सत्यस्वरूप आत्मा,आत्मा की समस्या,आत्मा का स्वरूप

सत्य स्वरूप आत्मा

TrueSoul-newspuran-26Aug

आत्मा के संबंध में वास्तविकता की जानकारी प्राप्त करना अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि उसके बिना जीवन-यात्रा का ठीक स्वरूप ही सामने नहीं आता, कोई उद्देश्य स्थिर नहीं होता और परिस्थितियों के प्रवाह में इधर-उधर उड़ते फिरते हैं।

यदि आप अपने को महान् बनाना चाहते हैं, तो अपनी आत्मा की महानता स्वीकार कीजिए। यदि संसार में सम्मानपूर्वक जीना चाहते हैं, तो आत्मा का सम्मान कीजिए। यदि परमात्मा के साथ आत्मा को जोड़ना चाहते हैं, तो अपने को इस रिश्तेदारी के योग्य बनाने का प्रयास कीजिए।

आप परमात्मा को तब तक नहीं प्राप्त कर सकते, जब तक कि अपनी आत्मा को उसी की बिरादरी का न बनाएँ। नीचता से उच्चता की ओर, तुच्छता से महानता की ओर बढ़ने का एकमात्र उपाय यह है कि आप अपनी आत्मा को ईश्वर का अंश समझते हुए पवित्र मानें और उसका पूरा-पूरा सम्मान करें। सम्मान का अर्थ घमंड करना, अहंकार से भर जाना, ऐंठे रहना, अकड़ कर चलना, उद्धत हो जाना या दूसरों को नीच समझना नहीं है वरन् यह है कि अपने अंदर ईश्वर का पवित्रतम अंश बैठा हुआ देख कर उसकी पूजा-अर्चना करें, उसके आदेशों को ध्यानपूर्वक सुनकर ऐसे श्रेष्ठ आचरण करें, जैसे कि परमात्मा के दरबार में जाकर करना उचित है।

आत्मा का स्वरूप : जीवात्मा के अस्तित्व को मान लेने पर भी उसके स्वरूप का ठीक-ठीक निर्णय करना कठिन है। उसका स्वरूप जैसा भी हो, इतना निश्चित है कि वह परम चैतन्य, आनन्दमय, तेजस्वी, ज्ञानमय, निर्विकार और अक्षय है। आत्मशक्ति की दृढ़ता से उसकी इन विषमताओं की अनुभूति होती है। मानव-जीवन के आदर्श और ध्येय इन्हीं गुणों के आधार पर बने हुए प्रतीत होते हैं। यदि आत्मतत्त्व में ये बातें न होतीं, तो स्वभाव और विचारों में ये बातें कैसे आतीं ! प्रकृति में ईश्वरीय कार्यों को देखकर मनुष्य ईश्वर में भी इन्हीं गुणों की कल्पना करता है। आत्मसंयम से वह स्वयं अपने भीतर विशेष चेतनता, आनन्द, स्फूर्ति, ज्ञान-प्रकाश, शुद्धता और अमरता का अनुभव करता है। निश्चय ही आत्मा का वही स्वरूप है जो सर्वभूतान्तरात्मा ब्रह्म का है। तभी तो शास्त्रकारों ने निर्णय किया कि आत्मा ब्रह्म है, या आत्मा परमात्मा का अंश है, अथवा महाकवि तुलसीदास के शब्दों में, ‘ईश्वर अंश जीव अविनाशी’। वही कर्ता है, जो चरित्र, स्वभाव, कर्त्तव्य और जिज्ञासा की उत्पत्ति करता है। वह क्षेत्रज्ञ है, जो भिन्न-भिन्न, व्यक्तियों के क्षेत्र में भावों का आरोपण करता है।TheSoul-Newspuran-25May20

आत्मा की समस्या, उपनिषदों में विवेचित बहुत महत्त्वपूर्ण समस्याओं में से एक है। यही समस्या आगे चलकर भगवद्गीता में एवं वेदान्त सूत्रों में अध्यात्मविद्या के नाम से पाई जाती है। आत्मा के स्वरूप का विश्लेषण उपनिषदों की विरासत है, जोकि परिवर्ती भारतीय विचारधारा को उत्तराधिकार में प्राप्त हुई है। इससे अनेक मिथ्या कल्पनाओं की उत्पत्ति हुई। आत्मा के स्वरूप के विषय में बुद्ध और शंकर, कपिल और पतञ्जलि आदि विविध विद्वानों के परस्पर-विरोधी सिद्धान्तों का मूल उपनिषदों में मिल सकता है। उपनिषदों का आशय यह कभी भी नहीं था कि गम्भीरतर आत्मा को मात्र शून्य का रूप दे दिया जाए। यह अपने-आपमें पूर्णतम यथार्थ सत्य है, पूर्णतम चेतना है, और मात्र एक निषेधात्मक निश्चेष्ट नहीं है जिस पर किसी बेचैनी का प्रभाव न पड़ सके अथवा जो किसी दोष से आवृत्त न हो सके।

