनकी उपासना करना बहुत सरल है. वह जल, विल्ब पत्र और धतूरा आदि अर्पित करने से ही प्रसन्न हो जाते हैं.



शिव परम वैराग्यवान हैं और उनका स्वरूप भी बहुत विचित्र है. वह औघड़ हैं, जटाजूट धारण करते हैं, उनके गले में भयंकर विषधर लिपटे रहते हैं, रूद्र की मालाएं, वाघम्बर धारण करते हैं और चिता की भस्म शरीर पर लपेटे रहते हैं. उनके हाथ में त्रिशूल और डमरू हैं. जब वह प्रसन्नता में नृत्य करते हैं तो उनका स्वरूप नटराज का होता है और जब विध्वंसक नृत्य करते हैं तो वह तांडव हो जाता है. उनके शीश पर गंगा और चन्द्रमा हैं. लोकोपकार के लिए उन्होंने कालकूट विष का पान कर लिया.

ऐसे महान परोपकारी महादेव के चरित्र वर्णन के लिए ही शिव पुराण की रचना की गयी. यह भक्ति से परिपूर्ण ग्रंथ है. इसमें कलियुग के पापों से ग्रसित व्यक्ति को मुक्ति के लिए शिव-भक्ति का मार्ग दिखलाया गया है.

इस पुराण में आठ संहिताएँ हैं- विद्येश्वर संहिता, रूद्र संहिता, शतरुद्र संहिता, कोटिरूद्र संहिता, उमा संहिता, कैलाश संहिता, वायु संहिता (पूर्व भाग) और वायु संहिता (उत्तर भाग).

विद्येश्वर संहिता में शिवरात्रि व्रत, पंचकृत्य, ओंकार का महत्त्व, शिवलिंग की पूजा और दान का महत्व बताया गया है. शिव की भस्म और रुद्राक्ष की महत्ता प्रतिपादित की गयी है. इसके अनुसार रुद्राक्ष जितना छोटा होता है, उतना ही फलदायक होता है. खंडित रुद्राक्ष, कीड़ों द्वारा हुया हुआ या गोलाई रहित रुद्राक्ष कभी धारण नहीं करना चाहिए. सबसे अच्छा रुद्राक्ष वह है, जिसमें स्वयं छेद होता है. इसमें शिक्षा दी गयी है कि अर्जित धन में से एक भाग धन वृद्धि में लगाना चाहिए, एक भाग उपभोग में और एक भाग धर्म-कर्म में व्यय करना चाहिए. क्रोध से बचने का उपदेश भी इसमें दिया गया है.

रूद्र संहितामें शिव का जीवन-चरित्र वर्णित है. इसमें नारद के मोह, सती द्वारा दक्ष के यज्ञ में देह त्याग, पार्वती विवाह, कामदेव के दहन, कार्तिकेय अरु गणेश के जन्म, पृथ्वी परिक्रमा, शंखचूड़ से युद्ध आदि का विस्तार से वर्णन है. इसमें बताया गया है कि शिव पूजन में दूध, दही, मधु, घृत और गन्ने के रस से स्नान करके चम्पक, पाटल, कनेर, मल्लिका और कमल के पुष्प अर्पित किये जाने चाहिए. धूप, दीप , नैवेध्य अरु ताम्बूल अर्पित करने से वह प्रसन्न होते हैं. 

इसी संहिता में ‘श्रृष्टि खण्ड के अंतर्गत जगत का आदि कारण शिव को माना गया है. उनसे ही आद्या शक्ति ‘माया’ काआविर्भाव होता है. फिर शिव से ही ‘ब्रह्मा’ और ‘विष्णु’ की उत्पत्ति बतायी गयी है.

शतरुद्र संहिता में शिव के चत्रितों- हनुमान, श्वेत मुख और ऋषभदेव का वर्णन है. उन्हें शिव का अवतार कहा गया है. शिव की आठ मूर्तियाँ भी बतायी गयी हैं. इनमें भूमि, जल, अग्नि, पवन, अन्तरिक्ष, क्षेत्रज्ञ, सूर्य और चन्द्र अधिष्ठित हैं. इस संहिता में शिव के ‘अर्धनारीश्वर’ रूप को धारण करने की कथा बतायी गयी है.

कोटिरूद्र संहितामें शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों का वर्णन है. ये हैं- सौराष्ट्र में सोमनाथ, श्रीशैल में मल्लिकार्जुन, उज्जैन में महाकालेश्वर, ओंकारेश्वर में ममलेश्वर, हिमालय में केदारनाथ, डाकिनी में भीमेश्वर, काशी में विश्वनाथ, गोमती तट पर त्र्यम्बकेश्वर, चिताभूमि में वैद्यनाथ, सेतुबंध में रामेश्वरम, दारुक वन में नागेश्वर और शिवालय में घुश्मेश्वर. इसी संहिता में विष्णु द्वारा शिव के सहस्त्र नामों का वर्णन है. साथ ही शिवरात्रि व्रत के महात्मय के सन्दर्भ में व्याघ्र और सत्यवादी मृग परिवार की कथा है.

उमासंहिता में शिव के लिए तप, दान और ज्ञान का महत्त्व बताया गया है. अगर निष्काम भाव से तप किया जाए तो उसकी महिमा स्वयं प्रकट हो जाती है. अज्ञान के नाश से सिद्धि प्राप्त होती है. शिव पुराण का अध्ययन करने से अज्ञान नष्ट हो जाता है. इस संहिता में विभिन्न प्रकार के पापों का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि कौन सा पाप करने से कौन सा नरक प्राप्त होता है. पाप के प्रायश्चित के उपाय भी बताये गये हैं.

कैलाश संहिता के पूर्व और उत्तर भाग में पाशुपत विज्ञान, मोक्ष के लिए शिव ज्ञान की प्रधानता, हवन, योग और शिव-ध्यान का महत्त्व समझाया गया है. शिव को ही चराचर जगत का एकमात्र देवता बताया गया है. उनके ‘निर्गुण’ और ‘सगुण’ रूप का विवेचन करते हुए उन्हें एक ही बताया गया है. लोक कल्याण के लिए वह सगुण रूप धारण करते हैं. जिस प्रकार ‘अग्नितत्व’ और ‘जल तत्व’ को किसी रूप विशेष में रखकर लाया जाता है, उसी प्रकार शिव अपना कल्याणकारी स्वरूप साकार मूर्ति के रूपमें प्रकट करके पीड़ित व्यक्ति को दर्शन देते हैं.


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