ब्रम्हा, विष्णु, महेश तीन देव और सरस्वती, लक्ष्मी, काली तीन शक्तियों का रहस्य 

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ब्रम्हा विष्णु महेश तीन देव और सरस्वती, लक्ष्मी, काली तीन शक्तियों का रहस्य 

तीन शक्तियों और मूर्तियों का पारस्परिक सम्बन्ध इन तीनों मूर्तियों और शक्तियों के इस प्रकार से कर्तव्य क्षेत्र सिद्ध हुए हैं|

महाकाली-शक्ति सहित रुद्र संहार करता है, महालक्ष्मी-शक्ति सहित विष्णु पालन करता है और महासरस्वती-शक्ति सहित ब्रह्मा सची करता है। 

इनका आपस का सम्बन्ध क्या है?

शास्त्रों के विचार करने पर यह बड़े चमत्कार की बात होती है कि त्रिमूर्तियों से किसी एक मूर्ति को लेकर विचार करें तो शेष दोनों में से एक उसका साला होता है और दूसरा उसका बहनोई होता है। 

प्रकारान्तर से देखें और त्रि शक्तियों में से किसी एक शक्ति को लेकर विचार करें तो शेष दोनों में से एक उसकी ननद बनती है और दूसरी उसकी भावी बनती है, क्योंकि संहार करने वाले रुद्र की शक्ति महाकाली का भाई है पालन करनेवाला विष्णु, उसकी शक्ति महालक्ष्मी का भाई है| सृष्टि करने वाला ब्रह्मा और उसकी शक्ति महासरस्वती का भाई है संहार करने वाला रुद्र।

इनका आध्यात्मिक रहस्य इन तीनों शक्तियों और मूर्तियों के रूप, अवयव, आयुध, रंग आदि सब पदार्थों के सम्बन्ध में उपासना काण्ड के ग्रन्थों में जो अत्यन्त विस्तार के साथ वर्णन मिलते हैं, उनमें से एक छोटी-से-छोटी बात भी ऐसी नहीं है जो अनेक अत्युपयोगी तत्वों से भरी हुई न हो और जो जिज्ञासुओं एवं साधकोंके लिये अत्युत्तम आध्यात्मिक शिक्षा देनेवाली न हो। 

तीन प्रकार के रंग इनके रंगों के सम्बन्धमें चमत्कार इस बात का है कि संहार करनेवाला रुद्र तथा उसकी बहन महासरस्वती सफेद हैं। पालन करनेवाला विष्णु एवं उसकी बहन महाकाली नीले रंग के हैं और सृष्टि करने वाला ब्रह्मा एवं उसकी बहन महालक्ष्मी स्वर्ण वर्ण के हैं। यह तो बिलकुल ठीक है, स्वाभाविक है और मुनासिब भी है कि कोई भी शक्ति अपने पति के रंगकी नहीं होती और सब- की सब अपने भाई के रंग की होती हैं। परन्तु इस बात पर ध्यान देना है कि इन तीनों रंगों का जो इनमें विभाग हुआ है, उसका आध्यात्मिक तत्त्व क्या है? शास्त्रों से इसके सम्बन्ध में यह सिद्धान्त बतलाया है कि इन तीनों मूर्तियों के कार्यों में कोई परस्पर विरोध नहीं है, बल्कि ये परस्पर सहायक ही हैं। अत: त्रिमूर्तियों का भी इसी तरहका आपसमें सम्बन्ध है।

जो यह समझते हैं कि पालन करने वाले और संहार करने वाले परस्पर विरुद्ध काम करने वाले हैं, अतः हरि और हर का अवश्य ही अत्यन्त विरोध और शत्रुत्व हो सकता है, वे केवल ऊपर-ऊपरसे ही विचार कर, पालन और संहार के भीतरी अर्थ को न सोचकर बड़ी भारी गलती कर रहे हैं। 

यह ठीक है कि यदि हरि और हर एक ही वस्तुके पालक और संहारक होते तो उनका आपस में शत्रुत्व ही हो सकता, परन्तु यह बात नहीं है। जिस पदार्थ की रक्षा करनी होती हो, उसके शत्रु का संहार जब हर से होता है, तब विरोध कहाँ है? 

मसलन, बीमारके प्राणोंकी रक्षा के लिये जब वैद्य शस्त्र का प्रयोग (surgical operation) करता है और व्याधि का संहार करता है, तब तो एक ही आदमी से हरि और हर दोनों के काम होने की बात है। यही सम्बन्ध पालक हरि और संहारक हर का है।

महाकाली और रुद्रका काम

तीनों शक्तियों के रंगों और कार्यों का यह चमत्कारी सम्बन्ध है कि रुद्र को जो संहार रूपी काम करना है उसे कराने वाली महाकाली रूपी रुद्र शक्ति अपने भयङ्कर कार्य के अनुरूप और योग्य काले रंग की होती है। परन्तु वह संहार का काम संहार के लिये नहीं, बल्कि सारे संसार के रक्षण और कल्याण के लिये होता है। 

इसलिये वह खराब हिस्से का संहार करके, अपने पति का काम पूरा करके, खराबी से अपनी बचायी हुई असली चीज को अपने भाई अर्थात् विष्णु के हाथ में सौंपकर कहती है कि भाई जी! मैंने अपने पति श्रीमहादेव-रुद्र की शक्ति की हैसियत से खराबी का संहार कर दिया। अतएव हमारा दम्पति का काम पूरा हो गया है। अब तुम इस चीज को लेकर, अपना जो पालनेका काम है उसे करो|’


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