महान ऋषियों की महान गाथायें ….! रावण की त्रैलोक्य विजय -44

महान ऋषियों की महान गाथायें ….!

RavankiKatha-Chap44

रावण की त्रैलोक्य विजय – 44

आज की कथा में हम महान ऋषियों के ज्ञान, विज्ञान की श्रेष्ठता पर चर्चा करेंगे। यह भी जानेंगे कि किस प्रकार वे राजाओं के नीति निर्देशक हुआ करते थे। इतिहास कहता है कि महान वैज्ञानिक ऋषि शुक्राचार्य और नीति विशेषज्ञ वृहस्पति तो क्रमशः दैत्यों और देवताओं के सुरक्षा सलाहकार (एन एस ए) थे ही। वशिष्ठ, राजा सुदास के और बाद में इक्ष्वाकु वंशियों के नीति निर्धारक और गुरू बने। ऋचीक और उनके पुत्र जमदग्नि स्वयं भी ऋषि और योद्घा थे। किंतु जमदग्नि पुत्र परशुराम तो, वीर विक्रम में बहुत ही आगे निकल गये थे। जैसा कि अज्ञानी लोग बड़बोले पन में प्रचारित करते हैं कि परशुराम ने क्षत्रियों से पृथ्वी को शून्य कर दिया था, सत्य, ऐसा नहीं है।वे अन्यायी राजाओं के खिलाफ थे।

गंभीरता से देखने और मनन करने से पता चलता है कि परशुराम ने अन्याय और अत्याचार करने वाले सत्ताधीशों से संघर्ष किया। किंतु उनका यह संघर्ष दलित,उपेक्षित और सर्वहारा वर्ग के लिए था। स्वयं के लिये होता तो वे, विजयी सम्पत्ति और पृथ्वी अपने पास ही रख लेते। विश्व के सबसे बडे़ दानी बनकर उन्होंने पृथ्वी को, ऋषि कश्यप को उपहार में न दी होती। शुक्राचार्य दैत्यों के युद्ध संरक्षक और सलाहकार अवश्य थे,परन्तु उन्होंने अपने चिरपरिचित प्रतिद्वंदी वृहस्पति के पुत्र कच को संजीवनी विद्या की शिक्षा देने में जरा भी हिचक नहीं दिखाई।शुक्राचार्य और वशिष्ठ में मतभेद थे। वशिष्ठ अपनी जन्मभूमि इलावर्त (आज का अल्ताई पर्वत क्षेत्र पामीर के पठार के समीप) से शाकद्वीप (अरब जो कि ऋचीक के पिता और्व ऋषि के नाम से पड़ा),अरब में स्थापित हो गये थे।क्योंकि देवलोक में नारद की तूती बोलने लगी थी। नारद, इंद्र की हां में हां मिलाते थे। किंतु वशिष्ठ दूसरी ही मिट्टी के बने थे। दोनों ऋषियों में मतभेद का यही बडा़ कारण था। वामन -बलि संघर्ष के अवसर पर बलि से नाराज होकर शुक्राचार्य जब अरब में आ गये तो इन दोनों ऋषियों वशिष्ठ और शुक्राचार्य में गहन मतभेद पैदा हो गये। अरब देश के मक्का शहर में जो काबा का प्रसिद्ध मंदिर था।जिसको मक्केश्वर महादेव के नाम से जाना जाता था। उस मंदिर में शुक्राचार्य की मूर्ति भी थी। शुक्राचार्य का एक नाम काव्य भी था।वे उशना कवि के नाम से भी जाने जाते थे। इस्लाम के प्रवर्तक मोहम्मद साहब का परिवार उस मंदिर की पूजा करता था। उस समय अरब में बुत (बुद्ध) परस्ती चरम पर थी। शुक्रवार (जुमा) इसीलिए पवित्र माना जाता है।

अब वशिष्ठ अरब को छोड़कर, सप्तसिंधु में आ गये और राजा सुदास के मंत्री बन गये, किंतु यहां उनको विश्वामित्र की प्रबल प्रतिद्वंदिता झेलनी पडी़। अंततः वे इक्ष्वाकु नरेशों के कुल गुरू हो गये। वशिष्ठ के बडे़ भाई अगस्त्य का व्यक्तित्व सबसे अलग था। वे दुस्साहसी, योद्घा थे और महान ऋषि तो थे ही।अगस्त्य ने बाली, सुमात्रा,जावा,इन्डोनेशिया,मलेशिया आदि द्वीपों में आर्य संस्कृति की स्थापना की।फिर वे राक्षसी प्रवृत्ति की चुनौती स्वीकार करने दक्षिणारण्य में पहुंच गये।पंचवटी के आसपास उनकी उत्कृष्ट किस्म की सैन्य शक्ति और शोध शाला थी। इस पर हम पहले चर्चा कर चुके हैं।

अब हम रावण और विश्वामित्र के पिता राजा गाधि की शत्रुता और रावण द्वारा गाधि के अपमान का एक सूत्र प्रस्तुत करते हैं। जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि विश्वामित्र किस दूरदर्शिता के साथ श्रीराम को लेने और रावण और उसके अनार्य समर्थकों के विरुद्ध श्रीराम को खड़ा करने के उद्देश्य से दशरथ के पास पहुंचे। दशरथ ने श्रीराम के बदले में स्वयं चलने या फिर अपनी चतुरंगिणी सेना तक देने की बात कही ।परन्तु महान ऋषि, पूर्व राजा और मंत्र दृष्टा विश्वामित्र श्रीराम और लक्ष्मण को लेकर ही माने।

अपने मामा ऋचीक (कवि, चायमान) के शिष्य विश्वामित्र ने ऋचीक द्वारा उन्हें सिखाये गये मंत्रशक्ति से संचालित होने वाले दिव्यास्त्रों और देवास्त्रों का प्रशिक्षण श्रीराम और लक्ष्मण को दिया।फिर नैमिषारण्य के गहन अरण्य में ताटका और उसके दोनों पुत्रों पर प्रयोग करवा के आकलन भी कर लिया।

'दुष्यन्तः सुरथो गाधिर्गयो राजा पुरुरवा।
एते सर्वेऽब्रुवंस्तात निर्जिताः स्मेति पार्थिवा।।

 

लेखक भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार व धर्मविद हैं |


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