तर्कसम्मत विचारधारा में एक निषेधात्मक गति रहती है जहां यह सीमित के निषेध से उठती है, किन्तु आगे बढ़ने के लिए यह केवल एक पड़ाव की ही भांति है। निषेधात्मक प्रक्रिया द्वारा आत्मा को यह जान लेना आवश्यक होता है कि इसकी सीमितता अथवा आत्मपूर्णता ही प्राधन तत्त्व नहीं है। अस्त्यात्मक विधि के मार्ग से यह अपने आत्म को सबके जीवन एवं सत्ता में जान सकती है। सब पदार्थ इसी सत्यस्वरूप आत्मा के अन्दर अवस्थित हैं। कुछ बौद्ध विचारक आत्मा का निरूपण केवल अभावात्मक या शून्य के रूप में करते हैं और इस धारणा के आधार पर वे आध्यात्मिक ज्ञानी की दृष्टि से इसे भावरूप या अमूर्तरूप बताते हैं। हम इस आत्मा को चेतना के क्षेत्र के किसी भी कोने में नहीं टूंढ़ सकते और इसलिए वहां न मिलने पर हम तुरन्त इस परिणाम पर पहुंच जाते हैं कि यह कु”महीं, अर्थात् शून्य है। सांख्यकार ने इसे एक सरल एवं विशुद्ध रूप में माना है यद्यपि यह निष्क्रिय, प्राणशक्तिरूप एक है, जो प्रकटरूप में सरल होने पर भी अपना एक विशिष्ट स्वरूप रखता है और इसीलिए हम सांख्य के मत में आत्माओं का बाहुल्य पाते हैं। कई वेदान्तियों का मत है कि यथार्थ आत्मा अथवा ब्रह्म विशुद्ध है, निश्चेष्ट हे, शान्तिमय है और विकारहित है, और वे कहते हैं कि आत्मा केवल एक ही है। उसके निष्किय पक्ष पर बल देने के कारण उसके शून्यरूप हो जाने का भय उनके मत में अवश्य है।

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।

उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः॥16॥ “सत्य का परीक्षण कर उसका बोध व दर्शन कर लेनेवाले तत्त्वदर्शियों के द्वारा; परीक्षणोपरांत; यह सिद्धांत प्रतिपादित किया गया है कि असत अर्थात् भौतिकता का कभी कोई अस्तित्व ही नहीं था और न ही सत्य कभी परिवर्तित ही होता है।”

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सत्य की सत्ता शाश्वत है, वह सदैव रहती है सदैव सब जगह विद्यमान है। कभी भी, कहीं भी सत्य का कोई अभाव नहीं है तथा भौतिकता असत है। असत का कभी कहीं कोई अस्तित्व नहीं है। जैसे मकड़ी स्वयं ही अपने बुने जाल में फँस जाती है, वैसे ही मनुष्य ने सब बंधन; कि यह मेरे गुरुजन हैं, परिजन हैं, वृद्धजन हैं इसलिए पूज्यनीय हैं, स्वयं निर्मित किए हैं व स्वयं ही उनमें उलझ गया है। मनुष्य न शरीर है, न मन, बुद्धि, और न ही अहंकार। वह मात्र शुद्ध चैतन्य स्वरूप आत्मा है। आत्मा ही चैतन्य रूप में इस सृष्टि का आधार है। सृष्टि तो मात्र इसकी अभिव्यक्ति है। इसीलिए सृष्टि अनित्य और असत है तथा आत्मा ही सत्य व शाश्वत है। इसीलिए वह ही सृष्टि के सृजन का कारण है। श्रीकृष्ण यहाँ वही सत्य उद्घाटित कर रहे हैं जो तत्त्वदर्शियों द्वारा सदैव उद्घोषित किया जाता है। आगे श्रीकृष्ण अर्जुन को यह भी बताएँगे कि किस प्रकार उन्होंने सृष्टि के आदि में यह सत्य व तत्त्व ज्ञान की ब्रह्मविद्या सूर्य को दी थी।


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