ईश्वरीय धर्म और मानव निर्मित धर्मों में क्या अंतर है?

अतुल विनोद:-

जो धर्म आदिकालीन है, सनातन है, वही मूल धर्म है| मानव निर्मित धर्म और परमात्मा के द्वारा सृजित धर्म में कोई तुलना नहीं हो सकती, क्योंकि जो ईश्वरीय है वह किसी भी तरह के पूर्वाग्रहों से मुक्त है|

धर्म खुद ईश्वर ने स्थापित किया लेकिन मज़हब, पंथ, संप्रदाय, लोगों ने बनाए| 

मानव निर्मित धर्मों में ईश्वर के संदेशों को तो लिया गया, लेकिन अपनी सोच के पैमाने पर उनमे बदलाव कर लिया गया | अपनी अपनी सुविधा के अनुसार उनमें तोड़ मरोड़ भी की गई|

खास बात यह है कि मानव निर्मित धर्म में धर्म की किताबें लिखने वालों ने खुद को या जिसे वह मानते हैं उसे ईश्वर की जगह पर बैठा दिया|

भगवान यानी धरती पर मौजूद मनुष्य में से ऐसा मनुष्य जिस में ईश्वर की कलाएं ज्यादा से ज्यादा मात्रा में हों| लेकिन भगवान का अर्थ ईश्वर नहीं है| ईश्वर या परमात्मा सबसे बड़ा है, सबके अन्दर है| 

धर्म कहता है कि सत्य शाश्वत है जिसे बदला नहीं जा सकता, देश काल परिस्थिति भी सत्य को बदल नहीं सकती| मूल सत्य हमेशा कांस्टेंट(अपरिवर्तनीय) रहता है| यह सत्य किसी पीर पैगंबर या अवतार के कहने के कारण सत्य नहीं हो जाता यह सत्य तो अपने आप में सत्य है चाहे कोई कहे या ना कहे|

मूल धर्म के लिए कोई भी हिंदू मुस्लिम सिख या ईसाई नहीं है| मूल धर्म के लिए सब मानव एक है वह किसी से भेदभाव नहीं करता| उसके लिए कोई इसलिए प्रिय नहीं हो जाता कि वह हिंदू है या इसलिए अप्रिय नहीं हो जाता कि वह मुस्लिम है| उसे हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई नाम से कोई लेना देना नहीं है| उसके लिए सभी प्राणी उस ईश्वर की संतान है| और उसे सभी को उनके कर्मों के मुताबिक समान रूप से निष्पक्ष होकर फल प्रदान करना है वह किसी के साथ पक्षपात नहीं करता |

ईश्वर द्वारा निर्मित धर्म में सभी जीव जंतुओं के प्रति दया का भाव है| जबकि मानव निर्मित धर्म में सिर्फ उस धर्म के मानने वालों के लिए स्थान है, मानव निर्मित धर्म एक जीव को बेहतर मान सकता है और दुसरे को कमतर, एक की बलि दे सकता है और दुसरे की पूजा| ईश्वर द्वारा निर्मित धर्म किसी के साथ इसलिए भेदभाव नहीं करता कि वह व्यक्ति यदि उस धर्म को नहीं मानता|

ईश्वर द्वारा निर्मित मूल सनातन धर्म सभी के अंदर एक ईश्वरीय शक्ति सत्ता का अंश आत्मा के अस्तित्व को मानता है, और यह भी कि सभी आत्माएं एक दूसरे से उस ईश्वरीय शक्ति का अंश होने के कारण जुड़ी हुई है|

ईश्वर द्वारा निर्मित धर्म कहता है कि न सिर्फ जीव जंतुओं में बल्कि निर्जीव दिखाई देने वाली वस्तुओं में भी उस ईश्वर का अंश विद्यमान है और उस निर्जीव वस्तु के मूल कण में भी स्पंदन होता रहता है| उसके अंदर भी ईश्वरीय शक्ति कम मात्रा में गतिमान है|

मूल सनातन धर्म  पर सभी का अधिकार है चाहे वह व्यक्ति  उस धर्म को माने या ना माने| सनातन धर्म किसी खास धर्म संस्थापक, पैगंबर या किसी खास पद्धति के एकाधिकार से परे है ! जैसे इस्लाम  मे मौहमम्द को मानना हर हाल मे जरूरी है या बोद्ध धर्म मानने वाले को बुद्ध को मानना ही होगा, क्रिश्चियन को ईसा को मानना होगा और हिन्दू को राम, कृष्ण आदि को मानना होगा, लेकिन सनातन धर्म कहता है कि

इदं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निम् यमं मातरिश्वानमाहु:।।

