कथा में सत्य और इतिहास होना चाहिए..! रावण की त्रैलोक्य विजय – 43

कथा में सत्य और इतिहास होना चाहिए..!

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रावण की त्रैलोक्य विजय – 43

श्रीराम और रावण के युद्ध की कथा, भारत के मानस में रची बसी है। हम इस कथा के माध्यम से उन तथ्यों और संदर्भों की चर्चा करते हैं,अधिकतर जो लोक मानस तक पहुंच नहीं सके हैं।हजारों वर्ष की घटनाओं को संक्षेप में लिखना,उनकी रोचकता भी बनी रहे, यह दुष्कर कार्य है। ऋषियों और ब्राह्मणों की परम्परा वाला देश है भारत।

"हजारों वर्षों से देश की श्रद्धा ऋषि -मुनियों और ब्राह्मणों की शिक्षा पर आधारित है। इसलिये हम चाहते हैं कि राम रावण कथा के पीछे जो महान ऋषि रहे, उनके चरित्रों का भी उल्लेख हो।अतः कथा की सार्थकता भी तभी मान्य होगी, जब कि हम घिसे पिटे किस्से कहानियों से हटकर हमारे वैभवपूर्ण अतीत की चर्चा भी करें।
हमने कल महान योद्धा एवं ऋषि ऋचीक की चर्चा की थी। यदि आप प्रश्न करें कि श्रीराम की कथा से उनका संबंध क्या है..? तब उसका उत्तर बहुत ही चौकाने वाला होगा। हमको आर्यों की प्रेरणा और प्राण इन ऋषियों के विज्ञान और केवल जनहित में किये जाने वाले शोध कार्यों की सराहना करनी होगी। यद्यपि इन ऋषियों में भी आपसी वैमनस्य रहता था। ऋषि थे तो महान किंतु मानव होने के नाते एक दूसरे की जडे़ भी काटते और कई दफै युद्ध भी करते रहते थे ।ऋषि मात्र पूजा पाठी ही नहीं होते थे। महान युद्ध कर्ता भी होते थे।

फिलहाल हम श्रीराम के दिव्यास्त्रों और देवास्त्रों के संदर्भ में विश्वामित्र और वशिष्ठ की बात करलें। वशिष्ठ और विश्वामित्र में भी भयानक युद्ध हो चुके थे। किंतु फिर भी लोकहित में वे एक हो जाते थे।यज्ञ की रक्षा के लिए वशिष्ठ की सहमति के बाद ही तो श्रीराम को लेकर विश्वामित्र नैमिषारण्य की ओर चले। मार्ग में उन्होंने देवास्त्रों की जो शिक्षा श्रीराम और लक्ष्मण को दी, वह विश्वामित्र ने अपने बहनोई और अप्रतिहत, दुर्घर्ष योद्धा भृगुवंशी ऋचीक से ही सीखी थी।
वस्तुतः विश्वामित्र एक राजा के तौर पर इतने प्रसिद्ध कभी नहीं हो सके, जितनी प्रतिष्ठा उनको ऋषि के रूप में मिली। ऋचीक के पुत्र जमदग्नि और विश्वामित्र (मामा, भांजे) का जन्म एक ही समय हुआ। (इसकी भी एक रोचक कथा है) वे दोनों ही ऋचीक के पास पले और बढे़। शास्त्र और शस्त्रों का ज्ञान भी एक ही साथ प्रारंभ हुआ। हम बता आये हैं कि ऋचीक अपने समय के महानतम योद्घा थे। भडौंच, नर्मदा,मथुरा और काशी तक उनका वर्चस्व था। मन से चलने वाले दिव्यास्त्रों और देवास्त्रों के तो वे महान ज्ञाता थे। लोकास्त्र (हाथों से चलाये जाने वाले हथियार) तो कोई भी चला सकता है किंतु रावण जैसे त्रैलोक्य विजयी का समूल नष्ट करने वाले श्रीराम का देवास्त्र ज्ञान तो विश्वामित्र के द्वारा ऋचीक प्रदत्त ही था।

ऋचीक, दुर्वासा और और्व के कुल में जन्मे थे। उन्होंने मामा, भांजे को मंत्रों से चलने वाले दंडचक्र,कालदंड,कर्मचक्र,विष्णुचक्र,इंद्रचक्र,वज्र,शिवशूल,ब्रह्मास्त्र और ऐषीकास्त्र दिये। गदा युद्ध के रहस्य भी सिखाये। सूखे, गीले वज्र दिये। पिनाक और नारायणास्त्र जैसे अनगिनत दिव्यास्त्र देकर प्रयोग विधियां भी बताईं।इन दिव्यास्त्रों की लंबी सूची है।

जब विश्वामित्र श्रीराम को लेने अयोध्या पहुंचे और अति विश्वास पूर्वक श्री राम,लक्ष्मण को लेकर सरयू पार हुए, इन दिव्यास्त्रों का ज्ञान दोनों भाइयों को उन्होंने देना शुरू कर दिया। मारीच ने भी रावण को विश्वामित्र द्वारा राम को नेमिषारण्य में ले जाने की घटना बताई थी। उसने उन नाराच बाणों का भी उल्लेख किया था जिनके प्रहार से सिर्फ मृत्यु ही वरण करती है।

 

लेखक भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार व धर्मविद हैं |


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