प्रकृति के नियम-

प्रकृति के नियम

प्रियम मिश्र 

  • प्रकृति के नियम अटल और अपरिवर्तनीय हैं, किन्तु वे अनिन्द्य (निर्दोष) तथा निश्चय ही अन्ततः कल्याणकारी होते हैं।
  • यद्यपि प्रकृति ने मनुष्य को स्वेच्छानुसार कर्म करने के लिए स्वतंत्र छोड़ दिया है, वह प्रकृति के विधान से बच नहीं सकता। जो जैसा बोता है, वैसा काटता है, शीघ्र या कुछ विलम्ब से।

 

  • मनुष्य को प्रकृति के पुरस्कारऔर दण्ड कर्मों एवं उनके पृष्ठ में प्रेरक भावों के अनुसार एक रहस्यमय प्रकार से प्राप्त होते हैं।
  • तथापि, मनुष्य के पूर्वकृत कुकृत्यों के दण्ड को दैवी सत्ता की कृपा से निवारित किया जा सकता है, यदि उसका आह्वान किया जाए।
  • अपने अंतरात्मा के प्रति ईमानदार और सच्चे रहें तथा प्रकृति के नियमों के अनुसार कर्म करें, यदि आप स्वस्थ और सुखी होना चाहते हैं।
  • कर्म के गुण-दोष का निर्णय उसके पृष्ठ में स्थित भावना द्वारा होता है। अन्तर्ध्वनि का अनुसरण करना अपने भीतर संस्थित दिव्य सत्ता का अनुसरण करना होता है।
  • अन्तरात्मा सदैव सत्य और न्याय का समर्थन करती है, यदि वह स्वच्छ हो।
  • अन्तरात्मा पवित्रतम स्थल है तथा वह प्रत्येक व्यक्ति को सच्चा धर्म प्रकट करता है, जो पुस्तकों की अपेक्षा अधिक स्पष्ट होता है।
  • हाँ, वह व्यक्ति जो दिव्य सत्ता के साथ पूर्णतः समस्वर हो जाता है तथा निरन्तर दिव्य सत्ता के साथ और दिव्य सत्ता में रहता है, भले और बुरे तथा पुरस्कार और दण्ड से ऊपर उठ जाता है तथा मानवीय नियमों का अतिक्रमण कर देता है।
  • मनुष्य जितना भी दिव्य सत्ता के साथ समस्वर होता है, उतना ही ऊँचा वह उठ जाता है।
The Laws of Nature
The Laws of Nature are inexorable and immutable but they are essentially impeccable and beneficent in the long run. 

While Nature has left man free to act in any manner he likes, he cannot escape the laws of Nature. 

One reaps what one sows, sooner or later. Rewards and punishments are ordained by Nature in a mysterious way in accordance with the deeds and the motives be hind them. 

However, all punishment for the past misdeeds of man can be waived by the Divine Grace, if it be evoked.

Be honest and true to your Inner Self and act in consonance with the laws of Nature if you want to be healthy and happy.

The merit of an act is decided by the motive behind it. To follow the inner Voice is to follow the Divine seated within us. 

The Inner Self always unfolds what is true and just, if it is clean. In fact, the Inner Self is the most holy of the holies and reveals the true religion to each and every one more clearly than books.

However, a person who is perfectly attuned to the Divine and lives with the Divine and in the Divine all the time, rise above good and bad and reward and punishment and transcends the human laws. 

The more one get attuned to the Divine, the higher one rises.

Priyam Mishra



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