ऋग्वेद-1/164/46

एक ही  सत् को जानने वाले ज्ञानीजन  ईश्वर को  इन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि , सुंदर पंख वाले गरुड, यम तथा मातरिश्वा के नाम से पुकारते हैं ।

वेद सिर्फ हिन्दुओं के नहीं हैं| हिन्दुओं ने वेदों को अपना मूल ग्रन्थ माना| वेदों को अन्य धर्मों ने नहीं माना लेकिन उनके संदेशों को लेकर अपने अपने देश काल के हिसाब से धर्म बना लिए|

वेद किसी हिन्दू ने नहीं लिखे, तो पुरातन-काल में मौजूद उन मानवों ने लिखे जिन्हें सीधे ईश्वरीय सन्देश प्राप्त होते थे उन्होंने अपने नामो को आगे नहीं किया नहीं तो वही पूजने लगते|

जैसे आज भी साधना कि उच्च अवस्था में किसी भी मानव का मन विश्व मन से जुड़ जाता है और उस मल्टीवर्स से उसे दिव्य संकेत मिलने लगते हैं| इसी तरह पूर्वकाल में मानवों को उच्च चेतना की अवस्था में जो ईश्वरीय संकेत मिले उसे उन्होंने डीकोड करके मानवीय भाषाओं में, समझ आने लायक उदाहरणों के साथ लिखा|

ईश्वरीय संदेशों कि व्याख्या करते वक्त निश्चित ही उन्होंने अपनी बुद्धि का भी उपयोग किया होगा| इसलिए उस वक्त प्रचलित धारणाएं व मान्यताओं का समावेश होना स्वाभाविक ही है| उदाहरणों  व कथाओं के साथ प्रस्तुत वेदों में मूल रूप से ईश्वर के ही सन्देश छिपे हैं|

आज भी यदि किसी उच्च चेतना के स्तर पर व्यक्ति को ईश्वरीय सन्देश मिलें तो वो भी उन्हें लिखने के साथ सबको समझाने के लिए कुछ प्रतीक, प्रतिमान, या प्रचलित ईश्वरीय स्वरूप का इस्तेमाल भी करेगा, ताकि लोग उस पर विश्वास करें और सच मानें| मनुष्य के साथ परेशानी ये है कि वो सन्देश वाहक या उसके बताये अवतार से तो नाता जोड़ लेता है| लेकिन मूल संदेश को भूल जाता है| वो प्रक्रियाओं को सब कुछ मान लेता है यानि साधना को ही साध्य मान लेता है| प्रचलित धर्म साधन हैं न की साध्य| साध्य यानि “लक्ष्य” तो ईश्वर है|  प्रचलित संप्रदाय सिर्फ साधन यानि रास्ते को ही सब कुछ मान लेता है| यही ऋग्वेद में कहा गया है| 

आज के प्रचलित धर्मो में तरीकों पर बेहद ज़ोर है| जैसे मुसलमानों के लिए इबादत के प्रचलित तरीके को मनना ज़रूरी है वैसे ही हिन्दुओ के लिए भी साधनाओं  के अनेक तरीके हैं जिन पर चलना ज़रूरी बताया गया है|  प्रचलित धर्म संप्रदाय बंद धर्म हैं| जो एक या उनके फ़ॉलोवर कुछ व्यक्तियों के विचारों पर आधारित हैं| ये धर्म समय के साथ लचीले होने की बजाये कट्टर होते जा रहे हैं| सच ये है कि जिस तरह प्राचीन काल में अवतार या पैगम्बरों को ईश्वरीय संदेशों का ज्ञान था वैसे ही आज भी मनुष्य की विकसित चेतना वैश्विक नियमों का अंतरज्ञान करा सकती है|

सनातन  धर्म में ईश्वर तक पहुंचने के अनेक मार्ग बताया गए हैं| हजारो वर्षो मे न जाने कितने ही दूसरे मज़हब और पंथ आये फिर कही विलुप्त हो गये … और न जाने कितने ही ओर पंथ मज़हब आयेंगे और बाद मे कालचक्र मे कही खो जायेंगे … लेकिन ये सनातन धर्म तब भी था..आज है..और हमेशा रहेगा !

सनातन धर्म सबका है और इस पर इस दुनिया में रहने वाले सभी लोगों का अधिकार है| भारत या अन्य देश में रहने वालों के संप्रदाय भले हिन्दू, मुस्लिम, इसाई अदि हों लेकिन इन सम्प्रदायों का उदय मूल धर्म से ही हुआ और ये सब एक निश्चित समय बाद मूल धर्म में ही समाहित हो जायेंगे| क्यूंकि वर्तमान में मनुष्य की चेतना विकसित हो रही है और वह सत्य के करीब है| 

 

ATUL VINOD



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