भोपाल : 15 नवंबर 1964- लक्ष्मीनारायण के जयकारों से गूंजा आसमान – बिरला मंदिर की स्थापना का ऐतिहासिक क्षण:Birla Mandir Bhopal

भोपाल : 15 नवंबर 1964- लक्ष्मीनारायण के जयकारों से गूंजा आसमान – बिरला मंदिर की स्थापना का ऐतिहासिक क्षण: Birla Mandir Bhopal
भोपाल का बिरला मंदिर अपने आप में अनूठा है , श्रद्धा और भक्ति का केंद्र है ये मंदिर | आइए जानते हैं इस मंदिर की स्थापना से जुड़े कुछ रोचक तथ्य |

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अरेरा पहाड़ी पर स्थित लक्ष्मीनारायण मंदिर या बिडला मंदिर भोपाल रेलले स्टेशन और भोपाल के किसी भी हिस्से से साफ़ दिखाई देता था. यह भोपाल की स्काईलाइन हुआ करता था. लेकिन यह तब की बात है जब भोपाल कंक्रीट के जंगल जैसा नहीं बना था. बिडला मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है. यहाँ से भोपाल का विहंगम दृश्य दिखाई देता है. मंदिर की बनवाट और इसमें प्रतिष्ठित मूर्तियाँ इतनी मनोहारी हैं कि देखने वालों की नज़र इन पर से नहीं हटती.

भोपाल शहर के दक्षिणी क्षितिज पर, विधायक विश्राम गृह के ऊपर दिखाई देने वाले पाँच-मंजिले मंत्रालय भवन के पास स्थित यह मंदिर मंदिर लक्ष्मीनारायण को समर्पित है. बहरहाल इसमें शिव, देवी दुर्गा और हनुमान मंदिर भी हैं. गर्भगृह में देवी लक्ष्मी और भगवान श्री नारायण की संगमरमर की सुंदर प्रतिभाएं प्रतिष्ठित हैं। मंदिर का निर्माण गंगा प्रसाद बिड़ला के संरक्षण में हिन्दुस्तान चेरिटी ट्रस्ट के हुआ था.मंदिर परियोजना के लिए अधिगृहीत की गयी 5.78 एकड़ भूमि में से, मंदिर का विस्तार 1.75 एकड़ में है। मंदिर का रूपांकन बिडला के हेड मिस्त्री  जयपुर के प्रसिद्ध राजगीर शालिग्राम ने किया.मंदिर निर्माण के बाद मुख्यमंत्री द्वारिकाप्रसाद मिश्र ने अरेरा पहाड़ी का नाम बदल कर ""लक्ष्मी नारायण गिरी'' कर दिया गया। हालाकि अब भी इसे आमतौर पर अरेरा हिल्स ही कहा जाता है.



प्राण प्रतिष्ठा समारोह

इस भव्य मंदिर में 15 नवंबर 1964 को सम्पन्न प्राण प्रतिष्ठा समारोह बहुत ऐतिहासिक था. शंखनाद, घंटियों की मधुर ध्वनियों तथा वैदिक मंत्रोच्चार के बीच, तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री डी.पी. मिश्रा ने लक्ष्मीनारायण प्रतिभाओं की वैदिका के नीचे से सोने की पिन हटाकर इस मंदिर को जनसामान्य के दर्शन के लिए खोला। यह देवोत्थान एकादशी का दिन था, जब देवता चार माह कि नींद से उठते हैं.

हजारों कंठ ""जय लक्ष्मीनारायण'' का गगनभेदी उद्घोष कर उठे. विमान से मंदिर पर पुष्प वर्षा हुयी। इस अनुष्ठान के मुख्य पुरोहित प्रसिद्ध ज्योतिष एवं साहित्यकार, स्वर्गीय पंडित सूर्यनारायण व्यास, उज्जैन थे।

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मंदिर के द्वार खुलते ही  जनता उत्साह से भरी भीड़ मंदिर के द्वार पर टूट पड़ी। पुलिस को भीड़ पर नियंत्रण के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी। इस मंदिर में द्वार मंडप, मंडप, महामंडप, प्रांगण तथा गर्भगृह हैं, जिनके परिक्रमा पथ है। शीर्ष पर शिखर है। गर्भगृह में लक्ष्मी और नारायण की मुद्रा में कड़ी प्रतिमाओं कि भव्यता और मोहक मुस्कान बहुत अद्भुत है।

मंडप में दोनों ओर छोटे मंदिर बने हैं। पिछले कोनों में भगवान शिव और सिंहवाहिनी दुर्गा की प्रतिमाएं विराजमान हैं। अंतराल की दीवारों तथा स्तंभों पर आधारित मंडप पर वेदों, रामायण, महाभारत, पुराणों तथा अन्य विभिन्न धर्मग्रंथों के अंश संगमरमर पर खुदे हुये हैं। संस्कृत के इन अंशों का नीचे हिन्दी और अंग्रेजी अनुवाद भी दिया गया है। मंदिर की दीवारों पर विभिन्न धार्मिक दृश्य बने हुये हैं।



मंदिर का वास्तुशिल्प कुछ हद तक उत्तरी भारत की ""शिखर'' शैली का है, जो मध्यकाल में प्रचलित था। मंदिर के सामने के क्षेत्र का सौंदर्यीकरण किया गया है और वहाँ लॉन, उद्यान, कुंड, फव्वारे इत्यादि बनाये गये हैं। मंदिर के चारों ओर पक्की दीवार निर्मित है। दीवार के ऊपर कुछ-कुछ अंतराल पर छोटे शिखर बने हैं। पूर्व की तरफ एक निर्गम द्वार है, जिसके ऊपर एक सुन्दर शिखर बना है।

मुख्य मंदिर के सामने दोनों तरफ शिव और हनुमान की मढ़ियाएं बनी हैं। मंदिर के पीछे बलुआ पत्थर से पुरातत्व संग्रहालय निर्मित है। संग्रहालय की मुख्य दीर्घा में प्राचीन और मध्य युग की प्रतिमाएं, पाण्डुलिपियां तथा पुरातात्विक महत्व की अन्य सामग्रियां प्रदर्शित हैं, जिन्हें संपूर्ण मध्यप्रदेश तथा अन्य स्थानों से संगृहीत किया गया है। इस भवन में बिड़ला कला एवं संगीत संस्थान तथा सेन्टर ऑफ एडवान्स्ड स्टडीज इन इण्डोलॉजी एण्ड म्यूजियोलॉजी भी स्थित हैं।

मंदिर के बाहरी भाग में एक धर्मशाला, यज्ञशाला और पर्यटन स्थल की स्थापना भी की जा रही है। खड़ी पहाड़ी के दोनों ओर श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए सीढ़िया बनाई गयी हैं। ये सीढ़ियां तात्याटोपे नगर तथा पुराने भोपाल की तरफ बनी हैं।

यह मंदिर वास्तु की दृष्टि से भोपाल का मुख्य आकर्षण है। साथ ही यह एक प्रमुख तीर्थ स्थल का रुप भी ले चुका है।

 Birla Mandir Bhopal
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